Friday, September 18, 2015

किसे फ़िक्र है बीमारी और इलाज की!

दुनिया के सौ से ज्यादा देशों से इलाज की सुविधा ही नहीं, बल्कि डाक्टर और अस्पतालों के बेड भी भारत में सबसे कम है । भारत के ही छात्र सबसे ज्यादा बड़ी तादाद में दुनिया के बारह विकसित देशों में डाक्टर और इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं। भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में या स्वास्थ्य सेवा सलीके से चले और बीमारी ना फैले इसके लिये औसतन जितना बडा बजट दुनिया के सौ देश बनाते है उसकी तुलना में भारत का नंबर ना सिर्फ 122 वां है बल्कि स्वास्थयसेवा का बजट भी बाकियो की तुलना में सिर्फ 12 फिसदी का है । यानी बिमारी ना हो । बिमारी प्रकोप के रुप में पैले तो फिर ना हो । या फिर बिमारी की वजहो पर रोक लगनी चाहिये इसके लिये भारत का नंबर दुनिया के पहले सौ देसो में आता ही नहीं है इसलिये दिल्ली में फैले डेगू के प्रकोप को लेकर कोई भी आसानी से कह सकता है कि भारत में मौत बेहद सस्ती है। वैसे पन्नो को पलटे तो 19 बरस पहले पहली बार डेगू के कहर को दिल्ली ने बोगा था और 1996 के बाद फिर से दिल्ली डेगू के उसी मुहाने पर आ खडी हुई है जहा से कोई भी सवाल कर सकता है कि आखिर इलाज को लेकर कौन से हालात भारत को आगे बढने से रोकते है । तो दिल्ली की बस्तिया, दिल्ली के अस्पताल, दिल्ली के लेबोरटरी और दिल्ली के आलीशान माहोल में डेगू की परछाई कैसे और क्या 1996 से अलग 2015 में भी नहीं है यह सवाल हर जहन में उठ सकता है। क्योकि 1996 हो या 2015 डेगू के मरीज अस्पतालो में उन्ही हालात में पडे हुये है । बेड की कमी तब भी । बेड की कमी आज भी । ब्लड प्लेटलेट्स की भागमभाग 1996 में भी और प्लेटेटलेट्स को लेकर मुश्किल आज भी । 1996 में भी डेगू जांच को लेकर अस्पताल और लेबोरेटरी कटघरे में और आज भी । अंतर सिर्फ इतना कि 1996 में तब के पीएम देवेगौडा को भी अस्पताल जाकर मरीजो से मिलना पडा था और सीएम साहिब सिंह वर्मा काम ना करने वालो को बर्खास्त करने के लिये कैमरे के सामने आ गये ते । लेकिन आज ना पीएम हाल जानने के लिये अस्पताल तक पहुंच पा रहे है ना ही सीएम जनता में भरोसा जगाने के लिये सामने आ पा रहे है । तो 19 बरस में बदला क्या । और अगर कुछ भी नहीं बदला तो फिर दिल्ली की छाती पर तमगा देश की राजधानी का लगाया जाये या फिर फेल होते सिस्टम की बदहाली का । क्योकि दिल्ली में डेगू पर रोक के लिये जो उपाय बीते 19 बरस में होने चाहिये थे ठीक उसके उलट दिल्ली के हालात है 19 बरस पहले दिल्ली में 1700 जगहो को संवेदनशील माना गया ।2015 में 2600 जगहो को संवेदनशील माना जा रहा है । यानी डेगू मच्छरो के लिये आधुनिक होती दिल्ली के लिये ज्यादा बेहतर जगह बन गई । जबकि इस दौर में एमसीडी और एनडीएमसी का बजट बढकर छह गुना से ज्यादा हो गया । इन्ही 19 बरस में दिल्ली की अवैध कालोनियो में रहने वालो की तादाद 7 लाख से बढकर 22 लाख तक जा पहुंची । सडे हुये बैटरी के खोल , सडे हुये टायर और डिजल के खाली ड्रम जिसमें सबसे ज्यादा डेगूं मच्छर पनपते है । उनकी संख्या 19 बरस में छह गुना से ज्यादा बढ गई । क्योकि इसी 19 बरस में गाडी से लेकर बिजली तक के लिये बैटरी और डिजल ड्रम की जरुरत बढी ।


यानी वक्त के साथ दिल्ली कैसे और क्यो कब्रगाह में तब्दिल हो रही है इसका अंदेशा सिर्फ दिल्ली की तरफ रोजगार और शिक्षा के लिये हर बरस बढते पांच लाख से ज्यादा कदमो से ही नहीं सोमझा जा सकता । बल्कि समझना यह भी होगा कि 1981 में क्यूबा ने तय किया कि डेगू के कहर से बचा जाये तो उसने 61 करोड 80 लाख रुपये 34 बरस पहले खर्च किये । और दिल्ली का आलम यह है कि 2015 में दिल्ली सरकार ने डेगू से निपटने के लिये साढे चार करोड मांगे और केन्द्र ने भी एक करोड 71 लाख रुपये देकर अपना काम पूरा मान लिया । यानी 1996 से 2015 के बीच डेगू से निपटने के लिये कुल 30 करोड रुपये खर्च किये गये । जबकि डेगू सरीकी किसी भी बिमारी से निपटने के लिये यह रकम दुनिया में सबसे न्यूनतम है य़ तो भारत में बिमारियो से निपटने का नजरिया होता क्या है इसकी एक बानगी है डेगू । क्योकि इन्ही हालातो ने दिल्ली में हालात ऐसे बिगाडे है कि 1996 की तुलना में दिल्ली में ही नौ सौ नई जगहे डेगू मच्छरो के लिये बन गयी । हर दिन पांच से ज्यादा मामले अब अस्पतालो में पहुंच रहे है । और देश का हाल अस्पतालो को लेकर है क्या यह इससे भी समझा जा सकता है कि जहा चीन और रुस में हर दस हजार लोगो पर 42 और 97 बेड होते है वही भारत में प्रति दस हजार जनसंख्या पर महज 9 बेड है । फिर दिल्ली जैसी जगहो पर सरकार का ही नजरिया बिमारी से निपटने का क्या हो सकता है यह भी किसी बिगडे हालात से कम नहीं है । मसलन राष्ट्रपति भवन, सफदरजंग एयरपोरेट, देश का नामी असपताल एम्स और गृह मंत्रालय और इस कतार में दिल्ली के 50 से ज्यादा अहम स्थान और भी है । जिसमें वित्त मंत्रालय भी है और दिल्ली का राममनोहर लोहिया अस्पताल भी । दिल्ली के तीन सिनेमाधर भी है । यह सभी नाम इसलिये क्योकि इन सभी को दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन ने नोटिस दिया है । नोटिस इसलिये क्योकि यह जगहे साफ नहीं है और इन जगहो पर डेगू मच्चऱ पनप सकते है । या कहे पनप रहे है । मुश्किल तो यह है कि नोटिस एक-दो नहीं नहीं बल्कि दर्जनो नोटिस हर संसथान को दिये गये। राष्ट्रपति भवन का परिसर इतना बडा है कि नोटिस की संख्या 90 तक पहुंच चुकी है । तो पहला सवाल है कि जब हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार से लेकर दिल्ली सरकार और एनडीएमसी से लेकर एमसीडी को नोटिस जारी कर जबाब मांगा है तो दो हफ्ते बाद यह सभी क्या जबाब देगें ।


क्योकि एमसीडी ने केन्द्र सरकार के सोलह संस्तानो को डेगू की वजह से नोटिस दिया हुआ है । दिल्ली सरकार के मातहत आने वाले 9 संस्थानो को भी नोटिस दिया हुआ है । यानी एमसीडी को नोटिस का जबाब हाईकोर्ट को देना है और एमसीडी के नोटिस का जबाब आजतक किसी ने नहीं दिया । इस फेरहिस्त में पुरानी दिल्ली के 1200 दुकानो भी है और 21 अवैध कालोनियो भी । दिल्ली के नौ बडे गाडी बाजार को भी नोटिस दिया क्योकि वहा सडा हुआ पानी टायर से लेकर बेटरी और ड्रम तक में जमा है । और बीते बीस बरस में दिल्ली की जनसंख्या भी दुगुनी हो गई है । यानी 1996 में जिन जगहो पर डेगू फैला अगर वहा पांच हजार लोग रह रहे थे तो आज वहा दस हजार लोग रहते है । सुविधाये उतनी ही कम हुई है । यानी डेगू से मौत किसी के लिये कोई मायने क्यो नहीं रखती है या फिर दिल्ली में डेगू का इलाज भी कैसे घंघे में बदल चुका है यह भी डेगू को लेकर सरकारी रुख से ही समझा जा सकता है । डेगू फैलते ही पहले 15 दिन जांच और इलाज ज्यादा पैसे देने पर हो रहा था । फिर दिल्ली सरकार कडक हुई । नियम-कायदे बनाये गये । तो धंधा और गहरा गया । क्योकि बिमारी फैल रही थी । ह7र दिन दो सौ से बढकर पांच सौ तक केस बढ गये । और दिल्ली सरकार के इलाज कराने की अपनी सीमा और सीमा के बाहर नकेल कसने की भी सीमा। फिर इन्फ्रस्ट्कर्चर ऐसा कि हर असप्ताल के सामने मरीज और उसके परिजन हाथ जोडकर ही खडे हो सकते है । क्योकि दिल्ली में जब डेगू नहीं था तब भी अस्पतालो के बेड खाली नहीं थे । और जब डेगू फैला हो तो सिर्फ बेड पर ही > नहीं बल्कि अस्पताल के गलियारे तक में जमीन पर लेटाकर इलाज चल रहा है। यानी दुनिया के तमाम देशो की राजधानियो को परखे तो सिर्फ दिल्ली में कम से कम चार हजार बेड अस्पतालो में और होने चाहिये । डेगू से निपटने के लिये सालाना बजट नब्बे करोड का अलग से होना चाहिये । लेकिन कैसे और किस रुप में डेगू से निपटने की तैयरी हमेसा से रही है यह अस्पतालो में मौजूद तीन हजार बेड से समझा जा सकता है । जहा हर दिन छह हजार मरीज दिल्ली में इलाज के लिये बेड की मांग सामान्य दिनो में करते है । और नायाब मुस्किल तो यह है कि डेगू से निपटने के लिये सिर्फ मौजूदा वक्त में ही नहीं बल्कि काग्रेस के दौर में किसी सरकार का नजरिया डेगू को थामने वाला रहा नहीं। जितना मांगा गया उतना दिया नहीं गया । जितना दिया गया उतना भी खर्च हो नहीं पाया । मसलन 2013-14 में मांगा 11.41 करोड़ गया लेकिन मिला 3.56 करोड़ । पिछले बरस यानी 2014-15 में मांगा गया 4.54 करोड और मिले 70 लाख। वही अब यानी 2015-16 में मांगे गये 4.23 करोड़ और मिले 1.71 करोड़ । और देश का सच यह भी है कि सिर्फ मेडिकल की पढाई के लिये देश के तीन से चार हजार छात्र हर बरस पढाई के लिये बाहर चले जाते है और हर बरस उनकी पढाई का खर्चा सिर्फ नब्बे लाख से तीन करोड तक का होता है । इतना ही नहीं देश के सरकारी अस्पतालो की कतार में सिर्फ सौ निजी अपांच सितारा अस्पतालो का सालाना मुनाफा तीन हजार करोड का है । और समूचे देश में केन्द्र सरकार से लेकर तमाम राज्य सरकारो के स्वास्थय सेवा के बजट से करीब दुगुना खर्च देश के ही लोग इलाज के लिये देश के बाहर कर देते है और इनसब आंकडो के बीच या कहे डेगू के कहर के बीच दिल्ली में दिल्ली में पीएम का स्वच्छता अभियान हो या केजरीवाल का वाय-फाय का सपना ।दोनो ही कटघरे में खडे नजर आते है। फिर दोनो ही अभी तक एकसाथ बैठकर दिल्ली में कैसे उन्फ्रस्ट्रक्चर हो इसपर चर्चा तक नहीं कर पाये है ।

2 comments:

ravi kumar said...

Yaha toh kuch private doctors jo Gov Hospitals se jude hai, but unko appne private clinic se phursat kha...waha toh ve paise ki kheti kar rahe hai. Garibo ko illaz kha... Yaha Dengue ko hasta hoga jaha aise doctors hai jo sirf bank balance chahte hai...

ashutosh mitra said...

प्रभू,
जो सरकार 500 करोड़ विज्ञापन पर खर्च करके 4 करोड़ के खिलाफ 70 लाख मिलने का रोना रोय ... और खुद को क्रांतिकारी सोच वाला बताए... उसके पक्ष में खड़े मत होइए..!
आपके ये प्रिय क्रांतिकारी दूसरों से अलग कहां है... ये तो उन दूसरों से भी दस हाथ आगे हैं..जिनको हटाकर ये गद्दीनशीं हुए।