Wednesday, February 17, 2010

क्या फिर भी पाकिस्तान से बात की जाये

"कश्मीर की आजादी ही हमारा संघर्ष है। भारत की फौज ने कश्मीरियों को बंदूक और बूटों तले रौंद रखा है। वहां लोग गुलाम हैं। हम अपना संघर्ष कश्मीर की आजादी के लिये जारी रखेंगे।" यह ऐलान जेहादी काउंसिल का है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की राजधानी मुज्फ्फराबाद में 4-5 फरवरी को जेहादी काउंसिल की इस बैठक में हिजबुल मुजाहिदीन के चैयरमैन सैयद सलाउद्दीन ने अध्यक्षता की। और लश्कर-ए-तोएबा के मुखिया मोहम्मद हाफिज सईद ने मुख्य भाषण दिया, जिसमें कश्मीर को लेकर स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने का ऐलान किया गया।


ऐसा नहीं है कि भारत की तरफ से इस पर आपत्ति नहीं की गयी और पाकिस्तान ने इस पर खामोशी बरती। भारत ने
26/11 यानी मुंबई हमले के मुख्य आरोपी लश्कर के मुखिया हाफिज सईद के इस तरह खुली तकरीर पर आपत्ति भी की। लेकिन पाकिस्तान की तरफ से जो जबाब आया, वह कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी ने साफ कहा कि, " कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की नीति में कोई अंतर नहीं आया है। भारत के साथ बातचीत से कश्मीर के लोगों को राहत मिलेगी क्योंकि हम उनके हक की बात कहते हैं।" बातचीत को लेकर पाकिस्तान का रुख इस बात से भी समझा जा सकता है कि वह मुंबई हमलों के बाद पहली बार खुले तौर पर इस बात को भी कहने से नहीं कतरा रहा है कि बातचीत की गाड़ी उसने नहीं भारत ने रोकी थी और अब भारत ही बातचीत के लिये जोर डाल रहा है।

सवाल है भारत के सामने कौन सी मुश्किल है
, जिसके तहत वह पाकिस्तान से इस शर्त पर बात कर रहा है कि चर्चा सिर्फ आतंकवाद पर होगी। दूसरे किसी द्वपक्षीय समझौतो को लेकर बातचीत नहीं होगी। क्या इसके पिछे सिर्फ आतंकवादी हमलों को लेकर पाकिस्तान की साफगोई है, जिसके अंतर्गत वह कहता है कि आतंकवाद तो उसके काबू में ही नहीं है फिर वह कैसे गांरटी ले लें कि भारत पर कोई दूसरा हमला नहीं होगा। या फिर अमेरिका की रुचि है कि कश्मीर को लेकर भारत पाकिस्तान अगर साथ बैठे तो दोनो देश अफगानिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति को अंजाम देने में सहायक होंगे ।

यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण है क्योकि जैसे ही भारत विदेश सचिवो की वार्ता पर जोर डालता है वैसे ही न्यूयार्क में अफगानिस्तान-पाकिस्तान मामलों को देखने वाले होलब्रुक यह कहने से नही कतराते हैं कि अफगानिस्तान की सीमा से सटे देश चाहे वह पाकिस्तान हो या चीन और इन दोनो देशों से सटे देश चाहे वह भारत ही क्यों ना हो
, उन्हें समझना होगा कि अफगानिस्तान की चिंगारी इन्हें अपने घेरे में ले सकती है। इसलिये भारत-पाकिस्तान अगर अपने उलझे मुद्दों पर बातचीत करते हैं तो तनाव की जगह इस पूरे क्षेत्र में स्थायित्व आयेगा। जो अफगानिस्तान के समाधान के लिये जरुरी है। होलब्रुक का यह कथन अचानक नहीं आया। लेकिन पहली बार बातचीत की मेज पर लाने के लिये अमेरिका ने अंग्रेजी का पसंदीदा अक्षर "के" का जिक्र नही किया। "के" यानी कश्मीर जिसका जिक्र अमेरिका अगर अंतरराष्टीय मंच पर बीते एक दशक में सात बार प्रयोग कर चुका है तो पाकिस्तान ने अठारह बार किया है। सबसे ज्यादा जनरल मुशर्रफ ने कश्मीर को लेकर कूटनीति भी की और जेहादी काउंसिल को हवा भी दी।

लेकिन कश्मीर का सीधे नाम लेने से बचते हुये पहली बार अमेरिका और पाकिस्तान दोनों कश्मीर के जरीये आतंकवाद पर बातचीत करने का रास्ता निकाल चुके हैं। पाकिस्तान को इस बात का एहसास है कि भारत में मुंबई हमले को लेकर तल्खी बरकरार है
, लेकिन पाकिस्तान इस हकीकत को भी समझ रहा है कि न्यूक्लियर डील से लेकर आर्थिक सुधार की मनमोहन पालिटिक्स जिस तरह ओबामा के बिना अधूरी है. उसका दूसरा सच यह भी है कि ओबामा की अफगान नीति पाकिस्तान के सहयोग के बिना अधूरी है। इसीलिये तालिबान को लेकर भी अमेरिका पाकिस्तान की तर्ज पर अच्छे और बुरे तालिबान की बात करने लगा है। और पाकिस्तान की सीमा से सटे उस समूचे अफगानिस्तान पर खामोशी बरते हुये है जो आतंक के गढ़ है और पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन या सीधे कहे तो जेहादी काउंसिल से जुड़े हैं।

खुद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि अफगानिस्तान के बाजौर
, मोहमंड, खैबर, खुर्रम, पूर्वी और दक्षिणी वजीरिस्तान के हिस्से में सक्रिय तालिबान के छह से ज्यादा संगठनों के साथ पैसे और हथियार का जुडाव जेहादी काउंसिल के साथ है । जिसमें तहरीक-ए-तालिबान के साथ हरकत मुजाहिदीन के फजरुरहमान खलीली, जैश-ए-मैहम्मद के मौलाना मसूद अजहर, तहरीक इरपान के मौलाना अब्दुल्ला शाह मजहर, सिपाहे सहाबा पाकिस्तान के मौलाना आजम तारिक , लश्कर-ए-जहानगबी के मौलाना हक नवाज और लश्कर के हाफिज सईद तो कई मौको पर साझा सभी भी कर चुके हैं। यानी एक तरफ तालिबान को लेकर अमेरिका पाकिस्तान को अलग भी मान रहा है और कश्मीर को लेकर भारत को पाकिस्तान से बातचीत करने के लिये उकसा भी रहा है। वहीं पाकिस्तान खुद समझ रहा है कि वह तालिबान से जिस तरह गुथा है, उसमें अमेरिकी हित साधने के लिये वह अपने स्वार्थ के घेरे में कश्मीर और आंतकवाद को अलग कर सौदा कर सकता है। तब सवाल है इसमें भारत है कहां। खासकर तब जब मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान का रुख भारत पर निशाना साधने वाला रहा। भारत के डोजियर मे बताये गये तथ्यों को खारिज करते हुये से पाकिस्तान ने श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर हमले से लेकर बलूचिस्तान में अस्थिरता फैलाने और कश्मीर को बातचीत के दायरे में लाने की खुली वकालत की। सवाल यह भी है कि बातचीत जिस दौर में होगी अगर उस वक्त बारत की खुफिया एजेंसी रॉ की पाकिस्तान को लेकर तैयार रिपोर्ट पर ही गौर करें तो सरकार खुद सवालों के घेरे में आती है। रॉ की रिपोर्ट के मुताबिक , "जेहाद पाकिस्तान की राज्य नीति का हिस्सा है । और आतंकवाद उसका आधुनिक चेहरा। जिसके जरिये भारत की सैन्य शक्ति के साथ चैक-एंड बैलेंस का खेल पाकिस्तान खेलता है। असल में पाकिस्तान की जमीन से दुनिया में इस्लाम के उस रसूख को लौटाने के नाम पर जेहाद का खेल आधुनिक तरीके से खेला जा रहा है, जिससे पाकिस्तान की सरकार को आर्थिक मदद मिले और आतंकवाद मदद के लिये सौदेबाजी का हथियार बन सके। इसलिये धर्म और विचार का घालमेल कर इस्लाम को कवच बनाकर जो खेल शुरु किया गया है, उसके पांच चेहरे हैं। सैयद कुतुह, ओसामा बिन लादेन, अब्दुल्ला आजम, इब्न तैयंमिंया और हाफिज सईद। "

जाहिर है बातचीत से पहले भारत को समझना होगा कि हाफिज सईद
26-11 का गुनहगार भी है और पाकिस्तान में सबसे शक्तिशाली भी । फिर बातचीत क्यों । जहा तक पुणे घमाके को लेकर बातचीत ना करने के बीजेपी का उठाया सवाल है तो वह कोई मायने नहीं रखता। क्योंकि धमाके अगर आतंकवादी करते है तो वह वाकई नहीं चाहेगे कि बातचीत हो और अगर धमाकों के पीछे कुछ दूसरे तत्व है तो बातचीत रुकनी नहीं चाहिये। यूं भी संसद पर हमले के बाद खुद वाजपेयी सरकार ने मुशर्रफ से बात की थी। इसलिये सवाल बीजेपी का नहीं सरकार का है। अगर क्रिकेट और सिनेमा से उसका मन भर चुका हो तो वह आतंकवाद के मद्देनजर पाकिस्तान के इरादों और अमेरिका की मंशा को समझे ....फिर पूछेगे बातचीत क्यों।

7 comments:

Parul said...

keha to yahi jata hai ki kisi bhi samsya ka samadhan shanti se vichar-vimarsh karke nikala ja sakta hai,magar ye prabhavi tab hai jab dono is bhasha ko acchi tarah samjhte ho,magar pakistan to puri tarah se ashanti ka doot hai to kya samjha jaye phir?

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भारत बात करने की हालत में है क्या? भारतीय राजनय और कूटनीति की अक्षमता जग जाहिर है. जो अपने घर को नहीं संभाल पा रहा, बाहर कौन सा किला फतह कर लेगा. पिछले तिरसठ सालों में लगातार बात-चीत के चलते क्या हासिल कर लिया? क्या यह उन जवानों के साथ धोखा नहीं है, जो पाकिस्तानी गोलियों और बमों का शिकार बनते हैं?

chandan said...

अपने आलेख में आपने बहुत सारे कारण गिनाए हैं जिसके वजह से भारत को पाकिस्तान से बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन यह अकाटय सत्य है कि किसी भी समस्या का समाधान बातचीत द्वारा ही संभव है। यह सच है कि दो दिन चले ढाई कोस क्या पचास गज का फासला भी भारत तय नहीं कर पाया है। वाबजूद इसके भारत के पास समस्या के समाधान के लिए बातचीत के सिवाय कोई दूसरा विकल्प ठीक नहीं हो सकता है।

prabhatdixit said...

mein aapse poori tarah sahamat hoo.achcha likha.lekin kuch hone ka nahi,,,lekin likhate jaroor rehna.

अरूण साथी said...

एक बात जो समझनी जरूरी है वह यह कि दोनों देशों को पता है कि बातचीत महज एक दिखावा है। दोनो जानते है कि आतंकवाद पर पाकिस्तान सरकार चाह कर भी रोक नहीं लगा सकती तो फिर इस कुटनीति जाल को महज जनता को फंसाने के लिए चारा के रूप डाला जाता है या फिर भारत पाकिस्तान को यह सन्देश देना चाहता है कि वह डर गया। मैं तो कहता हूं कि दिल मिले न मिले हाथ मिलते रहिए का अब जमाना नहीं, अब तो सभी ंशक्ति की पूजा करते है।

Ramesh Sharma said...

कश्मीर और पाकिस्तान की मीमांसा में पिछले ६२ वर्षों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है लेकिन स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है बल्कि वहाँ आतंकवाद फैलाने में पाक और दीगर संगठनों के अरबों रूपये खर्च हो चुके हैं जिनसे कश्मीर को सचमुच स्वर्ग बनाया जा सकता था| कश्मीर मुद्दा बना रहे इसकी चिंता पाकिस्तान का हरेक शासक करता आया है क्योंकि वे इसी ग्रंथि पर टिके (पाकिस्तान के) रोज़ बरगलाए जा रहे, अवाम को एक झूठी दिलासा दिलाते रहते हैं| हमारे कश्मीरी भाई... कहने वाले पाकिस्तानी रहनुमा ज़रा बताएं कि कब्जाए हुए हिस्से के कितने कश्मीरियों को वहाँ उच्च पद दिए गए हैं या उनको ऐसा कौन सा बड़ा तख्तोताज दे दिया गया है| यदि वहाँ के हुक्मरानों का इतना भरोसा होता तो ७० के दशक में ईस्टर्न पाक (अब बांग्लादेश) में ग़दर नहीं मचता जिसमे भारत को मजबूरन दखल देना पडा था| शास्त्रीजी जब ताशकंद में समझौते के लिए गए थे तो जनरल अयूब ने उनसे अकेले मे गुहार की थी कि कश्मीर को भी बातचीत में शामिल कर लीजिए वरना मैं देश में क्या मुंह दिखाउंगा| यह १९६६ का वाकया है| उफ़ ! आज कई दशकों बाद भी पाकिस्तान के हुक्मरानों की मानसिकता नहीं बदली है|साफ़ समझ लिया जाना चाहिए कि बदलेगी भी नहीं|
-रमेश शर्मा, रायपुर

rahul said...

sir pranam ..chte muh badi baat hogi agar mai kuch kahunga, lekin ab yah maan lena chahiye ki baat-cheet se koi hal nahi niklne vala, ab to bharat ko kade kadam uthne chahiye chahe vah pakistani ke sath sadk-rail ka sambndh ho ya vayaparik aayat niryat ..jo dushman hai vo to dushman hi rahega or sabse jyadaya jimmedar to hamari kutniti hai jiski dhaar dhaar hi nahi ...chankya agar kahi se bhartiya kutniti ke is dour ko dek rahe honge to bade srminda ho rahe honge,vibhajan ke itne salo me humne apne is kathit chote bhai se,har vishay har chetra me dhoka hi khaya hai mera manna hai ki ab baat cheet or sabhya padosi ke jumlo ko dur chod dena chahiye!or aek abhedya kutnigya char divari ka nirman karna chahiye jisse takarakar pakisatni sadyantra dam tod de or sath hi amerika ko jatla dena chahiye ki use kiska sath chahiye hindustan ka ya pakistan ka .....