Monday, December 14, 2009

दिल्ली का गोल्फ लिंक, मधुशाला....कैनवास औऱ बच्चन परिवार

दिल्ली का सबसे खामोश लेकिन सबसे हसीन इलाका गोल्फ लिंक। 14, गोल्फ लिंक के ठीक बाहर जैसे ही मैने गाड़ी रोकी, गेट पर लिखा देखा गांधी। यह कैसे हो सकता है...मै तो गैलरी में पेंटिग्स देखने आया था । लेकिन गांधी.....। सामने खड़े वाचमैन ने टोका....कहां जाना है। कोई गैलरी है...पेन्टिंग। हां-हां, आप अंदर जाइये। लकडी का बुलंद दरवाजा और बायीं तरफ उसी दरवाजे से अकेले लोगों के जाने का रास्ता। जी...ऊपर चले जाये..सीढियों से। पहली मंजिल पर......नहीं दूसरी पर....और सीढियां दिखाकर यही कह वाचमैन लौट गया। ना कोई आवाज...ना कोई शख्स। कमाल की खामोशी। खामोश...सुंदर सलोनी सीढियों पर चढ रहा था और दिमाग में बच्चन साहेब की आत्मकथा का वह हिस्सा रेंग रहा था...बिहार के मुजफ्फरपुर से निमंत्रण मिला.....मधुशाला का पाठ है...आपकी उपस्थिति मान्य है। और जब मै मुजफ्फरपुर स्टेशन पर उतरा तो कोई लेने वाला नहीं था। पूछते-पूछते जब मधुशाला के पाठ के कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा तो दूर से ही मंच दिखाई दे गया....और मधुशाला सुनाई दे गया। जो देखा तो आंखो से भरोसा ना हुआ...मंच से लेकर नीचे तक हर कोई पी रहा था और मधुशाला गा भी रहा था।

अजब माहौल था। किसी ने मुझे पहचाना तो आयोजकों को बताया। फिर मंच पर मैं क्या पहुंचूं। और क्या कहूं ........मधुशाला की पंक्तियो को याद कर गुनगुनाते हुये आखिर दूसरी मंजिल पर जैसे ही पहुंचा...नजर ठीक सीढियो के सामने दीवार पर टंगी पेंन्टिंग पर पड़ी। अंगूर की बेल...एक औरत की लट और अंधियारी रात के बीच सुर्ख गुलाबी रंग और उसके बगल में मधुशाला की एक रुबाई जो अंग्रेजी में लिखी थी। लेकिन उसका हिन्दी तर्जुमा मेरे जहन में खुद-ब-खुद रेंगने लगा......रुपसि, तूने सबके ऊपर /कुछ अजीब जादू डाला / नहीं खुमारी मिटती कहते /दो बस प्याले पर प्याला / कहां पडे है, किधर जा रहे / है इसकी परवाह नहीं / यही मनाते है, इनकी / आबाद रहे यह मधुशाला।......मधुशाला की इन पंक्तियो को मै भी एकटक पेन्टिंग में खोजने लगा।

सन्नाटे में मधुशाला को इस तरह निहारना मेरे लिये गजब की अनुभूति भी थी और दर्द भी। क्योकि मेरे लिये मधुशाला उस दौर की ऊपज थी जब आजादी के आंदोलन के दौर में समाज बंटा जा रहा था...तब मधुशाला सामूहिकता का बोध करा रही थी। उस युवा मन के अंदर बैचैनी पैदा कर रही थी, जो खुद को कई खेमों में बंटा हुआ समाज-धर्म-वर्ग-आंदोलन में अपने अस्तित्व को खोज रहा था। मैने कहीं पढा था, हरिवंश राय बच्चन ने पहली बार दिसंबर 1933 में काशी हिन्दू विश्वविधालय के शिवाजी हाल में ही मधुशाला का पाठ किया और वह दिन बच्चन का ही हो गया। हर कोई झूम रहा था और हर किसी की जुबान पर मधुशाला रेंग रही थी। लेकिन वक्त और मिजाज कैसे बदलता है...इसका अंदाजा 14. गोल्फ लिंक की दीवारों पर टंगी पेन्टिंग्स को देखकर लग रहा था।

यह पेंटिंग हरिवंश राय बच्चन की पोती ने बनाये थे। अमिताभ के भाई अजिताभ बच्चन की बेटी नम्रता ने। कैनवास पर रंगो को उकेरने वाले पतले से ब्रश सी काया लिये नम्रता तमाम पेन्टिंग्स के बीच एक कुर्सी पर सिमटी बैठी थी। गोल्फ लिंग के इस घर के दूसरे माले पर दो बड़े हाल में मधुशाला की 32 रुबाईयों को पेन्टिंग्‍स के जरिये उबारने की कमाल की कोशिश नम्रता ने की। हर पेन्टिंग के साथ मधुशाला की एक रुबाई अंग्रेजी में लिखी थी, जिसे पढकर बार-बार मुझे भी लगने लगा कि अगर बच्चन ने मधुशाला अंग्रेजी में लिखी होती तो शायद यह आजादी से पहले ही गुम हो गयी होती। या किताब में छपे अंग्रेजी साहित्य का हिस्सा भर होती और अमिताभ बच्चन भी इसे गुनगुनाकर बाबूजी यानी बच्चन जी को गाहे-बगाहे श्रदाजंलि नहीं दे पाते।

ना चाहते हुये भी मैने मधुशाला को कैनवास पर उकेरने वाली नम्रता से यह सवाल कर ही दिया.......आपने मधुशाला पहली बार किस भाषा में पढी। अंग्रेजी में। कभी हिन्दी में भी पढी....हां, पेन्टिंग बनाने के दौरान अक्सर। जेहन में कैसे आया कि मधुशाला को कैनवास पर उकेर दिया जाये। बस, यूं ही ....दादाजी को याद करते हुये अक्सर लगा कुछ उनकी यादो से खुद को जोड़ना चाहिये। यह उनके प्रति एक पोती की चाहत है। आपने हर पेन्टिंग में सुर्ख गुलाबी को बेस बनाया है, इसकी वजह। वाइन का प्रतीक है पिंक। लेकिन मुझे लगता है सुर्ख लाल रंग होना चाहिये...यह क्रांति का रंग भी होता है। कितना वक्त लगा इसे बनाने में। करीब एक साल। तो आपने सिर्फ शब्दों को पकड़ा या उस दौर को भी मधुशाला से जोड़ने के लिये कुछ पढा। हां, शुरु से ही अमेरिका में रही...तो जब यहां लौटी तो इच्छावश मधुशाला को रंगो के जरिये कागज पर उतारने की कोशिश की। उस समय की कुछ किताबो को जरुर पढा। लेकिन दिमाग में दादाजी और मधुशाला ही रही। लेकिन मधुशाला जितनी लोकप्रिय है, उसमें पेन्टिंग्स कहां टिकेगी। आप सही कह रहे है, लेकिन मेरे लिये यह दादाजी की याद है। लेकिन आपको नहीं लगता कि मधुशाला में जितनी जीवंतता है, पेन्टिंग्स उतनी ही डेड हैं। यह आपको लगता है। हां, मुझे लगता है मधुशाला सामूहिकता का प्रतीक है....यह कहते हुये मैंने नम्रता को मुजफ्फरपुर का वह किस्सा भी सुना दिया कि कैसे मधुशाला का पाठ करते हुये हर कोई सुरापान भी कर रहा था। किस्सा सुनते ही नम्रता एकदम छोटी बच्ची सरीखी हो गयी और ठहाके लगाते हुई बोली....ग्रेट। मुझे भी झटके में एक महीने पहले अमिताभ बच्चन से हुई मुलाकात के दौरान की हुई बाचतीच का वह हिस्सा याद आ गया जब इंटरव्यू खत्म हुआ तो मधुशाला पर बात हुई। और बात बात में मैंने जब उन्हें बताया कि किंगफिशर बनाने वाले विजय माल्या ने किंगफिशर की बुक में मधुशाला की रुबाईयों को लिख डाला है। तो अमिताभ बच्चन ने कहा, उन्हें पता है और उन्होंने इसका विरोध भी किया था। एक - दो नहीं, बल्कि दस पत्र विजय माल्या को भेजे...लेकिन कोई जबाब नहीं दिया गया। बाबूजी की मधुशाला पीने-पिलाने वालों के खिलाफ थी, इसे महात्मा गांधी जी ने भी माना था। क्योंकि उसे बच्चन जी के विरोधियों ने उठा दिया था कि मधुशाला उनके मद्यनिषेद के खिलाफ लिखी गयी रचना है। मैंने कहा इसकी शुरुआत मुजफ्फरपुर में मधुशाला के पाठ के वाकये के बाद ही हुई थी।

और उस दौर में बच्चन जी को याद करते हुये अमिताभ भी भावुक हो उठे। उन्होंने उसी वक्त बताया कि बाबूजी की पुण्यतिथि के वक्त इस बार वह हिन्दी संस्करण के साथ अंग्रेजी में भी मधुशाला चाहने वालो को भेंट करेंगे। उस वक्त भी मुझे लगा कि मधुशाला के रंग को ना पकड़ पाने की वजह से ही मधुशाला में लगातार रंग भरने की कोशिश बच्चन परिवार करता है और हर बार मधुशाला एक नये रंग के साथ बच्चन परिवार को ही चौकाती है। 14, गोल्फ लिंक में पेन्टिंग के बीच एक छोटा सा कमरा भी था जो अंधेरे में समाया हुआ था। वहां दीवार पर एक पतली सी रोशनी पड़ रही थी, जहां हिन्दी में मधुशाला की एक रुबाई लिखी थी........प्रियतम, तू मेरी हाला है / मै तेरा प्यासा प्याला / अपने को मुझमें भरकर तू / बनता है पीनेवाला ; /मै तुझको छक छलका करता / मस्त मुझे पी तू होता / एक दूसरे को हम दोनों / आज परस्पर मधुशाला ।......इस अंधेरे कमरे में जाते ही मुझे लगा बच्चन परिवार अभी भी हरिवंश राय बच्चन से जुड़ा है। दिल्ली के सबसे हसीन और खामोश 14, गोल्फ लिंक का यही कमरा मधुशाला के सबसे करीब जो था....

10 comments:

Dr. Mahesh Sinha said...

बड़ा अच्छा संस्मरण

Kamlesh Kumar Diwan said...

achcha sansmaran hai,badhai

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मन्दिर मस्ज़िद वैर कराते मेल कराती मधुशाला.,,,

Lal Sant Kumar Shahdeo said...

मधुशाला को याद कराने के लिए धन्यवाद |

anand pandey said...

dilli ka charitr hi kuch 'fluid' sa hai, this is true for your writing too. Realising that there are connections, and then creating a frame that sees those connections is what makes point of views interesting. Madhushala, art, dilli, Bachchan aur prasun's take! Kya baat hai!

kisalaya said...

Din ko Holi raat Diwali Roz manaati Madhushala .
Bahut achha sansmaran .
Ab bhi samay milte hi sun leta hoon .

nitu pandey said...

सर, शुक्रिया नागपुर सड़क इतिहास को बताने के लिए....आपके द्वारा लिखी गई आलेख में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती है..धन्यवाद

Anoop Aakash Verma said...

मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाल्ला.....
हरिवंश राय बच्चन जी हमेशा गाते वक्त मधुशाला को मधुशाल्ला कहा करते थे...किसी ने पूछा कि ऐसा क्यूं तो पता चला कि इससे दोहरे नशे की व्यंजना होती है.....
जय मधुशाला.............

virendra said...

काफी अच्छा संस्मरण है...प्रसून जी मेरे ख्याल से गुमनाम न्रमता को उर्जा की आवश्यकता थी..और वो बच्चन नाम से ही मिल सकती थी...वो तो उन्हें विरासत में मिला है..लेकिन उसे समय -समय पर भुनाना भी आवश्यक है...वैसे किसी भी बहाने से हरिवंश राय बच्चन और मधुशाला याद किए जाते रहे...

संजय भास्‍कर said...

मधुशाला को याद कराने के लिए धन्यवाद |