Wednesday, July 11, 2012

"टाइम" ने किसको आईना दिखाया


टाइम पत्रिका ने मनमोहन सिंह को फेल कर दिया और नरेन्द्र मोदी को पास। बतौर इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह को फेल उस वक्त किया, जब प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्रालय छोड़ रायसिना हिल्स की दौड़ में जाड़े हुए और मनमोहन सिंह ने बतौर वित्त मंत्री अपना हुनर दिखाना शुरु किया। जबकि महज सोलह हफ्ते पहले ही नरेन्द्र मोदी को टाइम पत्रिका ने यह संकेत देते हुये पास किया कि जिस इक्नामी की जरुरत भारत को इस वक्त है, वह गुजरात के जरिये मोदी लगातार दे रहे है। तो क्या यह माना जा सकता है कि अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह पर हिन्दुत्व के सामाजिक प्रयोगशास्त्री नरेन्द्र मोदी भारी पर गये? अगर मोदी और मनमोहन को लेकर अर्थशास्त्र की कोई सामानांतर रेखा खिंचे तो दोनो में एक ही समानता खुले तौर पर सामने आती है। और वह है क्रोनी कैपटिलिज्म या कारपोरेट। मनमोहन सिंह ने चाहे क्रोनी कैपटिलिज्म का विरोध अपने भाषणो में किया और नरेन्द्र मोदी ने चाहे खुले तौर पर कारपोरेट की सत्ता से खुद की सत्ता को जोड़ा, लेकिन विकास के नाम पर जिन आर्थिक नीतियों को दोनों ने लागू किया वह पूरी तरह कारपोरेट के आसरे गवर्नेंस को खड़ा करना ही रहा।

मोदी हर बरस वाइब्रेंट गुजरात के जरिये कारपोरेट घरानों को जोड़ने का दायरा बढ़ाते चले गये और मनमोहन सिंह आर्थिक सुधार को अमल में लाने और पूंजी निवेश के लिये कारपोरेट के सामने नतमस्तक होते चले गये। क्योंकि 2004 ही वह साल जब केन्द्र में आरएसएस की वाजपेयी सरकार हारती है और नरेन्द्र मोदी को समझ में आता है कि अब उन्हे हिन्दुत्व की नहीं गवर्नेन्स की जरुरत है। क्योंकि दिल्ली में अब स्वयंसेवक वाजपेयी-आडवाणी नहीं, बल्कि विश्व बैंक और अमेरिकी हितों के आधार पर चलने वाले मनमोहन सिंह हैं। मनमोहन सिंह भी प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली विदेश यात्रा अमेरिका की ही करते हैं और पहले पांच बरस में पुराने सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 12 बार अमेरिका की यात्रा करते हैं।

संयोग से इसी पांच बरस में आधे दर्जन बार मोदी को अमेरिका जाने का वीजा दिये जाने से इंकार होता है और 2004 से पहले के गुजरात के दाग को ही मोदी की पहचान से उसी तरह जोड़ा जाता है, जैसे प्रधानमंत्री बनने से पहले मनमोहन सिंह को विश्व बैंक के अधिकारी के तौर पर देखा जाता था। और प्रधानमंत्री बनने के बाद यही पहचान दाग के साथ राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाती है। नरेन्द्र मोदी लगातार अमेरिकी नीति में खारिज होते है और मनमोहन सिंह लगातार राजनीतिक तौर पर अमेरिकी पिठ्ठू बनकर उभरते हैं। लेकिन 2009 के बाद जैसे ही राडिया टेप सामने आते हैं, मनमोहन सिंह के चकाचौंध का आर्थिक ढांचा भरभरा कर इसलिये गिरता है क्योंकि निशाने पर वही क्रोनी कैपटिलिज्म आता है जो एक वक्त मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल की रिपोर्ट कार्ड को ‘ए प्लस दिलाता’ रहा। और तमाम मंत्री पीएमओ को यह बताने में अपनी सफलता मानते रहे कि फंला कारपोरेट के जरिये फंला परियोजना का अमलीकरण शुरु हो गया है या फिर फंला कारपोरेट फंला परियोजना में निवेश करेग। यानी मंत्रियो के ताल्लुक कारपोरेट से और कारपोरेट की नजर भारत की उस जमीनी योजनाओं पर जहाँ से ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा बटोरा जा सके।

कारपोरेट की यह पहल किसी प्रतिक्रियावादी फंडामेंटलिस्ट की तरह रही, जहाँ विकास को लेकर पूर्ण सहमति पूंजी निवेश और मुनाफे पर चले। यह असफल होगा तो इसके असर क्या हो सकते हैं इसपर कभी कारपोरेट ने सरकार को सोचने नहीं दिया और सरकार ने सोचा नहीं। असल में मनमोहन सरकार के गवर्नेंस का मतलब ही मैनेजेरियल तौर तरीके रह गये। चूंकि मंत्रियो के समूह से लेकर नौकरशाही तक में कारपोरेट के लिये मैनेजेरियल हुनर को दिखना ही महत्वपूर्ण माना जाने लगा तो मनमोहन सफल कैसे और किस फ्रंट पर होते। वहीं नरेन्द्र मोदी इसलिये सफल माने जाने लगे क्योकि सिंगल विंडो निर्णय लिये जा रहे थे। मोदी ने कारपोरेट को आसरा दिया। कारपोरेट के कंधे पर सवार हुये। कारपोरेट के जरिये गुजरात को वाइब्रेंट बनाया। तो ताल्लुक, हुनर और निर्णय सीधे अपने पास रखे । यानी मोदी ने खुद को क्रोनी कैपटिलिज्म में बदल दिया । वहा मंत्रियो का समूह या नौकरशाही का काम सिर्फ मोदी के निर्देश को लागू कराना है । मंत्री या बाबू अपने हुनर से कारपोरेट के जरीये मोदी के सामने वैसे कद बढाने की सोच भी नहीं सकता जैसा मनमोहन सरकार के भीतर मंत्री और नौकरशाह करते रहे । मोदी को इसका लाभ मिला और मनमोहन सिंह के लिये यह घाटे का सौदा बनता चला गया । कारपोरेट के लिये मोदी ब्ल्यू आईड ब्याय हो गये तो मनमोहन फेल गवर्नेन्स के प्रतिक बन गये । चूकि गुजरात में नरेन्द्र मोदी ही हर संस्थान बने हुये है तो वहा संस्थानो की भूमिका भी मोदी की कारपोरेट वाहवाही में ढक गयी । लेकिन मनमोहन सिंह की मुश्किल यह रही कि गवर्नेस का मतलब उनके लिये लोकतंत्र के दूसरे स्तम्भो की भूमिका को भी जगह देना था । इसलिये सीएजी से लेकर सीएसी और सुप्रिम कोर्ट से लेकर गठबंधन के सहयोगियो ने ही उन्हे घेरा । अगर 2009 के बाद की परिस्थियो को याद करें तो आईपीएल से लेकर कामनवेल्थ और 2 जी स्पेक्ट्रम से लेकर कोयलागेट ।

कटघरे में मनमोहन सरकार ही खडी हुई । और उसके छिंटे कही ना कही उन संस्थानो पर भी पडे जिनकी भूमिका लोकतंत्र के लिहाज से चैक एंड बैलेस बनाने वाली होनी चाहिये थी । पूर्व चीफ जस्टिस बालाकृष्णन से लेकर सेना के पूर्व चीफ तक के नाम घोटालो से जुडे । राडिया टेप ने तो दिग्गज मिडिया घरानो के दिग्गज पत्रकारो को कटघरे में खडा कर दिया । संसद के भीतर हवा में लहराये नोटो के पीछे का खेल जो स्टिग आपरेशन के जरीये कैमरे में कैद हुआ उसे भी उसी सार्वजनिक नहीं किया गया । जबकि इस दौर में लगातार विपक्ष सरकार पर हमले भी करते रहा और सौदेबाजी से मुंह भी नहीं मोडा । सीपीएम ने मनमोहन सरकार को गिराना चाहा तो मुलायम-अमर की जोडी ने बचा लिया । भाजपा ने नोट के बदले वोट का खेल बताना चाहा तो संसदीय व्यवस्था ने सत्ता की व्यवस्था का खेल दिखलाकर व्हीसिल ब्लोअर को ही कटघरे में खडा कर दिया । इस पूरी प्रक्रिया में ऐसा क्या है जिसे टाईम पत्रिका ने समझा लेकिन भारत की मिडिया ने नहीं समझा । अगर बारिकी से हर परिस्थिति को देखे तो सत्ता के साथ मिडिया की जुगलबंदी का खेल पहली बार टाईम पत्रिका ही सामने लाती है । क्योकि मनमोहन सिंह को लेकर लगातार मिडिया की भूमिका एक ईमानदार प्रधानमंत्री वाली ही रखी गई ।

आर्थिक सुधार के जरीये दुनिया की बिगडी अर्थव्यवस्था के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर ही मनमोहन सिंह की छवि रखी गई । सवाल मंहगाई से लेकर भ्रष्ट्रचार और कालेधन को लेकर संसद से सडक तक कोई भी सवाल कही से भी उठे लेकिन इस दौर में पहली बार प्रभावी मिडिया घरानो ने संकेत यही दिये की चुनी हुई सरकार की लिजेटमसी पर अंगुली उठाना सही नहीं है । आलम यहा तक रहा है कालेधन पर नकेल कसने के लिये सुप्रिम कोर्ट ने सरकार की टास्कफोर्स के उपर अपने दो जजो को बैठाने की बात कही और दुनिया की रेटिंग कंपनियो ने भारत को नेगेटिव दिया लेकिन सरकार के नजरिये को ही प्रथमिकता मिली । और पूरे दौर में अक्सर यह सवाल उछलता रहा कि सरकार अगर पटरी से उतरी हुई है तो विपक्ष है ही नहीं । यानी शून्य विपक्ष के होने से मनमोहन सरकार कैसे भी काम करती रहे वह इसलिये मंजूर है क्योकि राजनीतिक तौर पर वह सत्ता में तो है । जाहिर है बडा सवाल यही उठता है कि क्या टाईम पत्रिका ने भारतीय मिडिया को आईना दिखाया है ।

क्या मनमोहन इक्नामिक्स ने मिडिया को भी उसी जमीन पर ला खडा किया है जहा सरकार की तर्ज पर सत्ता होने का सुकुन ही सबकुछ हो चला है । या फिर विपक्षहीन राजनीति की बात कहते कहते अंग्रेजी मिडिया इस भ्रम में गोते लगाने लगा है कि उसके मिडिया के भीतर भी विक्लप या विरोध की क्षमता खत्म हो चली है । और इसीलिये इस दौर में कारपोरेट ने मिडिया में भी अपनी साझीदारी शुरु कर दी है । यानी जिस कारपोरेट ने मोदी से लेकर मनमोहन को घेरा अब वह सहमति बनाने के लिये मिडिया को भी घेर रहा है । यह सवाल टाईम पत्रिका के कवर पेज पर अवसर खोने वाले मनमोहन सिंह या अवसर पाने वाले मोदी से कही ज्यादा बडा इसलिये है क्योकि मिडिया की धार अगर कारपोरेट के आसरे सत्ता के लिये म्यान बनने पर उतारु है तो फिर संकट मनमोहन सिंह के ननएचीवर होने का नहीं बल्कि भारतीय मिडिया के ननएचीवर होने का है । यानी मनमोहन सरकार को सफल होने के लिये विदेशी पूंजी निवेश चाहिये तो सरकार की इस गुलामी को समझने के लिये आम पाठक को टाईम सरीखी पत्रकारिता चाहिये । है ना कमाल । 

5 comments:

प्रवीण गुप्ता said...

वाजपेयी जी आप का आकलन बिलकुल ठीक हैं. आज की तारीख में पुरानी बासी नीतियों से काम नहीं चलने वाला हैं. देश को एक प्रबंधक की जरुरत है, ना की एक नेता की.

AAINA said...

AGAR PRADHANMANTRI KO AAP KHULE TAUR PAR AMERIKI PITTHU DECLARE KAR SAKTE HAI TO MEDIA KO KIS RUP ME DEKHTE HAI? TIME PATRIKA JO BHI HO...AAP USE KHUDA KYO BANA RAHE HAI....DES ME KYA KAM BAHAS MUBAHISA HAI JO BAHARI WAKTABYA PAR IS TARAH HAI TAUBA MACHA HAI...MAHIMAMANDIT KARNA MEDIA KA KAM HAI PAR KISE UCHALA JAAY..AB BHI USE PATA NAHI. KHABAR KA IMPACT KITNA HOGA..PURA MEDIA ISI SAWAL SE JUJHTA HAI (GALAT SAHI KI FIKR KIYE BINA) YAHA TAK KI DES KE SAMMAN KI DHAJJIYA UD JAAYE PAR KHABAR HONI CHAHIYE. BAHAR KI KOI PATRIKA(KOI BHI)KUCH BHI KAH DE CHAHE SAHI HI PAR DES KA PRADHANMANTRI (KHRAB ACHAA) HAMARA HAI...USE DUBARA NA CHUNANE KA HAQ HAMARA HAI. KOI BAHAR WALA HAME KYA AAIYNA DIKHAYEGA JABKI AIK AIK CHIJ SAMNE KHULI HUI HAI AUR PHIR BHI HAM KUCH KAR NAHI SAKTE TO WO HAMARI APNI SAMSAYA HAI..AISE ME HAM SIRF TIME PATRIKA KA ADVERTISEMENT KAR RAHE HAI AUR KISI KO BHI HAQ DE RAHE HAI KI JO KAHANA HAI KAHTE JAWO HAM TO AAPSE HI REFERENCE LE RAHE HAI..JAB AAP BHI IS NISKARSH PAR NAHI PAHUCH PAAYE KI AIK HI LAKIR PAR CHAL KAR MANMOHAN KYO FAIL HO GAYE AUR MODI KYO PAAS HO GAYE..? KYA IS BAAT KI WAKALAT KARNA CHAHTE HAI KI MODI KI TARAH MANMOHAN KO BHI AIK SANSTHA BAN JAANA CHAHIYE?

अजय कुमार झा said...

आपने पोस्ट लिखी ,हमने पढी , हमें पसंद आई , हमने उसे सहेज़ कर कुछ और मित्र पाठकों के लिए बुलेटिन के एक पन्ने पर पिरो दिया । आप भी आइए और मिलिए कुछ और पोस्टों से , इस टिप्पणी को क्लिक करके आप वहां पहुंच सकते हैं

sharad said...

aaj hamare samne itne sare bhrashtachar ke mamle, hai par na media, na vipaksh, us par ek rag mai aawaj uthata hai. media us khabar ko follwoe q nahi karta. do deen us khabar ko chlakar chod dete hai. corporet gharano ke haat me media hone ke karan hee media unke hatho ki kat putle ban gaye hai. par hum aap jese logo se abhi bhi umeed hai.. aap ye sab sawal BADI KHABAR par lao...

Manu said...

politics पर तो आपति टिपण्णी जबरदस्त होती है| पर आज आपका चैनल गुवाहाटी का बेशर्म विडियो बार बार दिखा रहा था| बिना उस लड़की की मानसिक स्तिथि की चिंता किये | कृपया बताएं यह मुद्दे पर मीडिया को आइना दिखेंगे आप?