Tuesday, July 3, 2012

"कृपया अपने साथ भेंटवस्तु या गुलदस्ते न लायें"


"कृपया अपने साथ भेंटवस्तु या गुलदस्ते न लायें" निमंत्रण पत्र के आखिर में इस एक लाइन को लिखने की परंपरा आरएसएस में गुरु गोलवरकर के दौर में ही शुरु हुई। समानता के भाव के साथ किसी भी उत्सव को मनाने और हर आमंत्रित व्यक्ति को एक ही खाके में रखने की संघ की सोच अब कितनी बची है, यह तो दूर की गोटी है लेकिन बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने सोमवार यानी 2 जुलाई की रात दिल्ली के अशोका होटल में अपने बेटे सारंग की शादी की खुशी में जो भोज दिया, उसके निमंत्रण पत्र के आखिर में गोलवरकर की इसी परंपरा को निर्वाह किया गया। 

परंपरा का बोझ कुछ ऐसा रहा कि राजनीतिक लकीर भी मिटी और उत्सव के लिये बांटे गये निमंत्रण पत्र की संख्या ने उत्सव को महाउत्सव में तब्दील करने की मंशा भी जतायी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और संजय जोशी से लेकर नरेन्द्र मोदी। नीतीश कुमार से लेकर येदुरप्पा और सदानंद गौडा से लेकर केशुभाई। और दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी से लेकर बीजेपी हेडक्वार्टर के दरबान तक को निमंत्रण भेजा गया। भोज में शामिल होने के लिये कर्नाटक का सदानंद गौडा धड़ा भी दिल्ली पहुंचा और गुजरात में मोदी से रुठा केशुभाई धड़ा भी। तो क्या नीतिन गडकरी संघ के उस रास्ते पर चल पडे है, जहां निमंत्रण सभी को दो लेकिन रास्ता अपना ही रखो। हो सकता है गोलवरकर इस परंपरा के ना हो लेकिन मोहन भागवत के दौर में बीजेपी को मथने के लिये संघ का निमंत्रण गडकरी के कार्ड सरीखा ही है। संजय जोशी को संरकार्यवाहक भैयाजी जोशी ने साफ कह दिया अभी राजनीति ना करें। भविष्य में सोचेंगे। केशुभाई को संकेत दिये पटेल तबका नरेन्द्र मोदी को क्षति पहुंचा सकता है लेकिन हरा नहीं सकता।

येदुरप्पा को सीधे कहा राजनीतिक संकट का रास्ता बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी सुलझायेंगे, आरएसएस बीच में नहीं पड़ेगा। और नीतिन गडकरी को नरेन्द्र मोदी को भरोसा दिया कि गडकरी संघ के नुमाइन्दे नहीं है, वह आडवाणी द्वारा सुझाये गये तीन नामो में से एक हैं, जिस पर संघ ने मुहर लगायी। यानी संघ का निमंत्रण पा कर कोई यह ना सोचे कि संघ उसके पीछे आ खड़ा हुआ है । फिर हर निमंत्रण देकर बुलाने वाले को जब पहले ही कहा जा चुका है कि कोई भेंट बस्तु ना लाये तो इसका मतलब साफ है कि बीजेपी के भीतर मचे घमासान में कोई अपना राजनीतिक कद दिखाकर आरएसएस को मोहने की कला ना पाले। यानी संकेत बीजेपी अध्यक्ष को लेकर अगर दिल्ली के कद्दावर बीजेपी नेताओ तक है तो प्रधानमंत्री के लिये मोदी की दावेदारी के जरिये एनडीए गठबंधन तक को संकेत है। यानी राजनीति से तौबा करने की संघ की फितरत में पहली बार सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि एनडीए को भी मथने की तैयारी निमंत्रण के साथ हो रही है। नीतीश मजबूत गठबंधन है यह बात गडकरी कहें। और मोदी मौजूदा वक्त में बीजेपी के सबसे मजबूत नेता है यह बात आरएसएस कहे तो नरेन्द्र मोदी अगर बिना बोले ही मजबूत हो रहे हैं तो मोदी को बोलने की जरुरत क्यों है ।

असल में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने लाने का जो निमंत्रण सरसघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाहक भैयाजी जोशी ने अपने तरीके से दिया उसने बेहद बारीकी से संघ की धारा के भीतर भी संघ के साथ खड़े तबकों को सीधा संकेत दे दिया कि अब वह किसी और नाम ना चलाये। यानी कोई भेंट वस्तु या कोई गुलदस्ता लेकर ना आये। असर इसका यह हुआ कि संघ के भीतर का सावरकर गुट [एम जी वैघ और प्रविण तोगडिया सरीखे], बीजेपी के भीतर का दिल्ली पंसद गुट[आडवाणी के पसंदीदा] और एनडीए के सहयोगी [नीतिश और ठाकरे सरीखे] सभी के सामने सवाल सीधा खड़ा हुआ कि उनकी राजनीति ताकत या उनका अपना औरा टिकता कहा है। इसलिये जैसे ही संक्यूलर प्रधानमंत्री की बात नीतीश ने उछाली वैसे ही बिना देर किये आरएसएस ने हिन्दुत्व की हेडगेवार परिभाषा सामने रख दी। जिसमें हिन्दुत्व में मुस्लिम और ईसाई को भी समाहित किया गया। इससे संघ के भीतर का सावरकर गुट खामोश हो गया जो मोदी को सावरकर के हिन्दुत्व की परिभाषा में समाहित करने की जल्दबाजी में था। यह मुश्किल बाला साहेब ठाकरे के सामने भी आयी क्योकि उनके हिन्दुत्व की उनकी सियासत में नागपुर [ हेडगेवार ] के मुकाबले पुणे [ सावरकर ]  मुंबई से ही नहीं बल्कि उनके राजनीतिक मिजाज और जरुरत में भी ज्यादा नजदीक है। आरएसएस पहली बार गठबंधन की राजनीति की उस जरुरत को भी अपना निमंत्रण पत्र भेजना चाहता है, जहां 2014 की बिसात की धुरी अगर नरेन्द्र मोदी बन जाते है तो केन्द्र में खुद ब खुद आरएसएस होगा। क्योंकि नरेन्द्र मोदी के लिये जो रास्ता संघ चाहता है और खुद मोदी भी अपने आप को उसी रास्ते पर चलाने को तैयार है वह विकास के सवाल खड़ाकर राष्ट्वाद को मुद्दा बनाने का रास्ता है। यानी गुजरात के जरीये हिन्दुत्व की जिस प्रयोगशाला का सवाल अभी तक उठता रहा उसपर खामोशी बरत नये जवाब मनमोहन सिंह के दौर में मुश्किल से जुझते आमलोगों के सवालों को उठाकर दिया जायेगा। जिसके दायरे में नीतीश हो बाल ठाकरे उन्हे अपना राजनीतिक रास्ता या तो नया बनाना होगा या फिर बीजेपी से मोदी उवाच जारी रखना होगा। यानी हर परिस्थिति में आरएसएस का मानना है कि 2014 के मद्देनजर अगर मोदी केन्द्र में रहेंगे तो उसकी जमीन संघ की राष्ट्रवाद की थ्योरी पर ही खड़ी होगी। और बीजेपी की हर मशक्तत भी अब हिन्दुत्व के आसरे नहीं बल्कि राष्ट्रवाद के आसरे दौड़ेगी। चाहे नीतिन गहकरी का निमंत्रण पत्र ही क्यों ना हो क्योंकि उस पर तो साफ लिखा है, "कृपया अपने साथ भेंटवस्तु या गुलदस्ते न लायें"

3 comments:

ANKUR BHARDWAJ said...

Sir koi tareeka hain aapke darshan ho jayen Internet par live ?
Hum To taras gaye hain bina TV ke ghar se bahar ? when will zee news be live on internet .Why is it behind?, Ye to zulm hain bhai.
Why there is no live streaming zee news ?

अरूण साथी said...

yah parampara aage barni chahiye

Brajesh said...

Dear Prasoonji,

Apka analysis kahen ya dissection kahen...jo bhi kahen..is very clear and jo rajneeti me interest rakhte hain...unke liye to tonic hai aapka blog..