Tuesday, January 22, 2019

.....और सत्ता कहती है जय हिद !


मेहुल चोकसी ने भारतीय नागरिकता छोड दी। उससे पहले जांच के लिये भारत लौटने से ये कह कर इंकार कर दिया था कि भारत में उनकी लिचिंग हो सकती है । विजय माल्या ने पहले भारतीय जेल को अमानवीय बताया और अब स्विस बैक से कहा आप मेरे अकाउंट की जानकरी भारतीय जांच एंजेसी सीबीआई  को कैसे दे सकते है जो खुद ही दागदार है । जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है । भारत के राष्ट्रीयकृत बैको से जनता के पैसे को कर्ज ले कर ना लौटाने वाले कारपोरेट व उघोगपतियो की कतार करीब 900 तक पहुंच चुकी है । और आंकडा बारह हजार करोड रुपये पार कर चुका है । इसी दौर में देश पर बढता कर्ज 80 लाख करोड का हो चुका है । और आक्सफाम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत के टापमोस्ट सिर्फ नौ लोगो की आमदानी - कमाई या संपत्ति का कुल आंकडा देश के 65 करोड लोगो की आय संपत्ति या आमदनी के बराबर है । दुनिया में भारत को लेकर तमाम चकाचौंध बिखराने के बावजूद दुनिया भर से भारत के बाजार में डालर झौकने वाले बढ क्यो नहीं रह है ये सवाल अब भी अनसुलझा सा बना दिया गया है । 2017 में 40 बिलियन डालर का निवेश हुआ तो 2018 में 43 बिलियन जालर का निवेश भारत में हुआ । जबकि ब्राजिल सरीखे देश में 59 बिलियन डालर का विदेशी निवेश 2018 में हो गया । जहा की सत्ता ने दुनिया घूमने पर सबसे कम खर्च किया । और चीन में 142 बिलियन डालर का निवेश 2018 में हो गया । तो भारत की दौड में किस देश से हो सकती है ये सोचने समझने स पहले इस हकीकत को भी जान लें कि यूपी में निवेश को लेकर जब योगी-मोदी ने बाइब्रेट गुजरात की तर्ज पर सम्मेलन किया तो निवेश का भरोसा देने वाले एक विदेशी कारपोरेट ने पिछले दिनो अध्ययन कर पाया कि कृर्षि अर्थव्यवस्था पर टिके यूपी में किसानो को अब अपनी फसल बचाने के लिये गाय के लिये बाड बनाने से जुझना पड रह है । और बाड लगाने क लिये किसानो के पास पैसे नहीं है और राज्य सरकार गायो की बढती तादाद के लिये गौ चारण की जमीन तक की व्यवस्था तो दूर कोई व्यवस्था तक करने में सक्षम नहीं है । दिल्ली की एक संस्था से मदद लेकर भारत के मेडिकल क्षेत्र में निवेश की योजना बनाने वाली विदेशी कंपनी ने पाया कि भारत में प्राइवेट अस्पताल खोलना सबसे फायदे का धंधा है । और सरकारी अस्पताल में न्यूनतम जरुरते तो दूर 70 फिसदी बिमार और ज्यादा बिमारी लेकर अस्पताल से लौटते है । यानी अस्पताल साफ सुधरे रहे सिर्फ ये काबिलियत ही प्राइवेट अस्पताल को लायक होने का तमगा दे देती है । फिर भारत का अनूठा सच शिक्षा से भी जुडा है जहां स्कूल जाने वाले 50 फिसदी से ज्यादा बच्चे जोड-घटाव तक नहीं कर सकते । अग्रेजी तो दूर की गोटी है हिन्दी भी पढ नहीं पाते । यानी सामने वाला जो बोल रहा है उसे सुन कर जो सही गलत समझ में आये उसे ही सच मान कर देश की आधी आबादी जिन्दगी जी रही है । और इस जिन्दगी को चलाने वाले नेताओ की कतार सिर्फ बोलती है क्योकि बोल कर वोट पाने का लाइसेंस उन्ही के पास हो और लोकतंत्र का तकाजा यही कहता है कि जो खूब शानदार बोल सकता है वहीं देश की सत्ता को संभाल सकता है । यानी सारे सवाल उस दायरे में आकर सिमट जाते है जहा 2014 में 10 जनपथ तक जीरो जीरो लगाते हुये करोडो के घोटाले-घपले का आरोप नेहरु गांधी परिवार पर नरेन्द्र मोदी लगाकर सत्ता पाते है और 2019 में नरेन्द्र मोदी को चौकीदार चोर है कि उपमा दे कर राहुल गांधी अब परिपक्व नजर आने लगते है क्योकि उनकी अगुवाई में काग्रेस कई राज्यो में लौट आती है ।
तो सवाल कई है । मसलन , क्या भारत को बनाना रिपब्लिक बनाकर सत्ता पाना ही लोकतंत्र हो चुका है । क्या भारतीय ही भारत को लूट कर गणतंत्र होने का तमगा सीने से लगाये हुये है । क्या भारतीय राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का मोल भाव सत्ता बनाने या बिगाडने में जा सिमटा है । क्या संविधान को भी सत्ता का औार बनाकर सत्ताधारी देश से खेलने में हिचक नहीं रह है । क्या देश में खुली लूट कर देश छोडकर भागना बेहद आसान है क्यो कि सत्ता पाने की तिकडम [ चुनाव के तौर तरीके  ] ही एक ऐसी पूंजी पर जा टिकी है जो इमानदारी से बटोरी नहीं जा सकती और बेइमानी किये बगैर लौटायी नहीं जा सकती । क्या दुनिया में भारत इसलिये आकर्षण का केन्द्र है क्योकि भारतीय बाजार से कमाई सबसे ज्यादा है । या फिर जिस तरह दो जून की रोटी तले आस्था के समंदर में देश के 80 करोड लोग गोते लगाते है उसमें दुनिया की कोई भी फिलास्फी फेल होने के बाद भारत आकर आंनद ले सकती है । या फिर भारत धीरे धीरे खुद को उस पुरातन अवस्था में ले जा रहा है जहा विकसित या विकासशील होने-कहलाने का मार्ग नहीं जाता बल्कि अतीत के गौरवमयी हालातो को धर्म की चादर में लपेट कर सत्ता सुला देना चाहती है । यानी मिजाज लेकतंत्र का हो या परिभाषा आजादी की गढी जाये या फिर आस्था के आसरे राष्ट्रवाद और देश भक्ति के नारे लगाये जाये , भारत कैसे सत्ता की लूट और विज्ञान के आसरे विकसित होने की तरफ ध्यान ही ना दें इसके उपाय भी लगातार खोजे जा रहे है । क्योकि शिक्षा-प्रोफेशनल्स-रोजगार को लेकर दुनिया में फैले विदेशियो की तादाद में भारत का नंबर चीन - जापान के बाद आता है ।  चीनी और जापानी देश लौटते है । नागरिकता छोडते नहीं । अपने देश के लिये काम करते है । पर दुनिया में फैले भारतीयो की तादाद लगातार बढ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ रही है । तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ रहा है जहा गांव से रास्ता छोटे शहर । छोटे शहर से बडे शहर । बडे शहर से महानगर । और महानगर से देश छोड कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है । और जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियो पर जो सत्ता को भी गढते है और सत्ता के जरीये खुद को भी । फिर सियासत डगमगाने लगे तो देश की नागरिकता छोड भारतीय व्सवस्था पर ही सवाल उठाने से नहीं चुकते । और सत्ता कहती है जय हिन्द !     

19 comments:

Unknown said...

आज नेता सिर्फ़ इसलिए कुर्सी पाना चाहते कि वो देश को लूट सकें

Sajid ali said...

आज देश किस तरफ जा रहा है जहाँ पर सरकार को आम आदमी से कोई मतलब नहीं है.65 करोड़ लोगों के पास जितना पैसा है उतना पैसा तो सिर्फ देश के9 लोगो के पास है मतलब साफ है कि अमीर और ज्यादा अमीर हो रहा है और गरीब और ज्यादा गरीब हो रहा है इससे साफ हो रहा है कि कॉरपोरेट घरानों ने किस तरह से मोदी जी को सत्ता दिलाने में मदद की. देश में आज अराजकता का माहौल है. युवा बेरोजगार है उसको कुछ समझ में नही आ रहा है कि क्या करे. किस तरह से मोदी सरकार ने संवैधानिक व्यवस्था को खत्म कर दिया है.

Unknown said...

Kya baat kahi..bas gahari.naked truth. Thoda aakdope Dhyan dijiye. 900 logone sirf 9 Hazzard cr.?
Aur yeah log vapas as kar satya batade toh kya hota?🤔

Unknown said...

Sir keep writing , proud of you sir

Jagdish Bhatt said...

तो सो जाओ चादर औढ कर, जब सब लूटने में लगे हैं तो गरीब की सुध कौन करेगा? इस अंधेर नगरी में कुछ वाजपयी और रविश है जो कुछ उम्मीद जगाते हैं |

Unknown said...

जिनका दावा है कि इस देश मे सुशासन की अवधारणा का आविष्कार दिनांक 26 मई 2014 को ही हुआ था और इसके पूर्व कुछ हुआ ही नहीं और जो भी लोग थे सब भृष्ट थे। उनका खुद के कृतित्व के आत्मावलोकन का कोई न तो प्रयास है और ना ही इरादा। एक भजन मण्डली अनवरत महिमामंडन मे लगी है विशेष जानकारी के आभाव मे एक बड़ा जन समूह भक्तों मे तब्दील होगया है। ऐसे दौर मे सवाल उठाने वाले सवाल पूँछने वाले कम जरूर दिख रहे हैं पर अप्रासंगिक नहीं हैं और ना कम हैं उन से सहमत लोग। हमारे देश की एक समस्या ये भी है कि अधिकांश जनता मुखर विरोध नहीं करती इसलिये सामनेवाले को भ्रम है कि भक्तों की संख्या ज्यादा है। ऐसे मे आप जैसे लोग का महत्व और अधिक हो जाता है। आपका अनवरत ईमानदार प्रयास हमेशा प्रशंसनीय है।

Dharamvir Kumar jha said...

Bahut Accha

manish mishra said...

सुधार कैसे हो,क्या किया जाए ...?

Archana 9630 said...

याद कीजिए मोदी जी ने कहा था कि मैं गुजराती हूं और गुजराती के खून में व्यापार बसता है,10 मोदी जी व्यापार ही कर रहे हैं प्रत्यक्ष मोदी जी जरूर दिखाई देते हैं और परोक्ष रूप से इस देश पर अंबानी का राज चल रहा है,जबकि अन्य देशों में अमीरों की संपत्ति घट रही है अंबानी की संपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है आखिर कौन सा ऐसा व्यापार कर रहे हैं,इनका व्यापारी सत्ता के जरिए देश को लूटना है और जब हमारे नेता ही धंधा करने लग जाए तो फिर देश को कौन सोचे। प्रसून जी आप द्वारा राजनीति का ऐसा विहंगम चित्रण आत्मा को छलनी कर देता है, अफसोस होता है उन शहादतो पर जो इन गद्दार नेताओं के लिए किया गया जो देश भक्ति का नारा लगाते हैं और देश का खजाना लूट रहे हैं व लूटने दे रहे हैं, सबसे अमीर पार्टी 7 स्टार कार्यालय और नारा देश भक्ति का यह कहना कि दूसरे धन शक्ति पर और हम जन शक्ति के बल पर लड़ रहे हैं, निर्लज्जता और वाचालता की पराकाष्ठा है।इस देश में शिक्षा का स्तर गिराना और बेरोजगारों की संख्या बढ़ाना एक साजिश का हिस्सा है, क्या हम किसी भी सामान्य अच्छे देश से अपनी तुलना करने के लायक भी रह गए हैं, वाकई हालत अत्यंत निराशाजनक है,अब तो किसी सच्चे देशभक्त या किसी मसीहा का ही इंतजार है अन्यथा आखरी विकल्प जनता को जागरूक होना ही होगा अब तो तीसरी शक्ति से ही प्रार्थना है कि वह इस देश के हालातों को सुधारें।

john said...

माफ कीजिएगा परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में अगर कोई सक्षम हो तो इस देश को छोड़ना बेहतर है। जहाँ इंसान की कीमत जानवरों से भी सस्ती है, जहाँ जाति को प्रतिभा के आगे रखा जाता है।

Archana 9630 said...

You are right .

ARBIND PANDEY said...

अतिउत्तम

Unknown said...

लगातार लिखते रहिये श्रीमान क्रांति से पूर्व जागरूकता अति आवश्यक हैं आपको सिद्दत से पढा जा रहा है

Pravin Damodar said...

भारत की जनता इतनी गहरी निंद मे सोई हुई है कि जब तक वो उठ जाये देश लुट गया होगा

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 122वीं जयंती - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 122वीं जयंती - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Aditya Prakash said...

I am your big fan and have been following you for last 5 years. It's very sad that you have gone away from television. I miss you everyday. Mostly at 10PM and on every occasion of Indian politics. When are you coming back on TV.

Aditya
@ adityaprksh449@gmail.com

आर्य मुसाफिर said...

लगभग छ: हजार वर्ष से हमारे देश में लोकतन्त्र/प्रजातन्त्र/जनतन्त्र/जनता का शासन/पूर्णत: स्वदेशी शासन व्यवस्था नहीं है। लोकतन्त्र में नेता / जनप्रतिनिधि चुनने / बनने के लिये नामांकन नहीं होता है। नामांकन नहीं होने के कारण जमानत राशि, चुनाव चिह्न और चुनाव प्रचार की नाममात्र भी आवश्यकता नहीं होती है। मतपत्र रेल टिकट के बराबर होता है। गुप्त मतदान होता है। सभी मतदाता प्रत्याशी होते हैं। भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होता है। लोकतन्त्र में सुख, शान्ति और समृद्धि निरन्तर बनी रहती है।
सत्तर वर्ष से गणतन्त्र है। गणतन्त्र पूर्णत: विदेशी शासन प्रणाली है। गणतन्त्र का अर्थ है- गनतन्त्र = बंदूकतन्त्र, गुण्डातन्त्र = गुण्डाराज, जुआंतन्त्र = चुनाव लडऩा अर्थात् दाँव लगाना, पार्टीतन्त्र = दलतन्त्र, तानाशाहीतन्त्र, परिवारतन्त्र = वंशतन्त्र, गठबन्धन सरकार = दल-दलतन्त्र = कीचड़तन्त्र, गुट्टतन्त्र, धर्मनिरपेक्षतन्त्र = अधर्मतन्त्र, सिद्धान्तहीनतन्त्र, आरक्षणतन्त्र = अन्यायतन्त्र, अवैध पँूजीतन्त्र = अवैध उद्योगतन्त्र - अवैध व्यापारतन्त्र - अवैध व्यवसायतन्त्र - हवाला तन्त्र अर्थात् तस्करतन्त्र-माफियातन्त्र; फिक्सतन्त्र, जुमलातन्त्र, विज्ञापनतन्त्र, प्रचारतन्त्र, अफवाहतन्त्र, झूठतन्त्र, लूटतन्त्र, वोटबैंकतन्त्र, भीड़तन्त्र, भेड़तन्त्र, भाड़ातन्त्र, भड़ुवातन्त्र, गोहत्यातन्त्र, घोटालातन्त्र, दंगातन्त्र, जड़पूजातन्त्र (मूर्ति व कब्र पूजा को प्रोत्साहित करने वाला शासन) अर्थात् राष्ट्रविनाशकतन्त्र। गणतन्त्र को लोकतन्त्र कहना अन्धपरम्परा और भेड़चाल है। अज्ञानता और मूर्खता की पराकाष्ठा है। बाल बुद्धि का मिथ्या प्रलाप है।
निर्दलीय हो या किसी पार्टी का- जो व्यक्ति नामांकन, जमानत राशि, चुनाव चिह्न और चुनाव प्रचार से नेता / जनप्रतिनिधि (ग्राम प्रधान, पार्षद, जिला पंचायत सदस्य, मेयर, ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि) बनेगा। उसका जुआरी, बेईमान, कामचोर, पक्षपाती, विश्वासघाती, दलबदलू, अविद्वान्, असभ्य, अशिष्ट, अहंकारी, अपराधी, जड़पूजक (मूर्ति और कब्र पूजा करने वाला) तथा देशद्रोही होना सुनिश्चित है। इसलिये ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमन्त्री तक सभी भ्रष्ट हैं। अपवाद की संभावना बहुत कम या नहीं के बराबर हो सकती है। इसीलिये देश की सभी राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक, भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषायी और प्रान्तीय समस्यायें निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनैतिक दल देश को बर्बाद कर रहे हैं। राष्ट्रहित में इन राजनैतिक दलों का नामोनिशान मिटना / मिटाना अत्यन्त आवश्यक है।
विदेशी शासन प्रणाली और विदेशी चुनाव प्रणाली के कारण भारत निर्वाचन आयोग अपराधियों का जन्मदाता और पोषक बना हुआ है। इसलिये वर्तमान में इसे भारत विनाशक आयोग कहना अधिक उचित होगा। जब चुनाव में नामांकन प्रणाली समाप्त हो जायेगा तब इसे भारत निर्माण आयोग कहेंगे। यह हमारे देश का सबसे बड़ा जुआंघर है, जहाँ चुनाव लडऩे के लिये नामांकन करवाकर निर्दलीय और राजनैतिक दल के उम्मीदवार करोड़ो-अरबों रुपये का दाँव लगाते हैं। यह चुनाव आयोग हमारे देश का एकमात्र ऐसा जुआंघर है, जो जुआरियों (चुनाव लड़कर जीतने वालों) को प्रमाण पत्र देता है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पूर्णत: अविश्वसनीय उपकरण है। यह ई.वी.एम. भ्रष्टाचार का अत्याधुनिक यंत्र है। आम आदमी इन मशीनों द्वारा होने वाले जालसाजी से अनभिज्ञ हैं, क्योंकि उनके पास इस विषय में सोचने का समय और समझ नहीं है। इन मशीनों द्वारा होने वाली जालसाजी को कम्प्यूटर चलाने वाले और सॉफ्टवेयर बनाने वाले बुद्धिमान इंजीनियनर/तकनीशियन लोग ही निश्चित रूप से जानते हैं। वर्तमान में सभी राजनैतिक दल ई.वी.एम. से होने वाले भ्रष्टाचार से परिचित हंै, जब तक विपक्ष में रहते हैं तब तक ई.वी.एम को हटाने की मांग करते हैं, लेकिन जिस पार्टी की सरकार बन जाती है वह पार्टी चुप रहता है। अनेक देशों में ई. वी. एम. पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित है। ई. वी. एम. के स्थान पर कुछ जगह वी. वी. पेट. का प्रयोग किया जाता है, जो बहुत खर्चीला है। उसमें निकलने वाले मतपत्रों (पर्चियों) को सुरक्षित रखने और गिनने से तो अच्छा है कि पुरानी पद्धति से बड़े-बड़े मतपत्रों में मुहर लगवाकर मतदान करवाया जाय। हमारे देश के सभी ई. वी. एम. और वी. वी. पेट मशीनों को तोड़-फोड़ कर, आग लगाकर या समुद्र में फेंककर नष्ट कर देना चाहिये।

Dharamvir Kumar jha said...

Very nice