Tuesday, January 1, 2019

2019 में इंतजार पंचतंत्र के बच्चे का है, जो कहेगा राजा........?



क्या मीडिया किसी देश को चला सकता है । क्या सूचना तंत्र के आसरे किसी देश को विकसित किया जा सकता है । क्या तकनालाजी का विस्तार देश का विस्तार होता है । क्या विकास का मतलब किसी देश में मुनाफा बनाने का माडल हो सकता है । क्य़ा प्रकृति से खिलावाड आधुनिक होने की छूट दे देती है । क्या ताकत दिखाना ही सत्ता का प्रतिक है । या फिर सत्ता का मतलब ही विशेषाधिकार पा कर समूचे देश को निजी जागीर मान लेना है । और 21 वी सदी के भारत में समूची होड ही इसे पाने या समेटने की हो चली है । यह सारे सवाल आने वाले वक्त में भारत की चौखट पर दस्तक देगें और कुछ तो दे रहे है , इंकार इससे किया नहीं जा सकता है । सिलसिला कही से भी शुरु हो सकता है ।
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भं । मीडिया हाथ में होगी तो सच किसी तक पहुंचेगा ही नही । सत्ता ये सोच सकती है और इसे हकीकत का जामा पहुंचा सकती है । मौजूदा वक्त इसे अपने में समेट चुका है । सवाल सिर्फ जस्टिस लोया या पत्रकार गौरी लंकेश या फिर सामाजिक कार्यकत्ता दाभोलकर की हत्या के बाद एक अनंत खामोशी भ का नहीं है । बल्कि रोज ब रोज दो चार होती जिन्दगी के सामने जो सवाल सरकार की नीतियो के आसरे उभरते है उसका सच भी कैसे छुपा लिया जाता है या फिर बताया ही नहीं जाता । ये सवाल सत्ता के सिंकदर को हमेशा अच्छा लगता है कि उसकी नीतियां शानदार है । चमकदार है ।मावनवीय है । लेकिन जमीनी सच अगर इसके उलट है तो फिर सरकारी नीतियो की खाल कौन उघाडेगा । या फिर सच है क्या इसे कौन बतायेगा और कौन जानेगा । अगर मीडिया-तकनालाजी का हर चेहरा खामोशी बरतेगा या राजा को खुश करने के लिये नीतियो की बढाई ही करेगा तो होगा क्य़ा या फिर हो क्या रहा है । दरअसल जनधन खुला । और जनधन के तहत बैक दर बैक खाता खुलवाने वाले आज करोडो की तादाद में होकर भी अकेले है । क्योकि जनधन के प्रचारित-प्रसारित आंकडे लोक लुभावन तो है लेकिन उसके भीतर के सच को कोई बताने-दिखाने की स्थिति में नहीं है । या फिर बताने की हिम्मत ही नहीं दिखाता कि जनधन का खाता खोल कर बैठे करोडो लोगो या परिवार दो जून की रोटी के लिये कैसे तरसते है । और बैक कैसे सिर्फ कागजो के आसरे आंकडो को बढाते है । अठन्नी भी किसी की जेब या हथेली तक पहुंच नहीं पायी है । पर कहे कौन ।
पन्नो को एक एक कर पलटे । और सोचे 2014 में दो करोड रोजगार हर बरस देने का वायदा किने किया था । और वादा जब लापता है तो फिर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ वादा तो दूर बेरोजगारी तले आक्रोष की भट्टी पर बैठे देश के भीतर के मवाद को सामने लाने से कतरा क्यो रहे है । कौन कहेगा कि कि 18 बरस की उम्र लोट देने के काबिल बना देती है । लेकिन 18 बरस होते ही जिन्दगी जिन हालातो से रुबरु करा रही है उससे बेफिक्र सत्तानंशी युवा भारत  को एक ऐसे अंधेरे में धकेल रहे है जहा का एकाकीपन करोडो युवाओ को अकेला कर मौत की तरफ घकेल रहा है । एमसीआपबी के आंकडे ही बताते है कि देश में जितने किसान खुदकुशी करते है उससे दोगुना युवा-छात्र-बेरोजगार खुदकुशी करते है । पर कहेगा कौन ।
2015 में सर्जिकल स्ट्रइक के जरीये देशभक्ति और राष्ट्रवाद की अनोखी लकीर भी खिंची गई । लेकिन 2015 के बाद जवानो के शहीद होने का सिलसिला पुराने तमाम आंकडो को पार क्यो कर गया । और ये अब भी जारी क्यो है । पाकिस्तान तो दूर की गोटी है आंतक को मुंह को पकडने की बात भी दूर की कौडी हो गई । उल्टे कश्मीर की वादियो को ही आंतक का पनाहगार बनाने के दिशा में बढ गये । पर कहेगा कौन कि ना कश्मीरी पंडितो को घर मिला ना कश्मीरी मुस्लिमो को सुकुन मिला । उल्टे दिल्ली की सियासत ने जम्मू और कश्मीर में बिखरे हिन्दु-मुस्लिम कश्मीरियो को पाठ पढा दिया कि सियासत से ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं । चाहे वह लोकतंत्र का राग गाते रहे । पर कहेगा कौन ।
2016 में नोटबंदी तले एलान जो भी हुये हो । लेकिन हर दिन लाइन में लगे मौत का आंकडा जब सौ पार कर ग्या तो चौराहे का जिक्र हुआ । लेकिन तब पचास दिन मांगे गये थे अब तो हजार दिन होने को आ रहे है लेकिन मौत के बाद तिल तिल मरते ग्रमीण भारत के किसान मजदूर और असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी के बाद सबकुछ गंवाने वाले 35 करोड भारतीयो के पेटे के घाव के लिये कोई मलहम तो दूर सिर्फ कहने की हिम्मत भी मीडिया क्यो नहीं जुटा पाता है । और लाल दिवारो में कैद राजा ठहाके लगाकर बार बार ये कहने से नहीं कतराता कि नोटबंदी ने मौत नहीं जिन्दगी दी है । पर कहे कौन और मिटी की दिवारो या खपरैल की छतो के भीतर जाकर झाके कौन और जो दिखायी दे उसे बताये कौन कि हर सरकारी निर्ाणय के बाद भारत और घायल क्यो हो रहा है ।
2017 में जीएसटी तो दूसरी आजादी का प्रतिक बना दिया गया था । पर आजादी किससे मिली ये क्या किसी घंघेवाले या धंधे से जुडे मजदूर या हुनुरमंद कारीगरो से जाकर किसी ने पूछा । नौ करोड खुदरा व्यापारी मुनाफा कमा रहे था जीएसटी ने मुनाफे की लूट खत्म कर दी । लाल दिवारो के भीतर मैसेज तो यही दिया गया । ठीक वौसे ही जैसे नोटबंदी के वक्त मैसेज था , रईस फंस गये और रईसो के फंसने पर गरीब खुश हो गया । कमाल की सोच है । और इस कमाल को राजा खुले तौर पर मंच दर मंच से नाटकीय अंदाज में कहने से नहीं चुकता । यानी सही होने का भरोसा किस तरह लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने जगा कर रखा है, और अपनी ही बनायी दुनिया के अपने ही मीडिया को भरोसा जगाने वाला मान कर राजा भी भरोसे से सराबोर हो चला है ये भी खुल्लम खुल्ला है । पर कहे कौन कि जीएसटी ने सिसटम को और ज्यादा भ्रष्टर बना दिया । टैक्स और एक्साइज की वसूली वाले नये थानेदार है । और व्यापारियो की बंद होती दुकानो के बीच बाबूओ की दुकान चल पडी है । पर कहे कौन ।
वाकई कौन कह सकता है कि नाम बदलने से कुछ नहीं होता । पर 2018 का चलन तो नाम बदलने का ऐसा चल पडा कि बदलते नाम के जरीये इतिहास के पन्नो को टटोलने का काम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ करता रहा । लेकिन ये कहने बताने की हिम्मत किसी में नहीं रही तकि नाम बदलने के एलान के बाद सरकारी दस्तावेजो से लेकर सार्वजनिक जगहो पर भी बदले हुये नाम की पट्टी लगाने का जो खर्च और वक्त व्यर्थ होता है उससे पीठ औप पेट होते शहरो को दो जून की रोटी देकर सिसटम ठीक करने की दिशा में बढा जा सकता है । सवाल ये नहीं है कि गव्रनेंस गायब है सवाल है कि गवर्नेंस बगैर गेरुआधारी होकर सत्ता चलाने का सुकुन राम राज्य की कल्पना में ले जा सकता है , इसका खुला इजहार हो रहा है । पर कहे कौन ।
इस फेरहिस्त तले सत्ता के सांसद हो या मंत्री । संवैधानिक संस्थान हो या स्वयत्त संस्था । या फिर देश का सबसे पडा सत्ताधारी परिवार यानी संघ परिवार ही क्यों ना हो , सभी मीडिया, टेकनालाजी,सूचना तंत्र की आगोश में इस तरह आ चुके है कि सभी तो कुद को कुछ समझते नहीं या फिर राजा के तंत्र के आगे ,सबी नतमस्तक होकर सत्ता सुख को ही जिन्दगी का आखरी सच मान चुके है । यानी सवाल यह नहीं है कि राजा के सामने बोले कौन । सवाल तो यह भी है कि तंत्र की जो घुट्टी लगातार परोसी जा रही है उसमें नैतिक बल गायब हो चला है । इमानदारी बेमानी सी लगने लगी है । अपने पैरो पर खडा कर कुछ कह पाने की हिम्मत के लिये राजा के पांव ही देखे जा रहे है । तो संभले कौन और संभाले कौन । जब देश में नीतियो का बोलबाला हो । मन की बात संविधान हो । पंसदीदा को इंटरव्यू देना लोकतंत्र का जीना हो । और खुद ही सवाल बताकर कुद ही जवाब देने का प्रचलन आजादी का प्रतिक हो तो क्लपना किजिये 2019 में इंतजार चुनाव का करें या इंतजार लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की हकीकत बयानी का करें या इंतजार उस बच्चे का करें ,जो राजा के सामने खडा हो भोलेपन में पंचतंत्र की कहानी की तर्ज पर कह दें , राजा तो नंगा है ।

17 comments:

Unknown said...

बिल्कुल सटीक कहाँ है. ना तो हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार मिला, ना ही नोटबन्दी ने आंतकवाद को खत्म किया ओर ना ही काला धन खत्म हुवा, और ना ही GST से देश के व्यापारी को फायदा हुवा बल्कि कई फैक्टरी बंद हो गई लाखों लोगों का काम छूट गया .यह सब मीडिया को दिखाना चाहिए पर मीडिया कुछ और दिखा रहा है क्योंकि मीडिया सत्ता का दलाल बन चुका है

Sandeep Maurya said...

भ्रम है स्वतंत्र लेख
भ्रम का जमाना है आम समर्थकों को ही नहीं बल्कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को भी है। भ्रम की शिकार हुए हाल ही में रायपुर छत्तीसगढ़ के पूर्व डीएम और तेजतर्रार आईएएस (2005 बैच)अधिकारी ओपी चौधरी।नक्सली इलाकों में शिक्षा को लेकर चर्चा में आए थे ।मनमोहन सिंह से अवॉर्ड भी मिला था लेकिन ना जाने क्या सूझा के राजनीति में चले आए क्योंकि भ्रम था कि चुनाव जीत जाएंगे और बीजेपी बहुत काम अच्छा कर रही है मोदी लहर से शायद बेड़ा पार लग जाए। आईएएस अधिकारी से चले थे विधायक बनने लेकिन हार का सामना करना पड़ गया। जबचुनाव का माहौल था। तब मीडिया में खूब जोर शोर से खबर फैलाई गई कि आईएएस अधिकारी बीजेपी में शामिल हो रहे हैं जी देश में सब कुछ बेहतर हो रहा है इसलिए आईएस अधिकारी भरोसा जमा रहे हैं।जब उनसे पूछा गया कि आप राजनीति में आ रहे हैं क्या आपको सत्ता मिलेगी ?उन्होंने कहा इरादे नेक हो तो क्या नहीं मिलता लेकिन हार का सामना करना पड़ा क्या इरादे नेक नहीं थी ?बहराल जो भी हो चले थे आईएएस अधिकारी से विधायक बनने लेकिन सपना पूरा ना हो सका ।भ्रम था कि बीजेपी सरकार बहुत अच्छा कर रही है बस उसी भ्रम का शिकार हो गए ।आईएएस अधिकारी नौकरशाही को छोड़कर नेतागिरी आजमाने चले थे कहावत इन पर यही साबित हुई धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का । ऐसा ही भ्रम देश की प्रथम महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को भी हुआ दिल्ली के चुनाव में।उन्हें भी लगा कि मोदी लहर और बीजेपी लहर में उनका बेड़ा पार लग जाएगा और राजनीति में अन्ना हजारे का साथ छोड़ पहली बार उन्होंने दाव अजमाया।आम आदमी पार्टी से अन्ना हजारे के ही साथी केजरीवाल पहली बार हाथ आजमा रहे थे जब वह कोई भी सवाल करते तब किरण बेदी का जवाब होता कि बाद में जवाब दूंगी एक मुख्यमंत्री के बतौर इतना विश्वास था। उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा खुश किस्मती यह रही कि उन्हें राज्यपाल बना दिया क्या लेकिन हार का दाग तो छुटने वाला नहीं है। भ्रम से बाहर निकलिए और देखिए वास्तव में सरकार क्या कर रही है एक जज की भांति सरकार का आकलन कीजिए और फिर चुनाव कीजिए भ्रम तो आईएएस और आईपीएस को भी हुआ है हम तो आम आदमी हैं जी।

Unknown said...

Aap yaise hi likhte rhe..kam se kam santosh to hai ki aap chup nii h....lekin kisi jagah jald hi join kariye hamee aapka intajar h o hath malte khabaro ko sunane ka....

Unknown said...

Very nice

Abdul Wahid said...

Bilkul sahi...

Unknown said...

Very nice

Unknown said...

Sir, “एक हाँ” ही तो कहना था आपको, और आप भी आज अपने सहकर्मीयों की तरह मज़े में होते, ये क्या था जिसने “एक हाँ” भी ना बोलने दिया आपको.

देशभक्ति तो नहीं हो सकता, क्यूँकि वो तो आज आपके सहकर्मियों के लिए ज़्यादा उपयुक्त होगा। आज देशभक्ति की जो परिभाषा गढ़ी गयी है दरसल उसका मतलब केवल भक्ति ही है, मुझे तो इस भक्ति शब्द से ही मानो नफ़रत हो गयी है चाहे भक्ति ईश्वर की ही क्यूँ ना हो। ऐसी भक्ति पर या तो हँसी आती है या फिर तरस; अक्सर ग़ुस्सा भी आता है “ और हर right thinking person को डर नहीं लगना बल्कि ग़ुस्सा आना चाहिए।”

शाम को चाय पी रहा था और चयवाले को सुनकर ऐसा लगा की चाय फ़ेक दूँ ......... पर।

एक typo error है, सर्जिकल स्ट्राइक 2016 में हुआ था।

Unknown said...

Koi to hai iss raja ke raj mai jo sach bolne ki himmat rakhta hai varna baki sab to bas chaplusi karne mai hi lage hai

Unknown said...

Sir aap ek bar wapash AA jao

PRASHANT AGRAWAL said...

सत्य लिखने और बोलने के लिए सामर्थ हर कोई में नहीं होता विशेषकर जब देश का प्रधान राजा धनानंद की तरह क्रूर हो तब कोई अमात्य भी सही सलाह राजा को नहीं दे सकता प्रकाशित करना तो दूर की बात है किंतु समय ने क्रूर से क्रूर धनानंद हिटलर मुगल सबका अंत किया है तो साहब यहां तो प्रजातंत्र है साल 2019 परिवर्तन का वर्ष होगा और राजा के अभिमान को दंभ कर धूल चटाने वाला वर्ष होगा

akkas ali said...

so much

Archana 9630 said...

राजा को सर्जिकल स्ट्राइक में अंतिम जवान की जीवन की चिंता थी पर रमजान के महीने में कश्मीर में कितने सैनिकों को मरवा दिया गया उसकी चिंता नहीं थी मोदी जी ही सर्वे सर्वा है हिंदुस्तान के समस्त राजनीति के सूरज हैं,हर विषय का ज्ञान राजा जी को जितना ज्ञान है उतना किसी को नहीं है इनसे किसी भी विषय पर भाषण करवा लीजिए यह पारंगत तरीके से भाषण देते हैं बस आप उस पर cross questions मत करिए सुनते रहिए मन की बात की तरह हर प्रश्न का जवाब सुनते रहिए।मीडिया का क्या हाल किया है कि कुछ देखने और पढ़ने की इच्छा ही नहीं करती है इनके जैसे प्रखर पत्रकार को भी इस तरह से अपनी बात लोगों तक पहुंचाने पड़ रही है इससे दुखद और क्या हो सकता है इनसेट हर तरह का ज्ञान ले लीजिए और इनसे इनके किए वादों के बारे में कुछ भी मत पूछिए।पर विश्वास है अंत हर चीज का होता है तो अंत इनका का भी होगा और सच्चाई एक ना एक दिन सबके सामने जरूर आएगी, इन मुखौटो की सच्चाई जिस दिन सामने आएंगी तब लोगों का दिमाग अवश्य हिल जाएंगा, ईश्वर न्याय अवश्य करेंगे इसका पूरा विश्वास है और बाजपेई जी को ऐसा उस अवसर अवश्य मिलेगा कि खुलकर अपनी बात कह सकें।

Unknown said...

आज के समय " इलेक्टॉनिक मीडिया " देश की जनता को सबसे ज्यादा बेवकूफ बना रही है !

Unknown said...

एकदम सही है सरजी

ARBIND PANDEY said...

Nice

ARBIND PANDEY said...

Bahut khoob

आर्य मुसाफिर said...

लगभग छ: हजार वर्ष से हमारे देश में लोकतन्त्र/प्रजातन्त्र/जनतन्त्र/जनता का शासन/पूर्णत: स्वदेशी शासन व्यवस्था नहीं है। लोकतन्त्र में नेता / जनप्रतिनिधि चुनने / बनने के लिये नामांकन नहीं होता है। नामांकन नहीं होने के कारण जमानत राशि, चुनाव चिह्न और चुनाव प्रचार की नाममात्र भी आवश्यकता नहीं होती है। मतपत्र रेल टिकट के बराबर होता है। गुप्त मतदान होता है। सभी मतदाता प्रत्याशी होते हैं। भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होता है। लोकतन्त्र में सुख, शान्ति और समृद्धि निरन्तर बनी रहती है।
सत्तर वर्ष से गणतन्त्र है। गणतन्त्र पूर्णत: विदेशी शासन प्रणाली है। गणतन्त्र का अर्थ है- गनतन्त्र = बंदूकतन्त्र, गुण्डातन्त्र = गुण्डाराज, जुआंतन्त्र = चुनाव लडऩा अर्थात् दाँव लगाना, पार्टीतन्त्र = दलतन्त्र, तानाशाहीतन्त्र, परिवारतन्त्र = वंशतन्त्र, गठबन्धन सरकार = दल-दलतन्त्र = कीचड़तन्त्र, गुट्टतन्त्र, धर्मनिरपेक्षतन्त्र = अधर्मतन्त्र, सिद्धान्तहीनतन्त्र, आरक्षणतन्त्र = अन्यायतन्त्र, अवैध पँूजीतन्त्र = अवैध उद्योगतन्त्र - अवैध व्यापारतन्त्र - अवैध व्यवसायतन्त्र - हवाला तन्त्र अर्थात् तस्करतन्त्र-माफियातन्त्र; फिक्सतन्त्र, जुमलातन्त्र, विज्ञापनतन्त्र, प्रचारतन्त्र, अफवाहतन्त्र, झूठतन्त्र, लूटतन्त्र, वोटबैंकतन्त्र, भीड़तन्त्र, भेड़तन्त्र, भाड़ातन्त्र, भड़ुवातन्त्र, गोहत्यातन्त्र, घोटालातन्त्र, दंगातन्त्र, जड़पूजातन्त्र (मूर्ति व कब्र पूजा को प्रोत्साहित करने वाला शासन) अर्थात् राष्ट्रविनाशकतन्त्र। गणतन्त्र को लोकतन्त्र कहना अन्धपरम्परा और भेड़चाल है। अज्ञानता और मूर्खता की पराकाष्ठा है। बाल बुद्धि का मिथ्या प्रलाप है।
निर्दलीय हो या किसी पार्टी का- जो व्यक्ति नामांकन, जमानत राशि, चुनाव चिह्न और चुनाव प्रचार से नेता / जनप्रतिनिधि (ग्राम प्रधान, पार्षद, जिला पंचायत सदस्य, मेयर, ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि) बनेगा। उसका जुआरी, बेईमान, कामचोर, पक्षपाती, विश्वासघाती, दलबदलू, अविद्वान्, असभ्य, अशिष्ट, अहंकारी, अपराधी, जड़पूजक (मूर्ति और कब्र पूजा करने वाला) तथा देशद्रोही होना सुनिश्चित है। इसलिये ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमन्त्री तक सभी भ्रष्ट हैं। अपवाद की संभावना बहुत कम या नहीं के बराबर हो सकती है। इसीलिये देश की सभी राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक, भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषायी और प्रान्तीय समस्यायें निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनैतिक दल देश को बर्बाद कर रहे हैं। राष्ट्रहित में इन राजनैतिक दलों का नामोनिशान मिटना / मिटाना अत्यन्त आवश्यक है।
विदेशी शासन प्रणाली और विदेशी चुनाव प्रणाली के कारण भारत निर्वाचन आयोग अपराधियों का जन्मदाता और पोषक बना हुआ है। इसलिये वर्तमान में इसे भारत विनाशक आयोग कहना अधिक उचित होगा। जब चुनाव में नामांकन प्रणाली समाप्त हो जायेगा तब इसे भारत निर्माण आयोग कहेंगे। यह हमारे देश का सबसे बड़ा जुआंघर है, जहाँ चुनाव लडऩे के लिये नामांकन करवाकर निर्दलीय और राजनैतिक दल के उम्मीदवार करोड़ो-अरबों रुपये का दाँव लगाते हैं। यह चुनाव आयोग हमारे देश का एकमात्र ऐसा जुआंघर है, जो जुआरियों (चुनाव लड़कर जीतने वालों) को प्रमाण पत्र देता है।