Wednesday, September 30, 2015

कृषि इकनॉमी मोदी की प्राथमिकता में क्यों नहीं?

नेहरु से लेकर मोदी तक शायद ही कोई प्रधानमंत्री ऐसा रहा जिसने अमेरिका,ब्रिटेन ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी देश में जाकर यह जानने की कोशिश की हो खेती पर टिके भारत में कृषि अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूतकिया जा सकता है । यह ना तो नेहरु के दौर में हुआ जब जीडीपी में कृषि अर्थवस्था का योगदान साठ फीसदी था और ना ही मौजूदा वक्त में हो रहा है, जब डीडीपी में कृषि अर्थव्यवस्था का योगदान सत्रह फीसदी पर आ चुका है। लेकिन नेहरु के दौर से मोदी के दौर तक में खेती पर निर्भर जनसंख्या की तादाद कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ी है। जबकि खेती की जमीन सिकुड़ी है। खेती उत्पादन दुनिया के हर विकसित देश की तुलना में घटा है । यानी खेती को लेकर और खेती पर टिके किसान-मजदूर को सिवाय भारतीय अर्थवस्था में बोझ मानने के अलावे और कुछ सोचा ही नहीं गया है । यह सवाल अब क्यों उठना चाहिये और देश चलाने वालों को देश की जरुरतों को साथ लेकर दुनिया की सैर क्यों करनी चाहिये यह सवाल अमेरिका के उठाये मुद्दो से भी समझा जा सकता है । क्योंकि भारत के सवाल अमेरिका के लिये मौजूं है नहीं और अमेरिका जिन मुद्दों से जुझ रहा है वह भारत के लिये कोई मायने रखते नहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद जब मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा एक साथ बैठते हैं तो दोनों के बीच क्या बात हुई उसका लब्बोलुआब यही निकलता है कि अमेरिका की
चिंता ग्लोबल वार्मिंग को लेकर है। जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर अमेरिका चाहता है कि भारत भी ठोस कदम उठायें। इसीलिये आतंकवाद, पाकिस्तान या निवेश के भारत के सवाल बातचीत में गौण हो जाते हैं। तो फिर अगला सवाल यही उठता है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी यात्रा के दौरान बैट्री से चलने वाली टेसला कार को बनते हुये देखना हो या तमाम बड़ी कंपनियों के सीईओ के साथ मुलाकात या सिलिकोन वैली जाकर सोशल मीडिया में छाने की धुन ।प्रधानमंत्री मोदी हर जगह गये और अमेरिका में अपनी लोकप्रियता के खूब झंडे गाढ़े, इससे इंकार किया नहीं जा सकता । लेकिन यह सच कभी सामने लाने का प्रयास क्यों नहीं हुआ कि बीते पचास बरस में अमेरिका ने कैसे खेती को विकसित किया। और कैसे आज की तरीख में में जीडीपी का सिर्फ 1.4 फिसदी खेती की इकनॉमी होने के बावजूद अमेरिका अपने खेती उत्पाद का निर्यात भी कर लेता है और खेती को उद्योग की तर्ज पर खड़ा भी कर चुका है।

और इन पचास बरस में भारत के किसी पीएम ने आजतक यह कोशिश क्यों नहीं कि खेती उत्पादन कैसे बढ़ाया जाये। क्योंकि अगर अमेरिका और भारत की ही खेती की तुलना कर दी जाये तो यह जाकर हर किसी को हैरत हो सकती है कि अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 7340 किलोग्राम अनाज होता है। जबकि भारत में प्रति हैक्टेयर 2962 किलोग्राम अनाज होता है। तो अमेरिका में खेती की कौन सी तकनीक है। कैसे को-ओपरेटिव तरीके से खेती हो सकती है। या कैसे खेती पर टिके किसान-मजदूरों को ज्यादा लाभ मिल सकता है। यह जानने समझने और देश में लागू करने की कोई कोशिश कभी किसी पीएम ने नहीं की। भारत के लिये यह कितना जरुरी है । यह इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में जब खेती पर निर्भर लोगो की तादाद 1980 से 2011 के बीच 37 फिसदी की कमी आई है । वही इन्हीं तीस बरस में भारत में खेती पर निर्भर लोगो में 50 फिसदी की बढोतरी हुई है। फिर ऐसा कहकर भी भारत नहीं बच सकता कि खेती से अमेरिकी जीडीपी में कोई बडा योगदान नहीं है । दरअसल भारत की जीडीपी के मुकाबले अमेरिकी जीडीपी करीब नौ गुना ज्यादा है। इसलिये खेती से जो लाभ अमेरिका को होता है वह भारत की तुलना में आंकड़ों के लिहाज से भी ज्यादा है। क्योंकि अमेरिका के कुल जीडीपी 17.42 ट्रिलियन डालर है और भारत की कुल जीडीपी 2 ट्रिलियन डालर । इसलिये भारत के जीडीपी में खेती का 17 फिसदी योगदान भी अमेरिका के 1.4 फिसदी योगदान की तुलना में ज्यादा है।

वैसे खेती को लेकर सिर्फ अमेरिका ही नहीं जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, आस्ट्रलिया समेत 20 विकसित देशों में प्रति हेक्टेयर जमीन पर भारत की तुलना में औसतन तीन सौ गुना ज्यादा उत्पादन होता है। इतना ही नहीं खेती को लेकर अमेरिका कितना संवेदनशील है यह इससे भी समझा जा सकता है भारत में सब्सिडी का विरोध सरकार ही कर रही है लेकिन दुनिया भर में खेती में भारत की तुलना में औसतन छह गुना ज्यागा सब्सिडी दी जाती है । अगर अमेरिका से ही तुलना कर लें तो अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 84 डालर सब्सिडी दी जाती है । वही भारत में प्रति हेक्टेयर 14 डालर सब्सिडी है। तो सवाल यही है कि जब अमेरिका तक पर्यावरण के अपने सवाल को भारत के साथ उठा सकता है तो भारत खेती के सवाल को दुनिया में देखने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता । और अगर नहीं करता है तो इसका असर कैसे किसानों के बीच हो रहा है और क्या मुश्किल सरकार के सामने भी आ सकती है इसका एक नजारा अगर महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिये पेट्रोल-डीजल की कीमत बढाकर प्रति लीटर दो रुपये बढाकर सूखा टैक्स लगाने का हो रहा है तो दूसरा सच यह भी है कि 1991 के आर्थिक सुधार के बाद देश में खेती की 9 फीसदी उघोग के नाम पर सरकारों ने ही हड़प ली। जबकि इसी दौर में खेती पर टिके पांच करोड़ परिवारों का पलायन गांव से शहरी मजदूर बनने के लिये हो गया।

2 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - ऋषिकेश मुखर्जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Tapasvi Bhardwaj said...

Very true sir