Saturday, December 12, 2009

कोपेनहेगेन, मीडिया और कविता

कोपेनहेगेन से कुछ निकलेगा इसकी संभावना नहीं के बराबर है । सवाल है जो पर्यावरण अमेरिका के लिये अर्थशास्त्र है, वही पर्यावरण हमारे लिये संस्कृति है । और कोपेनहेगेन में इसी संस्कृति को कानूनी जामा पहनाकर टेक्नालाजी बेचने-खरीदने का धंधा शुरु हुआ है । संस्कृति बेचकर विकासशील देशो के उन्हीं उघोगों और कारपोरेट सेक्टरो को कमाने के लिये कोपेनहेगेन में 200 बिलियन डालर है जिनके धंधे तले भारत में किसानी खतरे में पड चुकी है और पीने का पानी दुर्लभ हो रहा है । मनमोहन सिंह भी इसी समझ पर ठप्पा लगाने 18 दिसंबर को कोपेनहेगेन जायेंगे। मनमोहन के अर्थशास्त्र ने जो नयी सस्कृति देश में परोसी है, उसमें धंधे और मुनाफे में सबकुछ सिमट गया है । लोकतंत्र का हर पहरुआ पहेल मुनाफा बनाता है फिर सवाल खड़ा करता है । अछूता चौथा खम्भा यानी मीडिया भी नहीं है। जाहिर है धंधा मीडिया की जरुरत बन चुकी है तो कोपेनहेगेन को लेकर उसकी रिपोर्टिग भी उसी दिशा में बहेगी जिस दिशा में मुनाफा पानी तक सोख ले रहा है । पृथ्वी गर्म हो रही है। जीवन को खतरा है । 2012 तक सबकुछ खत्म हो जायेगा.....कुछ इसी तरह अखबार और न्यूज चैनल लगातार खबरे दिखा भी रहे है । इसी मीडिया के लिये कोई मायने नहीं रखता कि आधुनिकता और औघोगिकरण के साये में कैसे मानसून को ही छिन लिया गया । बीते बीस सालों के मनमोहनइक्नामिक्स के दौर में 45 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और नौ फीसदी खेती योग्य जमीन को बंजर बनाया गया । चार फिसदी खेती की जमीन को उघोगों ने हड़प लिया । यह सवाल मीडिया के लिये मौजू नहीं है । याद कीजिये कैसे दो दशक पहले तक एक बहस होती थी कि पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे से जुडे हुये है, तब सरोकार का सवाल सबसे बड़ा माना जाता है । लेकिन नये दौर में पत्रकारिता बिकने को तैयार है तो साहित्य कमरे में बौद्धिकता से दो दो हाथ कर रहा है । कहते है तीसरा विश्वयुद्द पानी को लेकर ही होगा । ऐसे में बात कोपेनहेगेन की क्या करें.......माना जाता है कवितायें हमें अपने समय और चीजों के भीतर मौजूद उन बारीक और सघन संवेदनाओ और आहटों के संसार में ले जाती है, जो बाजार के शोर में हमसे अनदेखा या अनसुना रहता है । ऐसे मौके पर आज एक कविता पढाइये...आलोक धन्वा की यह कविता उसी बाजार से जिरह करती है जो जिन्दगी का सबकुछ सोखकर जिलाना चाहती है । करीब 12 साल पहले आलोक धन्वा ने यह कविता लिखी थी ।

पानी

आदमी तो आदमी

मै तो पानी के बारे में भी सोचता था

कि पानी को भारत में बसना सिखाउगां

सोचता था

पानी होगा आसान

पूरब जैसा

पुआल के टोप जैसा

मोम की रोशनी जैसा

गोधूलि के उस पार तक

मुश्किल से दिखाई देगा

और एक ऐसे देश में भटकायेगा

जिसे अभी नक्शे पर आना है

उचाई पर जाकर फूल रही लतर

जैसे उठती रही हवा में नामालूम गुंबद तक

यह मिट्टी के घडे में भरा रहेगा

जब भी मुझे प्यास लगेगी

शरद हो जायेगा और भी पतला

साफ और धीमा

किनारे पर उगे पेड की छाया में

सोचता था

यह सिर्फ शरीर के काम ही नहीं आयेगा

जो रात हमने नाव पर जगकर गुजारी

क्या उस रात पानी

सिर्फ शरीर तक आकर लौटता रहा ?

क्या क्या बसाया हम ने

जब से लिखना शुरु किया ?

उजडते हुए बार-बार

उजडने के बारे में लिखते हुये

पता नहीं वाणी का

कितना नुकसान किया

पानी सिर्फ वही नहीं करता

जैसा उस से करने के लिये कहा जाता है

महज एक पौधे को सींचते हुये पानी

उसकी जरा-सी जमीन के भीतर भी

किस तरह जाता है

क्या स्त्रियों की आवाजो से बच रही है

पानी की आवाजें

और दूसरी सब आवाजे कैसी है?

दुखी और टूटे हुये ह्रदय में

सिर्फ पानी की रात है

वहीं है आशा और वहीं है

दुनिया में फिर से लौट आने की अकेली राह .

11 comments:

prabhat gopal said...

जब एक मीडिया का आदमी खुद मीडिया के बारे में बात करता है, तो लगता है कि परिवर्तन के आसार अब भी मौजूद हैं।

गरीबों और किसानों के दर्द को समझने की चेष्टा करना आज बिना मतलब का रह गया है। जब लक्ष्य मुनाफा हो, तब सिर्फ पूंजी उगाहनेवाले समूह ही समाचारों के दायरे में आते हैं। ये तब तक होता रहता है, जब तक कि खुद मीडिया जगत उससे न हिलने लगे।

वैसे कविता भी अच्छी लगी।

Suman said...

nice

परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

ऐसा भी नहीं है कि कोपेनहेगेन से कुछ नहीं निकल रहा है, परंतु विडंबना यह है कि जो कुछ निकल रहा है वह कुछ नया भी नही है। कोपेनहेगेन प्रकरण से साफ जाहिर होता है कि -
१. काला गोरा होने से कोई मतलब नहीं है, एक साम्राज्यवादी देश का आका सिर्फ और सिर्फ साम्राज्यवादी देश के आका जैसा ही बर्ताव करता है।
२. आवारा पूंजी मुनाफे के लालच में गरीब मूल्कों को गुलाम बनाने का कोई अवसर जाया नहीं करती है।
३. परमाणु करार के लिए मनमोहन सरकार ने देश की सुरक्षा अस्मिता स्वतंत्रता तक को दाव पर लगा दिया है। हमारी विदेश निती साम्राज्यवाद की पिछलग्गु बनकर रह गयी है।
४. अपने आका को खुश करने के वास्ते ईरान विरोधी प्रस्ताव का समर्थन करने के बाद अब कोपेनहेगेन में भी अपने आकाओं की खुशी के वास्ते पी एम शाष्टांग दंडवत करने की तैयारी कर रहे है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

परिवर्तन तो जीवन है वह रुकता नहीं। रुकता है तो समय, जीवन सब कुछ रुक जाता है।

चन्दन said...

कोपेनहेगेन मे कुछ हो न हो, कविता आपने शानदार पढ़ाई। ये मेरे प्रिय कवि हैं।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

चौथा खम्बा तो धसकता जा रहा है ..
सरकार से कम नहीं है , यह भी ..
कविता बड़ी अच्छी है ..

SWAPNILA said...

COPENHAGEN SUMMIT ME KOI AAM SAHMATI HO JAAYE ..AASAN NAHI HAI. IS SAMMELAN KA SABSE BADA SANKAT TO YAHI HAI KI BIKASIT AUR VIKASSHIL DESO KO AIK HI CHASME SE DEKHA JA RAHA HAI. AISE BHARAT KA PRATINIDHITWA KARNE WALI MANMOHAN SARKAR YADI YAHA BHI DHILAAI DEKHATI HAI TAB MUSKIL JARROR HOGI. GAUR KARNE WALI BAAT HAI KI HAR ANTARRASTRIY MUDDE PAR VARTAMAN SARKAR KA RAWIYA BAHUT HI KHEDJANAK HAI. CHAHE WO CHINA KA MASLA HO, PAKISTAN KA MASLA HO, SRILANKA KA MASLA HO YA PHIR NEPAL. IRAN KE MASLE PAR JIS TARAH WO FISLI HAI YE USKI KAMJOR VIDESH NITI KA SABOOT HAI. 26/11 HONE KE BAAD BHI WO KYA KAR PAAI? CHINA KUCHH BHI KARE HAM KHAMOS RAHEGE...KYA HAI YE? JIN PADOSI DESO KO VISWAS ME LENA CHAIYE THA WO DIN PAR DIN CHINA KI OR PRAWITT HOTE JA RAHE HAI. BANGALDESH ME HAMARE LIY MANMAFIK ISTHTI HAI PHIR BHI HAM KUCHH KAR PA RAHE HAI? CHINA CHOTE DESO KE SATH SARE MASLE SULJHA RAHA HAI PAR BHARAT KE LIYE USKA NAZRIYA AAJ BHI PAHLE JAISA HI HAI. SAWAL YAHI HAI KI JAB KHUD KE BHARAT NAHI KHADA HO PAA RAHA HAI TAB 192 DESO KE BICH WO KISKA KISKE LIYE BACHAW KAREGA. IS SARKAR KI AADAT HAI SIRF JHUKNE KI..JISKA NATIJA HAI TALANGANA PAR HO RAHA BAWAL . GHAREULOO ISTHITWO PAR YE ISTHTI HAI TO ANTARRASTRIY MUDDE PAR KYA AASA KARE?

अबयज़ ख़ान said...

सर कविता में बहुत मर्म है.. आपकी तारीफ़ के लिए तो शब्द भी नहीं हैं.. आपसे तो हमेशा कुछ सीखा है..

उमेश पंत said...

mshpantकोपेनहेगन और सुपरस्टीशन इन दोनों के बीच एक आपसी रिस्ता है। यहां भारत के पहाड़ी इलाकों में अंधविस्वास के चलते ही सही जंगलों को बचाने के लिए लोग जो कर रहे हैं वो अगर विश्वभर में किया जाता तो कोपेनहैगन में हो रही वैश्विक बहस की जरुरत शायद पड़ती ही नहीं। ऐसा क्या ये पहाड़ी लोग कर रहे हैं जानना चाहें तो नई सोच को एक बार खंगाल लें। कोपेनहेगन के बहाने एक अंधविस्वास के वैज्ञानिक पहलू पर एक नजर www.naisoch.blogspot.com पर....

Kamlesh Kumar Diwan said...

prasoon ji aapne jo tulna karte huye likha ,vah kahi behtar hai ,paryavaran ka vijnish band hona chahiye .

Sujeet Choubey said...

Sir,
I would have also written in Hindi but does not have facility to do so.

I appreciate your sensible & sensitive talk about the Present Media but do you think that TRP compitition among the electronic Media & the materialism in general will ever allow to meet its objective?? Secondly, how can we deny the fact that India has become a very good market for America and others.. "Kopenhagen TO EK MULAMMA HAI" But being a good economist Dr. Manmohan Singh does not seem to be up to mark for the masses of our country.
Overall, the Poem is superb..
....... Sujeet Kumar Choubey