Thursday, July 19, 2012

"आज हिन्दुस्तान के सामने कोई एजेंडा नहीं है"


वर्तमान समय की पत्रकारिता के एतिहासिक परिपेक्ष्य में पुण्य प्रसून वाजपेयी की प्रो.इम्तियाज अहमद से बातचीत-


पुण्य प्रसून- प्रो.साहब क्या यह माना जाए कि वर्तमान समय में जो पत्रकारिता चल रही है, वह एक शून्य अवस्था में आ गई है या फिर इस दौर की जरूरत ही कुछ ऐसी है। ऐसे में अगर हम तीन दशक पीछे जाएं यानी 70-80 के दशक की बात करें, जब प्रभाष जोशी पत्रकारिता कर रहे थे और उस समय की जो पत्रकारिता थी, उस संदर्भ में आज को कैसे देखा जाए?

प्रो.इम्तियाज अहमद- मेरा ख्याल है कि जो शून्यता आज आप देख रहे हैं, उसके कई कारण हैं। उसमें पहला कारण तो यही है कि एक पीढ़ी के पत्रकार सरकार से भयभीत नहीं होते थे। उसकी आलोचना करने से भी नहीं डरते थे। और इसलिए वे मुद्दे उठाते थे। देश की जो समस्याएं रही हैं और जो मुद्दे थे, वही उनकी लेखनी के मूल में होता था। वह पीढ़ी धीरे-धीरे कम होती गई। उसमें चाहे गिरीलाल जैन हों या फिर श्यामलाल। पत्रकारिता की वो जो परंपरा थी धीरे-धीरे कम हुई है। पर इसके मायने यह नहीं लगाए जाने चाहिए कि आज के दौर में उस प्रकार का कोई पत्रकार है ही नहीं। आज भी महत्वपूर्ण मुद्दे उठ रहे हैं। पत्रकार खड़े हुए हैं और उन्होंने स्टैंड भी लिया है।

पुण्य प्रसून- आपने कहा उस समय जो पत्रकार काम कर रहे थे, उनमें डर नहीं था। डर किस बात को लेकर नहीं था। और आज किस बात को लेकर है ?

प्रो.इम्तियाज अहमद- उस समय इस बात को लेकर डर बिल्कुल नहीं था कि राज्य क्या सोच रहा है और सरकार क्या सोच रही है, हम उसको सामने रखते समय उस सीमा तक लिखेंगे, जहां हमें अपनी स्वतंत्रता व निजी विचार को अभिव्यक्ति करने का अधिकार छोड़ना नहीं पड़ेगा। मेरे कहने का मतलब यह है कि आलोचना तीखी करें या फिर हल्की-फुल्की, वह इसपर निर्भर करता है कि हम क्या सोच रहे हैं और कैसी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं। अपनी राय जाहिर करने या फिर आलोचना करने में पत्रकार डरते नहीं थे। एक समय था जब पत्रकारों ने नेहरू की भी आलोचना की। इंदिरा गांधी भी आलोचना से बची नहीं। उन्होंने जो कदम  उठाए उसपर भी लोगों ने आपत्ति जाहिर की। उनकी आलोचना की। उनसे साफ-साफ कहा कि आप गलत कर रही हैं। आप देखिए, आज भी देश में आपातकाल के नाम पर जो मोबलाइजेशन है, उसमें बहुत बड़ा योगदान पत्रकारिता का ही रहा है। मैं समझता हूं कि वह परिस्थिति दूसरी थी।

पुण्य प्रसून- इसका एक मतलब यह माना जाए कि उस दौर की जो राजनीतिक अवस्था थी और जो पत्रकारिता थी इन दोनों ही क्षेत्रों से जो लोग निकलकर आ रहे थे वे देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थिति के बीच से निकल रहे थे।

प्रो.इम्तियाज अहमद- हां, मैं तो यह कहूंगा कि किसी भी देश की राजनीति और उसकी पत्रकारिता समाज के घटनाक्रम से प्रभावित होती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि मीडिया और राजनीति समाज का दर्पण हैं, लेकिन अब मुझे ऐसा लग रहा है स्पष्ट और निडर लेखन की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

पुण्य प्रसून- आपने कहा कि मीडिया दर्पण है या फिर उसका एक अक्स नजर आता है। पर क्या आपको नहीं लगता कि आज के दौर में पहली बार राज्य अपने स्तर पर इतना हावी है या उसने अपनी जमीन पर ही सारे संस्थाएं खड़ी कर लीं हैं।

प्रो.इम्तियाज अहमद- यहां मैं दो बात कहूंगा। पहली बात तो यह कि आज से बीसेक साल पहले इस पर राष्ट्रीय सहमति थी कि हमें विकास करना है और आगे बढ़ना है। इसलिए किसी भी आलोचना का स्वागत होता था। यदि आप सरकार को बताएं और दिखाएं कि हमें इस रास्ते से नहीं, बल्कि उस रास्ते से चलना चाहिए तो सरकार उसका स्वागत करती थी और जनता भी बात ध्यान से सुनती थी। आज वह परिस्थिति नहीं है। और वह परिस्थिति इसलिए नहीं है, क्योंकि समाज में विकास हीनता या विकास शून्य की वर्तमान परिस्थिति में राजनीति करने वाले अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। वे इसके लिए तैयार नहीं है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी पोल खुलने का डर रहता है। दूसरी बात जो मैंने अब से पहले नहीं कही है, वह यह कि कार्पोरेट जगत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है जो यह चाहता है कि आलोचना न की जाए और सरकार
उनके दिखाए रास्ते पर चले।

पुण्य प्रसून- कार्पोरेट के सवाल पर मैं अभी लौटता हूं। पर इससे पहले, आपने जो कहा उसी आधार पर मैं जानना चाहता हूं कि राज्य अगर विकास की धारा से जुड़ना चाहता है तो अखबार यानी मीडिया उसे समझाने या फिर दिशा देने का काम करता है। पर आपातकाल के दौरान तो ऐसा नहीं था। सरकार बिलकुल नहीं चाहती थी कि उसकी आलोचना हो। हंटर की नोक पर सभी को रखा गया था।

प्रो.इम्तियाज अहमद- आपातकाल की स्थिति थोड़ी भिन्न थी। जब देश में आपातकाल को लागू किया गया तो सेंसरशिप आई। पर उस दौरान भी पत्रकारों ने एक भूमिका निभाई। वह भूमिका यह थी कि कई अखबारों के संपादकीय पेज तक खाली गए, क्योंकि जिस माध्यम से आप अपना आक्रोश और सरकार की आलोचना कर सकते थे, वहां खामोशी थी। उसकी गुंजाइस नहीं थी। मैं यह कहूंगा कि बेशक थोड़े समय ही, उस दौरान जो कुछ हो रहा था उसमें मीडिया ने अपनी भूमिका निभाई। वह तुर्कमान गेट वाली घटना हो या परिवार नियोजन को लेकर चल रही ज्यादतियां। इन सब पर मीडिया ने अपना काम किया। पर क्योंकि वातावरण काफी दबावपूर्ण था, इसलिए वे उन मसलों को जोर-शोर से उठा नहीं सके। यदि वे ऐसा करते तो उनके खिलाफ कार्रवाई होती। अत: उससे लोग डरे। वहीं से सरकार से डरने की परंपरा चली, जिसे हम आज साफ-साफ देख रहे हैं। हां, कुछ दिग्गज पत्रकार हुए हैं, प्रभाष जोशी को मैं उनमें एक महत्वपूर्ण स्थान दूंगा, जिन्होंने अपने फायदे और नुकसान को बगल कर
निर्भीक लेखन की परंपरा शुरू की और उसे चलाई। अब मैं समझता हूं कि उनकेचले जाने के बाद हमारी पत्रकारिता जगत में एक रिक्तता पैदा हुई है, क्योंकि उस किस्म का पत्रकार आज कम है।


पुण्य प्रसून- आपने अभी कारपोरेट पर अपनी राय जाहिर की है। दूसरी बात प्रभाषजी के लेखन का भी जिक्र किया। उसी समय राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स में थे। एस.पी.सिंह उनके अंदर काम कर रहे थे। जनोन्मुखी पत्रकारिता एक लिहाज से वे भी कर रहे थे। दूसरी तरफ प्रभाषजी भी कर रहे थे। प्रभाषजी के साथ रामनाथ गोयनका थे जो सीधे लड़ाई लड़ रहे थे। अब हम यह क्यों न मानें कि अखबार का मालिक ही यदि राजनीति को चुनौती देने निकल पड़ा है तो उसके अंदर काम करने वाला पत्रकार किसी भी हालत में आक्रामक होगा। वह ‘प्रभाषजी ए’ हों या फिर ‘प्रभाषजी बी’।

प्रो.इम्तियाज अहमद- देखिए मैं आपको बताउं, जो अखबार या मीडिया को नियंत्रित करता है यानी जिसके पास उसे संचालित करने का अधिकार होता है वह अपने दृष्टिकोण और परिकल्पना के हिसाब से चाहता है कि कार्यक्रम चले और उसमें फलां की तारीफ की जाए। लेकिन इस परिस्थिति के बावजूद अच्छा पत्रकार वही होता है जो इस दबाव के बीच भी रास्ता ढूंढ़ लेता है यानी वह सूई में से हाथी निकाल देता है। कोई जरूरी नहीं है कि आलोचना सीधी और प्रत्यक्ष हो। अपनी बात कहने के दूसरे रास्ते निकाले जा सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि वैसे कम लोग रहे, जिनमें ऐसी महारथ थी कि अगर सीधी आलोचना नहीं कर पा रहे हों तो अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना करते थे। आप देखिए आपातकाल के दौरान कइयों ने ऐसे उदाहण रखे। अखबार का पूरा का पूरा पेज खाली छोड़ दिया।

पुण्य प्रसून- जनता प्रयोग असफल हो गया था। उसके बाद जनसत्ता निकलता है। गोयनका को महसूस होता है कि इसे शुरू किया जाए। यानी एक राजनीतिक रिक्तता महसूस की जा रही थी। मुझे जहां तक याद आ रहा है कि तभी चंद्रशेखर भी यात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे थे। लोगों को तब यह समझ में नहीं आ रहा था कि राजनीतिक तौर पर उनकी क्या भूमिका होगी। इंदिरा गांधी सत्ता में थी। भिंडरावाला को लेकर पंजाब का संकट जटिल हो गया था। वहां बड़ी घटनाएं घटीं। क्या आप यह महसूस करते हैं कि उस दौर में राजनीतिक जरूरत थी किसी ऐसे अखबार के आगे बढ़ने की या फिर ऐसे पत्रकारों को आगे बढ़ाने की? जिसका लाभ कहीं न कहीं रामनाथ गोयनका भी उठा रहे थे और प्रभाषजी की पत्रकारिता भी पैनी हो रही थी। हम बहस को थोड़ा और आगे बढ़ा दें, क्योंकि उस समय पहली बार ऐसा मौका आया, जब वीपी.सिंह जनता के सामने आए तो उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के पीछे मीडिया का हाथ माना जाए तो वह क्षेत्रीय मीडिया था यानी हिन्दी मीडिया था। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के युवा पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे। तब क्षेत्रीय पत्रकारिता में जो पैनापन आया वह एक राजनीतिक जरूरत थी जो जनता दौर में फेल हो चुकी थी। क्या ऐसा न
माना जाए। और आज के संदर्भ में देखें तो ऐसी कोई जरूरत ही नहीं है।

प्रो. इम्तियाज अहमद- असल में यह एक व्यापक मुद्दा है। पहली बात तो यह कि क्षेत्रीय पत्रकारिता के महत्वपूर्ण विकास के पीछे कई प्रवृत्तियां हैं। एक तो सोशल मोबेलिटी। दूसरा यह कि विकास के जो वर्ष थे उसका नतीजा यह था कि छोटे-छोटे गांव में एक वर्ग पैदा हो गया था, जिनका राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति उतना रूझान नहीं था, जितना की क्षेत्रीय मुद्दों के प्रति था। राजनीति को लेकर भी उनकी रुचि क्षेत्रीय स्तर तक ही थी। और फिर क्षेत्रीयकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई उस दौरान एक तरफ तो राष्ट्रीय मीडिया चल रहा था, लेकिन दूसरी तरफ क्षेत्रीय अखबारों की बिक्री बढ़ी। इतना ही नहीं, एक वह व्यक्ति जिसे कल तक राष्ट्रीय मीडिया जगह नहीं देता था, नई परिस्थिति में उसकी तस्वीर व खबर हर अखबार में छपने लगी। वह दैनिक जागरण हो, दैनिक भास्कर हो या फिर राष्ट्रीय सहारा अब सभी में उसकी खबरें छप रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मीडिया में उसकी उपस्थिति जो नहीं थी, वह हो गई। यह प्रभाव पड़ा। दूसरी बात यह थी कि इंदिरा गांधी के बाद देश में क्षेत्रीयकरण की राजनीति प्रक्रिया शुरू हुई। जिसके तहत मुलायम सिंह यादव, पटनायक आदि खड़े हुए।  क्षेत्रीय राजनीति का दौर चल पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि केंद्र नेतृत्व अधिक शक्तिशाली हो चला था। इंदिरा गांधी के आखिरी वर्षों में सत्ता का केंद्रीयकरण हुआ, उसके खिलाफ ही ये क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां पैदा हुईं। आप जो क्षेत्रीय मीडिया और क्षेत्रीय राजनीति के बीच लिंक की बात कह रहे हैं वह यहीं से पैदा हुआ है, क्योंकि क्षेत्रीय राजनीतिज्ञों को एक माध्यम चाहिए कि कोई मीडिया में उनकी आवाज उठाए। क्षेत्रीय मीडिया के आने से उन्हें यह सुविधा प्राप्त हो गई।

पुण्य प्रसून- इसका दूसरा हिस्सा अगर यह माना जाए कि राजनीति इस दौर में बढ़ते हुए इतनी आगे निकल गई कि उसकी कमजोरियों को कार्पोरेट ने पकड़ लिया। मीडिया को भी कार्पोरेट ने पकड़ा। क्या यह माना जाए कि कार्पोरेट इस दौर में केंद्र में आकर खड़ा हो गया है।

प्रो.इम्तियाज अहमद- दरअसल, मुश्किल यह है कि इस मुल्क में पिछले आठ सालों से राजनीति और राजनेताओं को डीलेटिजमाइट करने की एक बहुत ही मजबूत कोशिश हुई है। कहा जाने लगा कि सारे राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं, लेकिन जो कार्पोरेट राजनीति है वह यह है कि अगर हम अच्छे मैनेजर हैं तो फिर एक राजनीति विहीन ढांचा खड़ा क्यों न करें! राजनीतिज्ञों की क्या जरूरत है।

पुण्य प्रसून- यह स्थिति इसलिए आ गई, क्योंकि उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। प्रो.इम्तियाज अहमद- नहीं, बल्कि वह इसलिए, क्योंकि हम अच्छे मैनेजर हैं। देश को चला सकते हैं। और ये जो राजनीतिज्ञ हैं, वे काम में एक बड़े बाधक हैं उन्हें डी-लेजिटिमाइट करिए। पर इस डी-लेजिटिमाइजेशन के बावजूद इसे आप दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य मुझे लगता है कि इस देश में राजनीतिज्ञों की एक लेजिटिमेसी है। और वह इसलिए है कि संविधान के ढांचे में संसद का जो महत्व है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आप उसे बदलना चाहेंगे तो संविधान नए सिरे से लिखना पड़ेगा जो संभव नहीं है। इसलिए इस संवैधानिक संरचना में राजनीतिज्ञ से बचाव मुश्किल है, वह रहेगा। हां, महत्वपूर्ण बात यह है कि वे कैसे इस परिस्थिति में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि वह नहीं हुआ। पर जब-जब जरूरत पड़ी और कोई संकट का दौर आया तो राजनीतिज्ञों ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया। जिस समय अन्ना हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था और वे चुनौती दे रहे थे कि जनलोकपाल बिल को पास किया जाए, उस समय संसद में जो बहस हुई वह उच्च स्तर की थी। उस समय सबस्टैनशिएल इसु उठाए गए और कहा गया कि संसद को आप डिक्टेट नहीं कर सकते। खैर, मेरा ऐसा अनुमान है कि न तो इसमें कार्पोरेट सक्सिड करेगा और न ही इसमें सिविल सोसाइटी के मुवमेंट एक हद के बाद सक्सिड करेंगे, क्योंकि मैं यह महसूस कर पा रहा हूं कि सिविल सोसाइटी मुवमेंट और कार्पोरेट में काफी ताल-मेल है। और इसकी वजह सिविल सोसाइटी को कार्पोरेट द्वारा मिल रही वित्तीय सहायता है। मेरा मानना है कि वह शोर जरूर मचाएगा,पर इस देश की राजनीति को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर पाएगा। हां, जिससे प्रभाव पैदा होगा वह एक राजनीतिक प्रक्रिया होगी। यह अलग बात है कि आज हमारे देश में एक वैचारिक शून्यता है, जिसे आप राजनीति शून्यता कह रहे हैं। ऐसी स्थिति इसलिए है, क्योंकि राजनीतिज्ञों को मालूम नहीं है कि आज उन्हें किस दिशा में जाना है। जिस दिन दिशा को लेकर राजनीतिज्ञों में आम सहमति बन जाएगी, विकास की प्रक्रिया बढ़ेगी।

पुण्य प्रसून- आपने डी-लेजिटिमेसी की बात की। संविधान में यह लेजिटिमेसी चूंकि संसद को है इसलिए आप उसके खिलाफ खड़े नहीं हो सकते। हमारा कहना है कि फोर्थ स्टेटे को लेकर संविधान संकेत तो देता ही है कि उसकी अपनी लेजिटिमेसी है, जिससे चेक एंड बैलेंस की स्थिति रहती है। तो क्या मीडिया की वैचारिक शून्यता के इस दौर में भी वह अपनी महत्ता बरकरार रखे हुए है?

प्रो.इम्तियाज अहमद- देखिए, मैं हमेशा एक बात कहता हूं कि जब हम मीडिया शब्द इस्तेमाल करते हैं तो हमारी दृष्टी एकांगी हो जाती है, जैसे सारा मीडिया एक ही हो। इस देश की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हमारे यहां मीडिया में सबसे ज्याद विविधता है। ठीक उतनी ही विविधता है जितनी की समाज में है। इसलिए कोई एक मत मीडिया के केंद्र में नहीं है। न कोई एक स्टैंड वह ले रहा है। उसके ऊपर दबाव काफी है। आप देखेंगे कि पूरी तरह कार्पोरेट के सहयोग से जो अन्ना आंदोलन चल रहा था तो ऐसा नहीं था कि हिंदुस्तान का पूरा मीडिया उसकी वाह-वाही में लगा था। वहां उसकी आलोचना भी हो रही थी। हमारे यहां मीडिया की जो विविधताएं हैं, वही उसकी सबसे बड़ी धरोहर है। वह इसलिए, क्योंकि इसके माध्यम से आप कोई यूनिफाइड पॉलिटिक्स नहीं कर सकते हैं।

पुण्य प्रसून-अन्ना आंदोलन के वक्त प्रभाषजी और रामनाथ गोयनका होते तो क्या वाकई कोई नई चीजें निकल कर आती? हालांकि, आंदोलन के बाबत आप जिस आलोचनात्मक रिपोर्ट की चर्चा कर रहे थे वैसी खबरें इंडियन एक्सप्रेस में छप रही थीं। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों पर जो आरोप लग रहे थे वो खबरें भी अखबार में छप रही थीं। पर क्या उन दोनों के होने से कुछ अलग स्थिति होती?

प्रो.इम्तियाज अहमद- देखिए मैं जिस पीढ़ी का प्रभाष जोशी को प्रतिनिधि मानता हूं उस दौर में महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि केवल आलोचना की जाए। महत्व की बात यह भी थी कि विकल्प भी सुझाए जाएं। कोई दूसरा रास्ता भी दिखाया जाए। अगर अन्ना हजारे पर प्रभाष जोशी को लिखना होता तो केवल वे अन्ना की आलोचना न करते, बल्कि एक विकल्प दिखाते। यह बताते कि आप फलां रास्ते से जाएंगे तो शून्य पर पहुंचेंगे जो परिस्थितियां आज पैदा हुई हैं। अन्ना हजारे ने आज खुद अपने को डीलेजिटिमाइज कर दिया। प्रभाष जोशी होते तो यह न होता। वह इसलिए न होता, क्योंकि एक वैकल्पिक रणनीति उनके दिमाग में होती जो वे लिख रहे होते।


पुण्य प्रसून- इसका मतलब यह है कि कभी मौजूदा परिस्थिति से आगे देखने की दृष्टि पत्रकारिता में रही है।

प्रो.इम्तियाज अहमद- मैं यह कहूंगा कि जरूर रहा है। दूरदर्शिता और रास्ता दिखाने की क्षमता भी पहले ज्यादा थी। आज के दौर में यह कम हुई है। हालांकि, कुछेक लोग अब भी हैं। हिंदुस्तान के दो-तीन अखबार अब भी ऐसे हैं जिनमें पुरानी परंपरा अब भी बची हुई है। अन्यथा वह कमजोर ही हुई है। हम अपनी राय लोगों के रुख को देखकर तय करते हैं। अब लोगों को रुख देने की कोशिश नहीं करते।


पुण्य प्रसून- आपने एक बात और कही कि कार्पोरेट का पैसा सिविल सोसाइटी में लगा हुआ है, लेकिन ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जहां राजनीति में चुनाव लड़े जाते हैं तो कार्पोरेट का पैसा लगता है। इतना ही नहीं, अब हर सांसद के पीछे भी कार्पोरेट आकर खड़ा हो गया है। इनके माध्यम से ही वह संसद के भीतर नीतियों को भी प्रभावित कर रहा है। राज्यसभा में ऐसे तकरीबन 125 सदस्य हैं जो खुद अपनी कंपनी चलाते हैं या फिर कंपनियों से जुड़े हैं। वे लगातार कार्पोरेट के हक की बात करते हैं। तो क्या अब कार्पोरेट सिविल सोसाइटी को वित्तिय सहायता देकर एक संतुलन की स्थिति बनाए रखना चाहता है? वह यह सोच रहा है कि केवल राजनीतिज्ञों को पैसा दिया गया तो वह उन्हें बर्बाद कर सकता है, इसलिए सिविल सोसाइटी को एक माध्यम के रूप में चुना है ताकि उसे वित्तिय सहायता देकर एक संतुलन की स्थिति रखी जा सके। यानी
दोनों तरफ से वही खेल रहा है।

प्रो.इम्तियाज अहमद- आपकी बात सही है। मैं यह समझता हूं कि कार्पोरेट सेक्टर और प्रतिक्रियावादी फंडामेंटलिस्ट में एक समानता है। वह समानता यह है कि दोनों एक कॉन्ससनेस पैदा करना चाहते हैं। इसके पैदा होने के बाद वे सिविल सोसाइटी को नियंत्रित करना चाहते हैं। जब इसपर नियंत्रण हो गया तो फिर सत्ता पर नियंत्रण करना चाहते हैं। आप देख लें चाहे वह तालिबान हो, आरएसएस हो या फिर कार्पोरेट सेक्टर, इनकी नीति वही एक है। आप देखिए कार्पोरेट ने भूमंडलीकरण को लेकर तमाम सपने दिखाए। बताया कि बस अब कामयाबी के रास्ते खुले हुए हैं। यह नहीं बताया कि अगर असफल हो गए तो क्या होगा। आज देखिए असफल होने के कितने परिणाम लोगों को भुगतने पड़ रहे हैं। कार्पोरेट सेक्टर ने एक तरह की कॉन्ससनेस पैदा कि जिसे मैं लिब्रल मटेरियलिस्ट कॉन्ससनेस कहता हूं। मतलब यह कि साहब आपकी सफलता का मापदंड इसमें नहीं है कि आप कितने अच्छे आदमी हैं। कितने इमानदार हैं, बल्कि इसमें है कि आप कितने कामयाब हैं।


पुण्य प्रसून- कामयाबी किस प्रकार की?

प्रो.इम्तियाज अहमद- आर्थिक रूप से आप कितने कामयाब हैं। बड़ी कंपनियों में आप किस पायदान पर हैं। यानी कामयाबी का यही मापदंड मध्यवर्ग ने इस देश में पूरी तरह अपना रखा है। खैर, अब सिविल सोसायटी के संदर्भ में देखते हैं। सिविल सोसायटी को नियंत्रित करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे आप दोनों तरफ कॉन्ससनेस पैदा कर सकते हैं। यह एक यंत्र है जिससे आप उस जंग को छेड़ सकते हैं, जिसे प्रत्यक्ष रूप से आप नहीं लड़ सकते हैं। और जब ये दोनों प्रवृतियां पूरी तरह विकसित हो जाएंगी तब हिंदुस्तान एक कॉरपोरेट एडमिनिस्ट्रेशन के हाथों में चला जाएगा। वह राजनीतिज्ञों के हाथ में नहीं रहेगा। लेकिन यह वह परिस्थिति इसलिए खड़ी नहीं हो रही है या फिर मेटर-लाइज्ड नहीं हो रही है, क्योंकि आपका जो पूरा संवैधानिक ढांचा है, उसमें इसके लिए अभी कोई जगह नहीं है। आगे चलकर क्या परिस्थितियां पैदा
होंगी, उस संबंध में फिलहाल कुछ नहीं कह सकता।


पुण्य प्रसून- क्या वैचारिक शून्यता की यही बड़ी वजह है?

प्रो.इम्तियाज अहमद- हां है। वैचारिक शून्यता इसलिए भी है, क्योंकि विकास की दिशा पर कोई सहमति नहीं है। इस देश में विकास किस रूप में और किस दिशा में जाना चाहिए। विकास के क्या मायने हैं। विकास किसका होना चाहिए। यह तय नहीं हो पाया है। आप गरीबों को समुद्र में फेंक दें, आजकल एक यह विचार भी है। तो मैं कहता हूं कि जब तक समाज में कॉन्ससनेस पैदा नहीं होगा, वह अस्त-व्यस्त ही रहेगा। आज मैं यह कहूंगा कि चूंकि वह पुराना कॉन्ससनेस टूट गया और उसकी जगह हम
नया कॉन्ससनेस पैदा नहीं कर सके, इसलिए आज हिंदुस्तान के सामने कोई एजेंडा नहीं है। मुझे याद है 1962 में रमेश थापर के साथ मिलकर मैंने एजेंडा फॉर इंडिया नाम से 70-72 पेजों का दस्तावेज तैयार किया था। आप मुझे ऐसा एक बुद्धिजीवी बताएं जो इस दिशा में काम कर रहा हो कि ‘हिन्दुस्तान का फ्यूचर एजेंडा क्या हो’। हम पाते हैं कि ऐसा कोई नहीं है। और जब नहीं है तो आप जिस राजनीतिक शून्यता की बात कर रहे हैं, वह इसकी स्वाभाविक देन है। अब इस शून्यता से निकलने के लिए चिंतन के दौर से गुजरना होगा। जब तक हम इस प्रक्रिया से नहीं गुजरेंगे और आम सहमति नहीं बनेगी, तबतक विकास की प्रक्रिया मद्धिम रहेगी। हम रेंगते रहेंगे।


पुण्य प्रसून- क्या मैनेजेरियल कार्य पद्धति हमें रेंगने को मजबूर कर रही है ।

प्रो.इम्तियाज अहमद- नेहरू के जमाने में वे आए दिन नीति परक वक्तव्य देते थे। फिर मीडिया से लेकर हर तरफ उसपर बहस शुरू हो जाती थी। मुझे आप बताएं कि पिछले 15-20 सालों में इस राजनीतिक वर्ग ने कोई ऐसा नीति परक बयान दिया, जिससे लंबी बहस चली हो। ऐसा नहीं किया है। और वह इसलिए नहीं किया कि उसने स्वयं को इस रूप में परिभाषित कर रखा है कि उसका काम तो मैनेजेरियल है। जिस दिन वह इस रोग से मुक्त होगा, उसी दिन शेर जागेगा। और राजनेता परिवर्तनशील राजनीति करेंगे।

पुण्य प्रसून- इस दौर में मीडिया की क्या भूमिका रहेगी?

प्रो. इम्तियाज अहमद- मीडिया इसमें रचनात्मक भूमिका निभा सकता है, यदि वह दिशा निर्धारण में अपना योगदान दे। पर आज वह परिस्थिति नहीं है। आप यदि
सुबह-सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया पढ़ेंगे तो लगेगा कि देश में बड़ी खुशहाली है। वहीं आप द हिंदू पढ़ेंगे तो लगेगा कि देश रो रहा है। यह भेद काफी महत्वपूर्ण है। अब रोने वाली पत्र-पत्रिकाएं खत्म हो गई हैं। हालांकि, हिन्दू स्वयं को बनाए हुए है, लेकिन पूरा मीडिया विलासिता संबंधी खबरों से भरा पड़ा है। वास्तविकता यह है कि रचनात्मक पत्रकारिता और रचनात्मक राजनीतिक भूमिका इस देश में क्षीण हो गई है। उसे मजबूत करने की जरूरत है।

पुण्य प्रसून-क्या उम्मीद की किरणें हैं?

प्रो.इम्तियाज अहमद- देखिए, मैं समझता हूं कि देश खत्म नहीं होगा। हां जब लोग इससे तंग आ जाएंगे तो इसकी प्रतिक्रिया में एक आंदोलन शुरू हो जाएगा। उसकी संभावना है। आज जो हमारा राजनीतिक वर्ग है, वह दूसरे कामों में व्यस्त है। अपने मूल कामों को नहीं कर रहा है।

6 comments:

पूरण खंडेलवाल said...

वाकई मीडिया और राजनीति के बारे में सटीक विश्लेषण !!

सतीश कुमार चौहान said...

अगर कलमकार पेट और मालिक की मर्जी कर अपन‍ी असल जबाबदेही से भाग रहा है तो पत्रकारी छोड बाबुगिरी करनी चाहिये, इस तरह बातो का जमाखर्च बताना बेकार हैं

AMBRISH MISRA ( अम्बरीष मिश्रा ) said...

प्रणाम

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

राजनेताओ के पास कोई एजेंडा नहीं है

कॉर्पोरेट पैसा बनाने में लगा है

मीडिया के पास कोई एजेंडा नहीं है

तो देश को दिशा कौन देगा...

वास्‍तव में आजादी के बाद अंधे रास्‍ते की ओर चलने का काम शुरू हो गया था। अब हम डेड एंड तक आ पहुंचे है, या तो घूम जाएं या दूसरा रास्‍ता तलाश करना होगा...

भविष्‍य ही बताएगा कि उसके गर्भ में क्‍या छिपा है...

AMBRISH MISRA ( अम्बरीष मिश्रा ) said...

सुन्दर

Dr V B said...

ये प्रोफेसर हैं कौन, परिचय तो दे देते?
~ सरकार से मिली भगत कहिये भयभीत होने का प्रश्न ही नहीं.
~ मीडिया और राजनीति समाज का दर्पण है जैसे सिनेमा, सीरियल आदि समाज के हैं. दर्पण इन सबसे बन भी तो रहा है.
~ आज से बीसेक साल पहले इस पर राष्ट्रीय सहमति थी कि हमें विकास करना है और आगे बढ़ना है। - अच्छा! ऐसा था क्या, वो दौर हमने भी देखा है कि कैसे संजय हो या समाजवादी अपने विकास पर ही लगे थे.
यार, पास्ट के शुभातंक से बाह्र आइये. ठीक है कि कुछ बातें ठीक हैं लेकिन बाकी सारा तो बस.
प्रतिक्रियावादी फंडामेंटलिस्ट जैसे यूज की उम्मीद आप से नहीं थी.