Sunday, September 20, 2015

ओवैसी के बिहार में चुनावी दस्तक के मायने

बहुत कम नेता ऐसे होते है जो सार्वजनिक तौर पर नेताओं के दोहरे चरित्र को निशाने पर लेते है । आप कह सकते है इसके लिये या तो गुस्सा होना चाहिये । या फिर ईमानदारी। या सामाजिक टकराव । बिहार चुनाव में कूदने जा रहे असदुद्दीन ओवैसी ने पटना में ही लालू यादव के मोदी विरोधी को लेकर जो सवाल पटना के ही मोर्या होटल में एक न्यूजचैनल के कार्यक्रम में उछाला , उसने पहली बार यह संकेत तो दे दिये कि ओवैसी का राजनीतिक रास्ता जनता के उसी गुस्से-आक्रोश से जुड रहा है जो राजनेताओ को लेकर मौजूदा वक्त में जनता में है । क्योंकि ओवैसी ने बिना लाग लपेट जिस तरह लालू-मुलायम को यह कह कर निशाने पर लिया कि अगर लालू यादव इतने ही सेक्यूलर है या मोदी को साप्रंदायिक मानते है तो फिर शादी समारोह में मोदी को आमंत्रित कर क्या सिखला रहे थे । बीच में नरेन्द्र मोदी और बांये-दाये लालू और मुलायम बैठकर तस्वीर क्यों खिंचवा रहे थे । शादी समारोह में प्रधानमंत्री मोदी के साथ गलबहिया डालना और चुनाव आ गये तो मंच पर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी को साप्रंदायिक करार देने का मतलब है क्या । असल में कोई भी इस सवाल को उठा सकता है कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी तो सर्वमान्य तरीके से कहीं भी हो सकती है । क्योंकि एक वक्त प्रधानमंत्री वाजपेयी भी सहारा के कार्यक्रम में शामिल होने लखनऊ पहुंचे थे । उस वक्त भी विवाह समारोह था । तब सहाराश्री सुब्रत राय को जेल भी नहीं हुई थी । लेकिन सच यह भी है कि उस दौर में भी इन्फोर्समेंट डायरेक्टेरेट यानी ईडी की निगाहो में सहारा का चिट फंड का धंधा था। तो क्या यह सामाजिक अंतर्विरोध है या राजनीतिक जरुरत
। क्योंकि पहला सवाल है कि प्रधानमंत्री को कोई नेता या कोई प्रसिद्दी पा चुका शख्स अपने घर के समारोह में बुलाता है तो प्रधानमंत्री को वहा जाना चाहिये या नहीं ।

और दूसरा सवाल क्या राजनेताओं का दायरे में कोई अछूत नहीं होता । यानी कल कौन सी राजनीतिक बिसात सत्ता के लिये किसे कहां खड़ा कर दें , यह कोई नहीं जानता । इसलिये प्रधानमंत्री मोदी को कोई फर्क नहीं पडता कि वह लालू-मुलायम के घर के विवाह समारोह में शामिल हो जाये । असल में जनता के भीतर भी गुस्सा इसी सच को लेकर है कि सत्ता के लिये राजनेताओं की कोई विचारधारा होती नहीं है । यानी भावनाओ के साथ खुला खेल जनता परिवार बना कर तमाम राजनीतिक दल खेल बी सकते है और सत्ता के लिये बीजेपी सरीखी पार्टी भी उन्हीं पासवान और मांझी से गलबहिया डालने से कतराती नहीं है जिन्हे कल तक वह निशाने पर लेने से नहीं चूकती थी । यह है तो बेहद महीन लकीर लेकिन बिहार चुनाव के मद्देनजर ओवैसी का बिहार जाना सिर्फ चंद
सीटो पर प्रभाव डालेगा या कोई सीट जीतेंगे या हारेंगे , उससे आगे निकल रहा है। क्योंकि ओवैसी के कंध पर ना तो किसी गठबंधन का बोझ है ना ही सत्ता के लिये किसी के साथ जाने की मजबूरी । फिर कोई मुस्लिम संगठन राजनीतिक तौर पर देश में पैर पसारे और अपना विस्तार करें यह हालात मुस्लिम लीग के बाद देश में बना भी नहीं । यानी विभाजन के बाद मुस्लिम लीग की पहचान पाकिस्तान से जुडती चली गई और वह भी केरल में सिमट कर ही रह गया । लेकिन ओवैसी ने बिहार चुनाव में कदम रखकर उस सवाल को जन्म दे दिया है कि सामाजिक-आर्थिक तौर पर अगर राजनीति होगी तो फिर राजनेताओं का कोई मिलन सामाजिक तौर पर होना भी नहीं चाहिये। यानी राजनीतिक संघर्ष करते वक्त और सत्ता संभालने की तिकडम अलग अलग नहीं हो सकती। जाहिर है यह सिर्फ लालू यादव ही नहीं बल्कि समूची हिन्दी पट्टी की उस सियासत को आईना दिखाने जैसा है जो सत्ता की मजबूरियो तले भ्रष्ट भी होती है ।

विचारधारा को भी हाशिये पर ढलेक देती है। और मनमर्जी से कभी जातीय तो कभी धर्मिक आधार पर जनता की भावनाओ से खुला खेल खेलती है । और राजनीति का
एक एसा कटघरा बनाती है जिसमें कोई राजनीतिक खिलाडी जन्म ला ले लें । ओवैसी को पिर भी बिहार के बाहर से आकर मुसलमानो के बीच यह सवाल खडा करेगें कि जितना विकास लालू यादव , रामविलास पासवान , जीतनराम मांझी , कुशवाहा और नीतिश कुमार का हुआ उसके सूई भर भी मुसलमानों का क्यो नहीं हुआ
। या मुसलमानो के जो नुमाइन्दे  मुसलमानो के वोट लेकर ही बने चाहे वह मुस्लिम नेता ही क्यो ना हो उनकी समृद्दि के पीछे कौन से हालात रहे । क्योकि बिहार के दो दर्जन मुस्लिम नेताओ की पहचान उन्ही राजनीतिक दलों के साथ जुड़ती रही है जिन्होंने सत्ता संभालने के बाद भी मुस्लिम समाज को न्यूनतम सुविधा दिलाने की मशक्कत नहीं की । स्कूल, हेल्थ सेंटर, पीने का पानी और सडक-बिजली । यह भी बिहार के मुस्लिम बहुल इलाको में अगर नहीं है और दूसरी तरफ मुस्लिम नेताओं की अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थितियां सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से कहीं आगे निकल कर करोड़पति होने के दरवाजे पर ले जाकर खड़ा कर चुकी है । तो अपराधी है कौन । जाहिर है ओवैसी इन सवालो को बेलाग उठा सकते हैं । क्योंकि उनके पास खोने के लिये कुछ भी नहीं है । यानी पहली बार ओवैसी बिहार चुनाव में एक ऐसी धारा के तौर पर मौजूद रहेगें जहां उन्हें सिर्फ सच बोलना है । हकीकत से जनता को रुबरु कराना है । भाषण में कोई बात नहीं बनानी है । सीधे सीधे बताना है कि बागलपुर दंगो के पीछे यादव क्यो थे । 1988-89 में काग्रेसी सीएम जगन्नाथ मिश्रा दंगे नहीं रोक पाये वह ज्यादा दोषी है या फिर वह सामाजिक ढांचा जिसमें दंबग जाति की छांव में मुसलमानों को रहना मजबूरी है। क्योंकि नीतिश कुमार की सत्ता के वक्त ही भागलपुर दंगों के आरोपियो को सजा हुई और तब नीतिश कुमार इस जिक्र को खुले तौर पर कर रहे थे कि दंगो में यादवो की भूमिका क्या थी । लेकिन 2015 के चुनाव
में जब लालू के साथ नीतिश आ खडे हुये है तो फिर ना तो यादव का जिक्र होगा ना ही भागलपुर दंगो का जिक्र । लेकिन ओवैसी खुले तौर पर इन सवालो को भी उठा सकते है कि कैसे बिहार में जातीय खूनी संघर्ष के जरीये वाम आंदोलन की जमीन को लालू यादव ने खत्म किया । और क्यो शंकर-बिगाह हो या अरवल हर
जातीय संघर्ष में उन सिरमौरदारियों पर कोई आंच क्यों नहीं आयी जो खूनी संघर्ष के वक्त सत्ता के निशाने पर थे । शंकर-बिगाह में तो 58 हत्या हुई । लेकिन हाईकोर्ट के फैसले में किसी दोषी का नाम सामने आया ही नहीं । और राज्यसरकार ने भी ऐसी कोई पहल नहीं की जिससे सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को ले जाया जा सके । ध्यान दें तो नब्बे के दशक में लालू की सत्ता के दौर के तमाम अपराधियो को कानूनी तौर पर कही सजा मिली ही नहीं । और जब लालू को ही चारा घोटाले में सजा हुई तो लालू ने नीतिश सरकार पर ही निशाना साधा । लेकिन अब दोनो साथ हैं तो हर सवाल-जबाब मौन है । बिहार की यही मुश्किल सबसे बडी रही कि जितने भी नेता बिहार के है जाहे वह किसी भी राजनीतिक दल में हो अगर इनके बयानों को दोबारा सुना जाये तो जनता के सामने यह सवाल वाकई मुश्किल हो जायेगा कि कौन सा नेता कहां खडा हो और उसका मतलब बदलाव से है कैसा । क्योंकि सिर्फ लालू और नीतिश ही नहीं बल्कि पासवान, सुशील मोदी, कुशवाहा , नंदकिशोर यादव, सीपी ठाकुर, जीतनराम मांझी ने भी बीते तीस बरस में हर किसी के खिलाफ आग उगली है और हर किसी से हाथ मिलाया है ।
पासवान ती छह पीएम के साथ कैबिनेट में रहे और मांझी छह सीएम के साथ केबिनेट में रहे । पप्पू यादव अपनी पहचान के साथ बिहार की राजनीति में घुसने का प्रयास करते है तो उन्हे खारिज करने में या हाशिये पर ढकेलने के प्रयास भी सभी मिल कर करते है । यानी बिहार को कैसे सियासी परंपराओ में फांस कर खुद की महत्ता बनाये रखने का प्रयास मौजूदा राजनीतिक के तमाम वजीर कर रहे है यह भी समझना होगा । जयप्रकाश नारायण , कर्पूरी ठाकुर, बी पी मंडल की तिकडी के आसरे बिहार के सारे राजनेता अपनी राजनीति चमकाने में
लगे है सच यह भी है । और हकीकत यह भी है कि कोई भी नेता इस तिकडी के रास्ते पर चलने को तैयार नहीं है । लालू यादव और रामविलास पासवान हो या जीतनराम मांझी या कोई भी वैसा नेता जिसके लिये कर्पूरी ठाकुर आदर्श हो उनसे अगर यह पूछ लिजिये कि कर्पूरी ठाकुर ने तो कभी परिवार के सदस्यो को
टिकट देने के लिये नहीं कहा । यहा तक की एक बार कर्पूरी के चेलो ने ही प्रेम वश कर्पूरी ठाकुर के साथ उनके बेटे रामनाथ ठाकुर का नाम भी टिकट देने वाली सूची में डाल दिया तो कर्पूरी ठाकुर ने सूची देखते ही अपना नाम यह कहकर काट दिया कि अक परिवार स् एक ही लडना चाहिये । तो रामनाथ ठाकुर का नाम काटा गया । और कर्पूरी ठाकुर की जीते जी कभी रामनाथ ठाकुर चुनाव ना लड सके । फिर बी पी मंडल ने तो मंल कमीशन की पनी रिपोर्ट में इस सवालको बाखूबी उटाया था कि कैसे आरक्षण के जरीये या सत्ता संभालने की प्रक्रिया में दलित-महादलित या ओबीसी मुख्यधारा से सामाजिक आर्थिक तौर पर जोडे जा सकते है । और क्यो सत्ता में रहने वाली उंची जाति पिछडी जातियों के मुश्किलों को समझ नहीं पाती है । लेकिन बीते पच्चीस बरस में
दलित-महादलित या ओबीसी जातियों का ना सिर्फ पलायन बिहार से हुआ बल्कि सामाजिक- आर्थिक तौर पर कही ज्यादा मुश्किलो का सामना उन्हे करना पडा रहा है । तो क्या मंडल की लकीर तो सत्ता में आने भर के लिये ही पकडा गया । यह सवाल बीजेपी बोलेगी तो दिल्ली से आकर प्रदानमंत्री मोदी बोलेगें तो कोई असर नहीं पडेगा । क्योकि मोदी भी बिहार चुनाव की तासिर देखते हुये ओबीसी करार दिये जा चुके है । यानी बीजेपी अध्यक्ष भी बिहार चुनाव में घुसने से पहले बाहरी का तमगा छोड बिहारी हो गये । और उन्होंने मोदी के ओवीसी होने के खुल्ला-खुल्ला एलान कर दिया । लेकिन ओवैसी इस सवाल को उठाकर यह नया सवाल तो खडा कर ही सकते है कि बिहार चुनाव में जातिय समीकरण के दायरे मंडल से निकल कर अगर मंडल-टू की दिशा में जा रहे है तो उन जातियो को उससे लाभ होगा क्या जिनका जिक्र मंडल कमीशन की रिपोर्ट में किया गया । ठीक उसी तरह सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में जो सवाल मुसलमानो को लेकरउठे उनसे रास्ता निकालेगा कौन । दरअसल यह भी पहली बार है कि अभी तक मुसलमान वोट बैक को यादव या अन्य किसी जाति के साथ जोडकर ही जीत के लिये देखा गया । और मुसमान भी धर्म पर बांटीजाने वाली बीजेपी की राजनीति में अपने भीतर यही सवाल खडा करते आये कि जो भी बीजेपी के उम्मीदवार को हरा पायेगा उसके पक्ष
में वह वोट डालेगा । लेकिन मुसलमान अगर मुसलिम संगठन तले खड़ा होता है तो क्या कोई भी हिन्दु जाति उसके साथ खडा होगी यह सवाल ओवैसी की पार्टी को लेकर बिहार चुनाव में खडा हो सकता है । तो क्या ओवैसी का बिहार जाना सवालो को जन्म देना है । यकीनन मुस्लिम बहुल चार जिलों के बाहर करीब 18
सीट और भी है जहा तीस फिसदी से ज्यादा वोटर मुसलमान है । एक सीट तो पटना साहिब की ही है । जहा से बीजेपी के नंदकिसोर यादव चुनाव जीतते आ रहे है । लेकिन ओवैसी उन सीटो पर अपने उम्मीदवार खडा करेगें नहीं । तो सवाल सिर्फ 24 सीटो का नहीं है । सवाल है कि क्या बिहार में इस बार वह विचार चुनावी मंच से बोले जायेंगे । जो अभी तक सियासी गठबंधन या सत्ता के लिये नहीं बोले गये । और चूंकि ओवैसी सत्ता में कुछ निर्धारित नहीं कर पायेगें लेकिन मुसलमानों के भीतर से उन सनवालो को ओवैसी उठा पायेंगे। या कहे बिहार में करीब ढाई करोड वह युवा वोटर जिसका जन्म ही मंडल-कंमडल के संघर्ष के बाद हुआ । उसके जहन में जो सवाल है क्या वह इस चुनाव में सतह पर आ पायेंगे ।

यह सारे सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बिहार चुनाव के केन्द्र में अगर चाहे अनचाहे एक बार फिर लालू यादव आ खडे हुये है तो सच यह भी है कि ओवैसी के बिहार पहुंचने से कोई अगर सबसे ज्यादा डरा हुआ है तो वह लालू यादव ही है । क्योकि वह समझ रहे है कि मंडल का कटघरा टूटा तो वह हाशिये पर चले जायेंगे लेकि मुसलमानो ने अगर ओवैसी के आसरे सवाल उठाने शुरु कर दिये तो उनकी राजनीति का ही त हो जायेगा । और तब हो सकता है लालू नीतिश की तरफ नहीं बल्कि बीजेपी की तरफ देखे । और तभी असल परीक्षा बीजेपी के उस विकास की होगी जिसे मोदी कहते जरुर है लेकिन संघ परिवार के सामने वहीं विकास हिनदु राष्ट्र तले दम तोडती नजर आने लगती है ।

1 comment:

ashutosh mitra said...

सर जी यह तो गलत है...अपनी खुशियों में अपने प्रतिस्पर्धियों को शामिल करना तो भारतीय परम्परा है। ओवैसी साहब की इस बात के आधार पर तो होली और ईद पर अपने दुश्मनों को भी गले लगाने वाली परम्परा को सिरे से नकारने को शुरु करने की बात के हामी हो जाएगे हम। यह तर्क गलत है। पेशेवर प्रतिस्पर्धा को इस हद नीचे लाना गलत ही नहीं निंदनीय भी है।