Sunday, February 21, 2010

माय नेम इज....और मैं पत्रकार नहीं हूं

लोकतंत्र के चार खम्भों में सिनेमा की कोई जगह है नहीं, लेकिन सिल्वर स्क्रीन की चकाचौंध सब पर भारी पड़ेगी यह किसने सोचा होगा। "माई नेम इज खान" के जरिये सिनेमायी धंधे के मुनाफे में राजनीति को अगर शाहरुख खान ने औजार बना लिया या राजनीति प्रचार तंत्र का सशक्त माध्यम बन गयी, तो यह एक दिन में नहीं हुआ है। एक-एक कर लोकतंत्र के ढ़हते खम्भों ने सिनेमा का ही आसरा लिया और खुद को सिनेमा बना डाला। 1998-99 में पहली बार बॉलीवुड के 27 कलाकारों ने रजनीति में सीधी शिरकत की। नौ बड़े कलाकारों से राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने संपर्क साधा और उन्‍हें संसद में पहुंचाया। जबकि 62 कलाकारों ने चुनावी प्रचार में हिस्सा लिया। और, 2009 तक बॉलीवुड से जुड़े दो सौ से ज्यादा कलाकार ऐसे हो गये, जिनकी पहुंच पकड़ अपने-अपने चहेते राजनीतिक दलों के सबसे बड़े नेताओं के साथ भी सीधी हो गयी। गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्यप्रदेश के विधानसभा से लेकर आम चुनाव के दौरान सिल्वर स्क्रीन के करीब छोटे-बडे तीन सौ से ज्यादा कलाकारो ने प्रचार भी किया और अपने हुनर से नेताओ की सभा को बांधा भी रखा ।

कलाकारों के वक्त के लिहाज से नेताओ को अपना वक्त निकालना पड़ता लेकिन आम जनता के लिये नेताओ के पास वक्त ही नहीं रहता। मुश्किल तो यह हुई कि इस दौर की राजनीति को इसमें कोई खामी भी दिख रही। 26-11 के बाद ताज होटल का निरिक्षण करने निकले तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का फिल्मकार रामगोपाल वर्मा को अपने साथ ले जाना इसका एक उम्दा उदाहरण है। जब देशमुख पर आरोप लगे तो उन्होने मासूमियत से कहा-इसमें गलती क्या है। सत्ताधारी राजनीतिक दलों से जुड़े होने का लाभ नौकरशाही ने भी कलाकारों को खूब दिया। सुविधा,टैक्स माफ और राष्ट्रीय पुरस्कार दिखायी देने वाला सच है। और ना दिखायी देने वाली हकीकत यही रही कि राजनीति भी सिनेमायी तर्ज पर खुद को देखने-समझने लगी।


दरअसल, यह पूरा दौर आर्थिक सुधार का है
, जिसमें सबसे ताकतवर बाजार हुआ और हर हालत में मुनाफे की सोच ने सामूहिकता के बोध खत्म कर दिया। इस दौर में कल्याणकारी राज्य यानी जनता के प्रति जवाबदेही होने की समझ भी राजनीतिक सत्ता से काफूर हो गयी। सबकुछ प्रतिस्पर्धा बताकर मुनाफे पर टिकाने का अद्भुत खेल शुरु हुआ। इस राजनीतिक शून्यता ने समाज में एक संदेश तो साफ दिया कि संसदीय राजनीति का लोकतंत्र भी अब मुनाफे की बोली ही समझता है। इन परिस्थितियों को समझते हुये समझाने की जरुरत चौथे खम्भे यानी पत्रकारिता की थी । लेकिन पत्रकारिता ने भी आर्थिक सुधार के इस दौर में बाजार और मुनाफे का पाठ ही पढ़ना शुरु किया। जिस राजनीतिक सत्ता पर उसे निगरानी रखनी थी, उसी सत्ता की चाटुकारिता उसके मुनाफे का सबब बनी। और पत्रकारिता झटके में मीडिया में तब्दील होकर धंधे और मुनाफे का सच टटोलने लगी। धंधा बगैर सत्ता की सुविधा के हो नहीं सकता और राजनीति बगैर मीडिया के चल नहीं सकती। इस जरुरत ने बाजारवादी धंधे में मीडिया और राजनीति को साझीदार भी बनाया और करीब भी पहुंचाया।

पत्रकार भी इटंरप्नयूर बनने लगा। जो पत्रकारिता शिखर पर पहुंचकर राजनीति का दमन थामती थी और पत्रकार संसद में नजर आते उसमें नयी समझ कारपोरेट मालिक बनने की हुई। क्योंकि राजनीति बाजार के आगे नतमस्तक तो बाजार में मीडियाकर्मी की पैठ उसे राजनीति से करीबी से कहीं ज्यादा बड़ा कद देती। किसी मीडिया संस्थान में बतौर पत्रकार काम करने से बेहतर खुद का संस्थान बनाने और धंधे में सीधे शिरकत करने वाले को ही सफल मीडियाकर्मी माना जाने लगा। लेकिन चौथे खम्भे का संकट इसके बाद से शुरु हुआ जब वोट बैंक की राजनीति में सिनेमायी समझ घुसी और विकास का खांचा भी सिनेमायी तर्ज पर बनना शुरु हुआ। मीडिया सत्ता के उसी विकास को असल भारत मानने लगी जिसका खंचा राजनीति ने सिनेमा की चकाचौंध में बनाया। मीडिया ने भी इसका दोहरा दोहन किया। धंधे और मुनाफे के लिये राजनीतिक सत्ता की विकास की लकीर को ही असल इंडिया और किसी ने नहीं मीडिया ने ही बताया।

जाहिर है नौ फीसदी खेती योग्य जमीन इसी दौर में औधोगिक विकास के नाम पर स्वाहा की गयी । देशभर में छह फीसद जंगल खत्म किये गये। शहरों में 22 फीसदी तक की हरियाली खत्म हुई और कंक्रीट का जंगल 19 फीसद जमीन पर तेजी के साथ पनपा। उसी दौर में तीस हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की और करीब छह लाख से ज्यादा लोगों का वैसा रोजगार खत्म हुआ जो उत्पादन से जुड़ा था। पैसा लगाने और पैसा बनाने के इस सट्टा बाजार अर्थव्यवस्था के खेल ही राजनीतिक सत्ता की नीति बन गयी। मीडिया के लिये यह कोई मुद्दा नहीं बना और राजनीति ने कभी उस भारत को देश के विकास से जोड़ने की नहीं सोची जो इस चकाचौंघ की वजह से कहीं ज्यादा अंधेरे में समाता जा रहा था। राजनेताओ की सभा में राजू श्रीवास्तव सरीखे चुटकुले होने लगे और न्यूज चैनलों ने भी राजू की हंसी ठिठोली में अपने धंधे को आगे बढ़ते देखा। लोकतंत्र के चौथा खम्भा होने का भ्रम टीआरपी से निकले विज्ञापन ने कुछ यूं तोडा कि खबरों की परिभाषा भी बदली गयी और राजनीतिक सत्ता ने नयी परिभाषा को यह कह कर मान्यता दी कि मीडिया चलाने के लिये पूंजी तो चाहिये ही। यानी मीडिया की विश्वसनीयता का नया आधार पूंजी और उससे बनने वाले मुनाफे के दायरे में घुस गया। सरकार ने बाजार आगे घुटने टेक कर अनकही नीतियों के आसरे मीडिया को अपनी सिनेमायी सोच में ढाला भी और निर्भर भी बना दिया। विश्वसनीय न्यूज चैनलों में सिल्वर स्क्रीन के कलाकारों के प्रोग्राम तो छोटी बात हुई। कलाकारो से एंकरिंग करा कर पत्रकारिता के नये मापदंड बनाये गये।

ऐसा भी नहीं है कि यह सब नयी पीढी ने किया जिसने पत्रकारिता के संघर्ष को ना देखा-समझा हो। बल्कि प्रिंट पत्रकारिता से न्यूज चैनलों में आये वह पत्रकार ही इंटरप्यूनर की तर्ज पर उबरे और अपने सामने ध्वस्त होती राजनीति या कहें सिनेमायी राजनीति का उदाहरण रख नतमस्तक हो गये। जिस तरह सिनेमायी धंधे के लिये देश भर में महंगे सिनेमाघर बने और इन सिनेमाघरो में टिकट कटा कर सिनेमा देखने वालो की मानसिकता की तर्ज पर ही फिल्म निर्माण हो रहा है तो राजनीतिक सत्ता ने भी वैसी ही नीतियों को अपनाया, जिससे पैसे की उगाही बाजार से की जा सके। यानी मलटीप्लैक्स ने सिनेमा के धंधे का नया कारपोरेट-करण किया तो विकास नीति ने पूंजी उगाही और कमीशन को ही अर्थव्यवस्था का मापदंड बना दिया। और मीडिया ने सिल्वक स्क्रीन की आंखो से ही देश की हालत का बखान शुरु किया। खुदकुशी करते किसानो की रिपोर्टिंग फिल्म दो बीघा जमीन से लेकर मदर इंडिया के सीन में सिमटी। 2020 के इंडिया को दुबई की सबसे ऊंची इमारत दिखाकर सपने बेचे गये। नीतियों पर निगरानी की जगह मीडिया की भागेदारी ने सरकार को यही सिखाया कि लोग यही चाहते हैं
, यह ठीक उसी प्रकार है जैसे टीआरपी के लिये न्यूज चैनल सिनेमायी फूहडता दिखाकर कहते है कि दर्शक तो यही देखना चाहते हैं।

धंधे पर टिके सिनेमा की तर्ज पर मीडिया और उसी तर्ज पर राजनीतिक सत्ता के ढलने से तीस फिसद इंडिया में ही समूचा भारत देखने की समझ नीतिगत तौर पर उभरी। स्पेशल इकनामी जोन से लेकर टाइगर प्रोजेक्ट के घेरे में ग्रामीण समाज और आदिवासी हाशिये पर चला गया लेकिन ग्लोबल बाजार की पूंजी इन परियोजनाओ से जुड़ती चली गयी और सरकार को फायदा ही हुआ। वहीं मीडिया में विकास का आधार भी सत्ता के अनुकूल हो गया। यानी उपभोक्ता बनाकर बाजार पर निर्भर करने की मानसिकता से जुड़े तमाम खबरें हो या प्रचार विज्ञापन सबकुछ मीडिया ने आंख बंद कर छापा भी और न्यूज चैनलों में दिखाया भी। इतना ही नहीं सरकार की जिन नीतियों ने स्कूलों से खेल मैदान छिने
, मोहल्लो से पार्क छिने। रंगमंच खत्म किया । खेल स्टेडियम को फीस और खेल विशेष से जोड़ दिया उसमें समाज के सामने मनोरंजन करना भी जब चुनौती बनने लगा तो सिनेमा और सिनेमायी तर्ज पर न्यूज चैनलों को उसी राजनीतिक सत्ता ने प्रोत्साहित किया, जिसका काम इन तमाम पहलो को रोकना था। पूंजी पर मीडिया को टिकाकर सत्ता की सिनेमायी सोच ने पत्रकारिता के आयामों को ही बदल दिया। पत्रकारिता खुद ब खुद उस लघु पत्रिका का हिससा बन गयी जो नब्बे के दशक तक मुख्यधारा की पत्रकारिता को भी चुनौती देती थी। लेकिन उस दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता का मतलब कहीं ना कहीं सत्ता को चुनौती देते हुये बहुसंख्य लोगों से जुडे सवालों को उठाना होता था । और लघु पत्रकारिता विकल्प की सोच लिये विचारों का मंच बनाती थी। लेकिन नयी परिस्थितियों ने मुख्यधारा का मतलब सत्ता से करीबी और कारपोरेट पूंजी के तौर तरीकों से मीडिया को व्यवसायिक बनाकर आगे बढ़ाना है। इसमें खबर का मतलब सरकार की नीतिय का प्रचार और कारपोरेट धंधे के नये गठजोड़ होते हैं। और मनोरंजन से जुडी खबरे जो सिनेमायी धंधे को समाज का असल आईना बताती है। न्यूज चैनल का एंकर किसी नायक-नायिका की तर्ज पर खुद को रखता है और संपादक फिल्म प्रोडूसर की तर्ज पर नजर आता है। राजनेता का मापदंड भी उसके औरे से तय होता है। नेता का ग्लैमर , उसका लोगो से कटकर न्यूज चैनल के पर्दे पर लगातार बोलना ही उसकी महत्ता है। यानी एक तबके बर के लिये सिनेमा, उसी के लिये राजनीतिक सत्ता की नीतियां और उसी के मानसिक मनोरंजन के लिये मीडिया, लोकतंत्र का नया सच कुछ इसी परिभाषा में सिमट गया है। और लोकतंत्र बार बार पारंपरिक खम्भों की दुहाई दे कर एहसास करता है कि देश में सबका हक बराबर का है। हर कोई बराबर का नागरिक है। जिसका मापदंड चुनाव है जिसमें हर कोई वोट डाल सकता है और सभी का मत बराबर का होता है। यह अलग बात है कि वोट बैंक डिगाने के लिये नेता पूरी तरह सिनेमायी नायक-नायिका पर जा टिका है और मीडिया सिलवर स्क्रीन का आईना बन गया है।

कह सकते है पहले समाज का आईना फिल्म होती थी अब फिल्म का आईना समाज माना जाने लगा है । इसलिये सवाल माई नेम इज खान का नहीं है
, सवाल यह भी नहीं है कि है मनमोहन सिंह भी कहें, " माई नेम इज मनमोहन और मै पीएम नहीं हूं।" क्योंकि मै सीइओ हूं। लेकिन मीडिया से कौन निकल कर कहेगा कि माई नेम इज गणेश शंकर विद्यार्थी और मै पत्रकार नहीं हूं।

19 comments:

L.R.Gandhi said...

शुक्र है पत्रकारिता के चौथे खम्बे को चाटुकारिता का धंधा बनाने वालों को किसीने तो आइना दिखाया.....
पुण्य प्रसून वाजपाई जी .......आपने सच में पत्रकारिता का पुण्य कमाया है आज।

prashant said...

सही कहा आपने

परमजीत बाली said...

एक सार्थक पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा....चलो कुछ लोग ही सही ...ऐसे तो हैं..जो अपना सही धर्म निभा रहे हैं...धन्यवाद।

विजयप्रकाश said...

आज की राजनीति में "ग्लैमर" का घालमेल हो गया है, वस्तुतः राजनैतिक दल इनको भीड़ जुटाने तक ही महत्व देते हैं.मोहरा बना अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं बस.गोविंदा, संजयदत्त, जयप्रदा इसके अच्छे उदाहरण है."जहां की चीज वहीं रखें" ये अक्ल जनता को आनी चाहिये.
M.G.R.और N.T.R. जैसे बिरले ही होते हैं जो अपने बल-बूते राजनीति में आये और अपनी अमिट छाप छोड़ी.

Kulwant Happy said...

अगर पत्रकारिता में गुर्गे हैं तो वहां आप जैसे युवा सोच के पत्रकार भी हैं।


मीडिया पैसे के चक्कर में इस तरह पड़ गई कि अब चौथा खम्भा किसी राज नेता के घर का एक पोल बनकर रह गया।

पिछ्ले दिनों अपने दिल की बात आडवानी ने भोपाल में कह डाली थी, अब तो चुनाव मीडिया के लिए भी कारोबार उत्सव बन चुके हैं। आडवानी ने अपनी हार का दर्द सहन नहीं हुआ, और दिल का दर्द सच बनकर सामने आया।

यहाँ चापलूसों की जरूरत है, उम्दा विचार वाले को बागी करार दिया जाता है। मैं तो आता ही बागी खेमे में हूँ।

Devendra said...

"..लेकिन पत्रकारिता ने भी आर्थिक सुधार के इस दौर में बाजार और मुनाफे का पाठ ही पढ़ना शुरु किया। जिस राजनीतिक सत्ता पर उसे निगरानी रखनी थी, उसी सत्ता की चाटुकारिता उसके मुनाफे का सबब बनी। और पत्रकारिता झटके में मीडिया में तब्दील होकर धंधे और मुनाफे का सच टटोलने लगी। धंधा बगैर सत्ता की सुविधा के हो नहीं सकता और राजनीति बगैर मीडिया के चल नहीं सकती। इस जरुरत ने बाजारवादी धंधे में मीडिया और राजनीति को साझीदार भी बनाया और करीब भी पहुंचाया।.."

...आपके इस बेबाक लेख से मन को संतोष हुआ कि आज मिडिया में आप जैसी सोच रखने वाले और सच्चाई से अपनी बात कहने वाले लोग भी हैं..जो टीवी में दिखता है ..वह व्यापारी का मायाजाल है.
...अपराधी, राजनीतिज्ञ और नौकरशाही के गठजोड़
से देश पहले से ही त्रस्त था अब मिडिया और अभिनेता की भी इसमें बेशर्म भागीदारी परिलक्षित हो रही है....और तो और धीरे-धीरे इसमें क्रिकेट के खिलाडियों को भी शामिल करने में ये कामयाब हो चुके हैं...आपने इस पर तो अपनी कलम चलायी ही नहीं!

डॉ .अनुराग said...

९० % प्रतिशत बातो से सौ फी सदी सहमत ....पर ऐसा क्यों है के कोई भी पबिलक फिगर मीडिया को औजार बना कर इस्तेमाल कर लेता है ...जाहिर है ये दो तुरफा मुनाफा है .दूसरा ६० परसेंट पत्रकार अपनी निजी राय में आपकी चिंता से सहमत नज़र आते है ....पर उनके चैनल वही उन्ही पैमानों पर चलते नज़र आते है ....जाहिर है कोई भी ऐसा कार्य जो समाज के सार्वजानिक जीवन को प्रभावित करता हो ....वहां प्रतिबदता ओर ईमानदारी की अपेक्षा ज्यादा है ...क्यों नहीं कोई ऐसा पैमाना है जैसे किसी दूसरे फिल्ड में है ..यानी योग्यता का भी तो कोई मापदंड हो.....क्या इस देश को अच्छे पत्रकार संस्थान की जरुरत नहीं है ?

डॉ .अनुराग said...
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दीपक भारतदीप said...

यह संतोष का विषय है कि आपने अपनी बात पूरी ईमानदारी से स्पष्ट रूप से लिखी है। यकीनन आप अकेले वर्तमान हालातों में परिवर्तन नहीं ला सकते पर इतना तय है कि सत्य का निरंतर उजागर करने से अंततः बदलाव का वातावरण स्वयमेव कभी न कभी बन ही जाता है। बढ़िया लेख के लिये बधाई।
दीपक भारतदीप

अनुनाद सिंह said...

आपने सच कहने की कोशिश की है किन्तु मुझे लगता है कि अभी आधा सच ही कह पाये हैं।

Alok Nandan said...

फिल्म वालों को राजनीज्ञ भाई लोग भले ही गोद में बैठाकर लालीपाप खिलाये...टीवी वाले पत्रकार भाई लोग भले ही उनको उछालते रहे...आम आदमी राजनीतिक में उनकी भूमिका को नकारता ही रहा है...और कुछ फिल्म वाले भले ही संसद में भी अपनी लोकप्रिय छवि को भुना कर पहुंच गये हो...लेकिन राजनीति में लंबी रेस का घोड़ा नहीं साबित हुये हैं...फिल्मो से निकलकर राजनीति में आने वाले जिन लोगों ने यहां अपनी जगह बनाई है उन्हें जमीनी स्तर पर काम करना है...वैसे बाजारवाद का तानाबाना सबको घालमेल जरूर कर रा है

prabhatdixit said...

antatogatwa....

baap bada na maiya,

politics badi na medea,

bhaiya sabse bada ruppaiya.


(aapke liye bhi mere liye bhi sabhi ke liye)


khair jo bhi ho aapne achcha likha.
sukoon milta hai pal bhar ke liye,
kyunki jakhm to nasoor ban gaya hai.

अमृत कुमार तिवारी said...

आपका पोस्ट एक तरह से मीडिया, पॉलिटिक्स एंड सिनेमा का ऐकेडमिकनामा है।
माई नेम इज गणेश शंकर विद्यार्थी....और मैं पत्रकार नहीं हूं..।।।।
साहब झकझोर के रख दिया।

AAINA said...

Bhale hi TV ne aapki Patrkar hone ki swatartrata ko thoda sa badhit kiaa ho par is tarah ke lekh aapke Patrkar hone par koi sawal khada nahi karte isliye My name is Puny Prasun Bajpai aur mai aik Patrkar hu .

Sunil said...

mai ek media karmi hun aur main badi khabar ka regular viewer hun... ye utna hi sach hai jitna ki badi khabar ab aap lekar aate hain.. pahle bhi aata tha lekin main nahi dekhta tha... meri ek chhoti si khwahish hai ki badi khabar din me bhi ek baar phir se repeat ho... taaki main dekh sakun kabhi kabhi meri shift atpati hone ki wajah se main nahi dekh pata hun....

Shambhu kumar said...

इस मर्म को ऐसा नहीं है कि जातिसूचक पत्रकार नहीं समझते... लेकिन कुछ लखटकिया पत्रकारों की सैलरी के लिए पूरी मीडिया को ही गिरवी रख दिया गया है... आखिर पत्रकार अपना ही मुल धर्म क्रांति क्यों भूल गए हैं... रही बात रेवन्यू की तो वो पत्रकारिता की बदौलत और आ सकता है... जब तमाम लोगों को लगेगा की मीडिया गलत को गलत और सही को सही कह रही है... पैसे सबको चाहिए लेकिन किन शर्तों पर... शादय आप ही अंतिम आशा दिख रहे हैं... जरूरत है कुछ कदम आप और बढ़ाएं...

praveen parmar said...

सर आपने कम से कम पत्रकारों को आइना तो दिखाया पर क्रांति लाने के लिए भगत सिंह तो खुद ही बनना होगा |

VISHNU said...

लोग कहते हैं कि प्रभाष जोशी जैसा कोई नहीं हुआ, ये बात सही है। लेकिन मुझे लगता है कि वो कई प्रभाष जोशी बनाकर गए है। वो टीस, वो कसक, वो बेचेनी जो प्रभाष जोशी जी में दिखती थी, वो आप जैसे लोगों में दिखती है,और इसी लिए में कहता हूं..प्रभाष जोशी हमेशा हमारे बीच में रहेंगे।

ok said...

bilkul right sir i agree