Saturday, August 9, 2008

चंद सवालों के जवाब

ब्लॉग की दुनिया में अपने पहले पोस्ट पर कई प्रतिक्रियाएं देख अच्छा लगा कि आखिर मुद्दों पर बहस शुरु होने की यहां संभावना तो है। पहली पोस्ट में आए कमेंट में कई सवाल हैं। मसलन, पत्रकार राजनीति का टूल बन रहे हैं। दरअसल,ब्लॉग,चैनल और न्यूज पेपर सभी इनफोरमेशन के टूल हैं,ये कोई अल्टीमेट गोल नहीं है। लेकिन, बड़ी तादाद में पत्रकार इन्हें अपना गोल मान रहे हैं,और जो मान रहे हैं,वहीं राजनीति का टूल बन रहे हैं। खतरा यही है। राजनीति और राजनेताओं के लिए मीडिया एक टूल बनता जा रहा है,जबकि मीडिया वाले मीडिया के तमाम माध्यमों को जरिया न मानकर उद्देश्य मान रहे हैं। इसलिए, आज का मीडिया पैसे से संचालित हो रहा है। मीडिया बिजनेस बन गया है। पत्रकारीय अंदाज में मीडिया का विकास नहीं हो पा रहा है अब।

अनुनाद सिंह ने कहा कि मीडिया भ्रष्ट है। हमारा कहना है कि ये एक इंटरपिटेशन हो सकता है। लेकिन, हमारा कहना है कि मीडिया टूल बनता जा रहा है, जो बड़ा खतरा है। भ्रष्ट चीज़ सुधर भी सकती है, लेकिन आप जरिया बन जाते हैं, फिर ऐसा नहीं हो सकता।

अफलातून, अजीत और यतेन का तर्क है कि ब्लॉग पर माइक क्यों लगाया है? दरअसल,माइक बोलने को प्रेरित करता है, उन्हें भी जो नहीं बोलते। माइक एक प्रतीकात्मक चिन्ह है। वैसे भी,माइक का इजाद इसलिए हुआ है कि ज्यादा लोग आपकी बात सुनें। वैसे, अगर आपको और हमें बहस के बाद लगेगा कि माइक भ्रष्ट मीडिया का प्रतीक है तो हम हटा देंगे। लेकिन, सोचिए आप भी कि इसे देना है या नहीं।

जहां तक अंशुमाली का सवाल है कि जनता की भागीदारी के बिना चीचें भष्ट नहीं होती। भाई, जनता कोई अलग नहीं है। हम-आप जनता है और नेता भी जनता है। लेकिन, संयोग से जो सिस्टम है, वो एक तबके के लिए है और एक तबके को ही प्रभावित कर रहा है। प्रभु वर्ग में घुसने की लालसा हर वर्ग में हो रही है। ये जो स्थिति है, उसमें हमको लगता है कि सिस्टम ने जनता और सत्ता को बांट दिया है या यूं कहें लाइन ऑफ कंट्रोल खींच दिया है। इसलिए जनता की भागीदारी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि इस देंश में जो चीजें चल रही हैं, वो जनता के लिए हैं ही नहीं। सवाल यही था कि देश में अस्सी करोड़ जनता के लिए कोई नीति नहीं बन रही है और न उनका हित देखा जा रहा है। ऐसे में ,जिसे जनता समझ रहे हैं, उसे कोई देखने वाला नहीं। ऐसे में, मीडिया ने भी उससे दूरी बना ली है।

जहां तक स्टिंग ऑपरेशन की बात है और जो सवाल रंजन और संजय का है तो हमारा कहना है कि इसी भाषा का इस्तेवाल वो नेता कर रहे हैं, जो बिक रहे हैं, खरीद रहे हैं और मीडिलमैन हैं। वो भी यही कह रहे हैं कि स्टिंग ऑपरेशन न दिखाने के लिए कोई डील तो नहीं हुई। आपसे आग्रह है कि इस खतरे को समझना होगा। मीडिया को फोर्थ स्टेट बनाए रखना है या सब कुछ घालमेल कर देना है, इस बारे में हमें तय करना होगा। इसलिए, हमें उनकी भाषा से बचना होगा। उनकी भाषा का इस्तेमाल कर आप नेता नहीं बन सकते इसके लिए दूसरे गुर चाहिए। वो अपनी भाषा, हमारे-आप पर थोप कर मीडिया को घेरना चाहते हैं।

डॉ. अमर कुमार कहते हैं कि आप राजनीति ही बाचेंगे? राजनीति पर चोट करने के आसरे से बचा नहीं जा सकता। मीडिया नहीं बच सकता। संयोग से राजनीति को जनता से सरोकार बनाने थे, वो उसने छोड़ दिया। मेरा कहना है कि समाजिक पहलुओं को उठाते हुए उंगली तो राजनीति पर उठेगी ही, क्योंकि वो नीति निर्धारक है। इसलिए हम तो इससे बचेंगे नहीं। चिंता न कीजिए.....अगर देश में नायक नहीं है, और लीडरशिप गायब हो रही है और फिल्मों में हीरो हीरोइन गायब हो तो हम वहां भी आ जाएंगे। उस पर भी बहस करेंगे।

ये अजब बात है कि जो लोग जो अस्सी और नब्बे के दशक में अच्छा काम मीडिया में कर रहे थे, अच्छी राजनीति संसद में कर रहे थे। वो इस नए सिस्टम का हिस्सा बनते जा रहे हैं। समझिए इसको, क्योंकि इस देश को न तो राजनीति और न ही जनता चला रही है बल्कि कुछ और चला रहा है। हम इस पर भी चर्चा करेंगे।

इसकी शुरुआत करेंगे कलावती की बात कर। मैं फिलहाल राहुल की कलावती के गांव जालका में ही हूं। कल दिल्ली लौटूंगा तो बताऊंगा आपको कैसी है राहुल की कलावती और क्या है जालका गांव का हाल।

31 comments:

Arun Arora said...

वाह पहली बार लगा कि किसी नामचीन ने ब्लोग को केवल अपनी ठेलने का औजार नही समझा. जो हमने कहा उसे भी पढा .इंतजार रहेगा आपकी कलावती वाली पोस्ट का :)

Unknown said...

चलिये भाई साहब आपने शुरुआत तो बहुत बेहतरीन और सधी हुई की है एक अच्छे और शरीफ़ पत्रकार की तरह, लेकिन यही देखना है कि ब्लॉग जगत में आपके "संगी-साथी" आपको कब तक इस तरह का रहने देते हैं, या कि आप कब तक ऐसे बने रह सकते हैं… इसे अन्यथा न लें, दो साल की ब्लॉगिंग के अनुभव बता रहा हूं… ब्लॉग जगत में आते ही व्यक्ति (खासकर पत्रकार) के दो व्यक्तित्व बन जाते हैं… शुभकामना है कि आप ऐसे ही सरल बने रहें

सतीश पंचम said...

ज्यादातर लोगों की आप पर नजर रहेगी, उसके पीछे वजह यह है कि जब कोई Live Reporting करने वाला बंदा मैदान में उतरता है तो लोगों की एक Live Feeling भी होती है जो आपके साथ जुड जाती है , और आप से लोगों की अपेक्षाएं बढ जाती हैं कि यहां एक उच्च स्तर की बहस देखने मिलेगी, उम्मीद है आप ईस पर खरे उतरेंगे।

- शुभकामनाओं के साथ सतीश पंचम

ये word verification हटा दें तो कमेंट देने में सुविधा होगी।

विजय-राज चौहान said...

प्रसून जी नए चिठ्ठे के लिए बधाई हो !
आशा रखता हूँ कि आप भविष्य में भी इसी प्रकार लिखते रहे |
आपका
विजयराज चौहान (गजब)
http://hindibharat.wordpress.com/
http://e-hindibharat.blogspot.com/
http://groups.google.co.in/group/hindi-bharat?hl=en

Anil Pusadkar said...

prasunjee intezaar rahega roz mar rahe kisaano ke ilaake ki kalawati ke bare me aapke vichaaron ko.

Rajesh Roshan said...

पहले पोस्ट के बाद दूसरा पोस्ट कुछ अच्छे सवाल उठा रहा है..... अफलातून जी, अजित जी और यतेन जी ने जो कहा इसका मतलब है कि ब्लॉग बोलने का नही लिखने का माध्यम है.... आप चाहे तो कलम लगा दे.... मैंने आपके पहले पोस्ट में कहा था कि राजीनीति जिसे लोग देखना नही चाहते लेकिन जो कभी गैर जरुरी नही हो सकता.....

एक बात और राहुल ने संसद में कलावती के बारे में कहा और आप चले गए..... आपका एक लगाव है महाराष्टू से.... समझ सकता हू...... लेकिन नरेगा में जो घोटाला चल रहा है झारखण्ड में उसे भी कोई राहुल बोलेगा तभी मीडिया कवर करने जायेगी.... प्रिंट में तो हिंदू अखबार को छोड़कर और कोई कवर करता नही है..... उसपर राहुल नही बोलेंगे.... अगर आप बोलते सुनेंगे तो बोलेंगे पी साईनाथ.... आप उन्हें सुनिए.... अफ़सोस कोई नही सुनता है......

dpkraj said...

वाजपेयी जी
आपने ब्लाग लिखना शुरू किया यह देखकर प्रसन्नता हुई। यहां आप वह लिख सकते हैं जो आपके मन में है। मैं आपका ब्लाग अपने ब्लागों पर लिंक करना चाहता हूं अगर आपकी अनुमति हो तो लिंक कर दूं। इससे मेरे ब्लाग के पाठक भी आपको पढ़ सकेंगे। वैसे इस पोस्ट में यह लिखा है सिस्टम से जनता अलग नहीं है इस बात से मैं सहमत हूं। एक बात तय है कि अब आम आदमी मीडिया पर अब यकीन नहीं करता। हिंदी ब्लाग जगत में अनेक ब्लाग लेखक इस बारे में लिखते रहे हैं और कुछ लोगों का मानना है कि ब्लाग विधा सभी प्रचार माध्यमों के लिये भविष्य में एक चुनौती साबित होगी। आपके लिये मेरी तरफ से शुभकामनायें।
दीपक भारतदीप

Gage said...

badhai ho sir!!!

Divya Prakash said...

बहुत अच्छा लगा सर , अभिव्यक्ति का ये कोना(ब्लॉग) भी अपने भर दिया |
उम्मीद करता हूँ भविष्य में ब्लॉग पे भी आपके तेवर देखने को मिलेंगे !!
सादर
दिव्य प्रकाश
SIBM,Pune

Nitish Raj said...

प्रसून जी, अच्छा लगा आपको पढ़कर। काफी दिनों बाद उस आधे घंटे के लाइव शब्दों को पढ़कर के सुनने का ऐहसास हुआ। माइक एक प्रतीक है, ये प्रतीक कलम भी हो सकती है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि माइक भ्रष्ट मीडिया की आवाज है। ये पहली नजर में बोलने का जरिया ही लगेगा, दिखेगा और रहेगा भी। लेकिन कलम भी एक अच्छा सुझाव है।

Anonymous said...

शुक्रिया प्रसूनजी। शुक्रिया। तमाम उत्तर पसंद आए।

बालकिशन said...

अपन तो आगे के इंतजार में हैं जी.
देंखे क्या-क्या होता है?

vipinkizindagi said...

सिस्टम से जनता तो अलग नही है लेकिन आज राजनीति सिर्फ़ सेटिंग की राजनीति रह गयी है, जिसकी जितनी अच्छी सेटिंग है वो उतनी ही रोटिया सेंक रहा है,
जनता को तो चुनाव में वोट के लिए याद करते है, राजनीति के स्तर को तो गिरना ही था, जॅहा लोग औछा बोलने और करने पर उतारू हो वहा राजनीति का स्तर तो गिरेगा ही,
बात राहुल की कलावती की नही है, हक़ीकत तो ये है की देश के हर राज्य और हर राज्य के ग्रामीण इलाक़ो में न जाने कितनी कालावतिया राहुल का इंतज़ार कर रही है,
पिछले कुछ सालो में मीडिया में आई क्रांति हमारी तरक्की का मिल का पत्थर है, और आप जैसै व्यक्तित्व ने इसे उचाईयो तक पहुचाया है,
आपके ब्लॉग को नियमित देखता रहूँगा.

Punya Prasun Bajpai said...

दीपक जी, आप नि:संकोच मेरे ब्‍लॉग का लिंक अपने ब्‍लॉग पर दें।

Ashok Pandey said...

आपका किसानों और गांवों की बातें करना आशा जगाता है।

Jitendra Chaudhary said...

आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा, उससे भी अच्छा लगा कि आप निर्भिकतापूर्वक कई विषयों पर बात करने के लिए उत्सुक है। यह ब्लॉग ही तो है, जिसमे हम एक दूसरे से रुबरु होकर बेबाकी से अपनी बात कह सकते है। हो सकता है किन्ही विषयों पर हमारे विचार मिले, अथवा ना मिले। लेकिन सार्थक बहस की सम्भावना तो बनती ही है।

रही बात पत्रकारों के ब्लॉगजगत मे आने की और उनसे अपेक्षाओं की। इस बारे मे मेरे विचार कुछ अलग है। ब्लॉग अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है, मीडिया की नौकरी मे तो सम्पादकों की कैंची चल सकती है, कुछ मजबूरियां हो सकती है। लेकिन अपने ब्लॉग मे आप स्वयं लेखक है और स्वयं सम्पादक, कोई मिडिलमैन नही, कोई प्रेशर नही। इसलिए निर्भीक होकर अपनी बात रखिए और एक सशक्त विधा को दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनाइए। आशा करता हूँ, आप हर रोज नए नए विषयों पर लिखते रहेंगे।

Madhaw said...

Prasoon Jee ko pranam... Apka blog pada... ye lekh bhee pada.. achcha laga.. kuchch din pahle dainik bhashkar me aapka ek editorial pada... sansad ke upar aapne jo likha hai... padhkar kafi jankariya mili...

lekin in sab ke beech mai aapko ye bhee kahunga.. ek lekh aapne s p singh ke naam par likha tha... pad kar kafi dukh hua...

aur maine isse apane blog par likha bhee.. jo dukh hua usse ukerane kee koshish kee hai... chahunga ki aap pade aur reaction de...


nadanpatrakar.blogspot.com

madhawtiwari.blogspot.com

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अच्छी चर्चा चल पड़ी है। अब आएगा आनन्द...। अहा!

Udan Tashtari said...

अपने पाठकों की प्रतिक्रियाओं का जबाब देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार. आप जैसे नामी लोगों से इस तरह की बात एक सीधा संपर्क स्थापित करवाती है और पाठकों का उत्साहवर्धन तो होता ही है.

माईक का लगा होना और उसका प्रतिकात्मक मायने बहुत भाया. सुन्दर!!

एक निवेदन: वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें, उसकी कोई उपयोगिता नहीं. अगर उल्टे सीधे अशिष्ट कमेंटों को रोकने का प्रयास है, तो मॉडरेशन बेहतर तरीका है. बस निवेदन मात्र है, आपका ब्लॉग है, जैसा आपको उचित प्रतीत हो.

अगर बुरा न मानें तो एक आपत्ति दर्ज करना चाहता हूँ: राहुल की कलावती -यह बात कुछ गले से उतरी नहीं बल्कि खटकी. वो भारत की कलावती है और हर गांव में है. राहुल ने तो सिर्फ जिक्र किया है और वो भी बिम्बात्मक ही था इसीलिये मिसेस कला से भी चला लिया गया.

मैने मात्र मुझे जैसा लगा, कहा. आप कृप्या अन्यथा न लें.

आपको और आपके इस नये ब्लॉग को अनेकों बधाई एवं शुभकामनाऐं. नियमितता बनाये रखें.

Udan Tashtari said...

वर्ड वेरीफेकशन हटाने का बहुत आभार. बाद में ध्यान गया.

Unknown said...

bajpai ji namskar.....mene apne comments me mike vali baat nahi likhi thi....lekin fir bhi achha laga ki aapne sare comments par dhyaan diya.....main aapki kalawati ka intjaar karunga,....................

Sanjeet Tripathi said...

अच्छा लगा यह देखकर कि आप ब्लॉग के पाठकों से संवाद कायम कर रहे हैं।
यह वाकई एक बढ़िया कदम है, नही तो अक्सर नामी-गिरामी शख्सियतें बस लिख देती हैं पाठकों के कमेंट्स पर ध्यान नही देती।
इंतजार रहेगा "राहुल की' कलावती और जालका गांव के हाल वाली रपट का।

दूसरी बात-- मैं चूंकि छत्तीसगढ़ से हूं इसलिए अक्सर अफसोस होता है कि हमारे न्यूज़ चैनल्स को भूत प्रेत नाग नागिन पर दिखाने के लिए बहुत कुछ है पर बस्तर जो नक्सल हिंसा की आग मे जल रहा है लोग मर रहे हैं। आए दिन बारूदी विस्फोट हो रहा उस पर बस एक पट्टी चला देते है। ऐसा क्यों?
कुछ करें हजूर बस्तर पर कुछ करें।

गिरीश बिल्लोरे मुकुल said...

पुन्य के प्रसून
पत्रकारिता के संग
अब ब्लागिंग का जुनून
सुना है ब्लागिंग ब्लॉगर'स को मिलेगा बल
खजाना भर देंगे न रहेगी मानसिक हल चल
देखतें हैं भैया क्या करेंगे कल
आज तो भेजे हैं जवाब
कल मेरी सलाह से जाएंगे गोया ब्लॉग-दर-ब्लॉग
सिर्फ़ सियासी पोस्ट...!
मत देना दोस्त...!!

Satyendra Tripathi said...

कुछ बोलने से पहले आप अपने दोनो हाथो को जोर से मलते है। जिसकी आवाज साफ टीवी पर सुनायी देती है। यहाँ यह सुनने को नही मिला।
:)

चैनल एक तरफा संवाद है पर ब्लागिंग दो तरफा। यहाँ आप पर तीखी फायरिंग होगी। इसलिये सम्भल कर आगे बढियेगा।

राजनीति से हटकर कुछ लिखेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा क्योकि इस पर तो सारा देश चर्चा करता है।


आपको टीवी पर देखकर लगता है कि आपकी दायी हथेली की मष्तिष्क रेखा ज्यादा ही झुकी है चन्द्र पर्वत की ओर। अपनी कल्पना शक्ति का भरपूर उपयोग करे। इससे आपको रात मे गहरी नीन्द आयेगी। अभी की तरह अनिद्रा की शिकायत नही रहेगी।

शुभकामनाए।

डा. अमर कुमार said...

.

प्रिय पुण्य प्रसून,
कल तो यहाँ से खिन्न होकर गया था, वज़हें कई थीं । आज इतनी देर रात गये ख़्याल आया, और बोझिल आँखों से भी दिख रहा है कि यहाँ स्वस्थ बहस की संभावनायें हैं । अनेक साधुवाद, कि तुमने साहस के साथ अपना पक्ष रखा और पलायन को भी उद्धत नहीं लगते ।
मुझे संदर्भित करते हुये तुमने जो कुछ भी लिखा है, अच्छा तो लग रहा है ..किंतु मेरे हिसाब से यह शब्दों का घाल-मेल भर ही है । ऎसा नहीं है कि मैंने तुमको उखाड़ने की ही ठानी हो, लेकिन..
" मेरा कहना है कि समाजिक पहलुओं को उठाते हुए उंगली तो राजनीति पर उठेगी ही, क्योंकि वो नीति निर्धारक है। इसलिए हम तो इससे बचेंगे नहीं। "
अपने इस वक्तव्य का मंतव्य का स्पष्ट कर सको, तो हम पंचों को भी एक दिशा मिलेगी । आश्चर्य है कि स्वतंत्रता के 6 दशक बाद और इतना रूसवा होने के बाद भी.." त्वमेव माता च पिता.." की तर्ज़ पर आप इनको समाज के भाग्यविधाता होने से विभूषित कर रहे हैं । तो, ज़ाहिर सी बात है कि ऎसा समाज अभागा ही कहलायेगा । एक किसिम की बलात्कारी नीतियाँ थोपने वालों को समाज के नीति निर्धारक साबित करने की कोशिश निराशा दे रही है ।
इन राजनीतिज्ञ कहे जाने वाले कैडर का शंख चक्र गदा आज मीडिया ही तो है, अपनी सुविधानुसार मीडिया ही उनको ताकतवर या कमजोर सिद्ध करने की मुहिम चलाता है ।
मीडिया जनता और जनता के मुद्दों के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है, ..आगे शब्द ही नहीं सूझ रहे हैं । समझो कि मीडिया जनता के मुद्दों के लिये शब्दहीन क्यों है..में से क्यों को माइनस करके बताओ तो ?
जनता का मुद्दा तो मीडिया के दाल मखनी सरीखी डिश के लिये बस तड़के का सामान बन कर रह गया है, जो अपने कवरेज़ का स्वाद बढ़ाने के लिये एक नपे अंदाज़ से प्रयोग किया जाता है ।
राजनीति न तो मेरा विषय है, न पेशा और न ही मुझे इसमें कोई दिलचस्पी ही है । जो मुझे दिखता है, वही अपनी सहज बुद्धि से कह रह हूँ ।

प्रवीण त्रिवेदी said...

बड़ा अच्छा लगा आप को देखकर !
पहले उसकी बधाई !
जंहा तक मैं समझता हूँ कि आप अपने ब्लॉग को परस्पर चर्चा व विचार विमर्श का जरिए बना रहे हैं /
अच्छा है पर जब यह लगातार चले /
रही बात मीडिया के भ्रस्त होने कि तो वह हर क्षेत्र कि तरह यह भी है / पर एक जिम्मेदारी होने का बोध ही ज्यादा चिंत्ता ग्रस्त करता है /
एक अध्यापक होने के नाते मैं चार चीजें
1 -शिक्षक
2-वकील
3-पत्रकार
4-छात्र और युवा
से ही आशा रखता हूँ कि वह ही सिस्टम को सही रख सकने में मदद कर सकते हैं /

प्रवीण त्रिवेदी
फतेहपुर (उत्तर-प्रदेश)
http://primarykamaster.blogspot.com/

Unknown said...

Prasoon Ji,

Thanks for beautiful start.

Blog is one of best way to share social thoughts, It does not required any big brand backing.

Keep moving.

उन्मुक्त said...

हिन्दी चिट्ठजगत में स्वागत है।

अजित वडनेरकर said...

प्रसून भाई
आपकी साफगोई
पसंद आई ।

लगा रहने दें माइक
अभिव्यक्ति का प्रतीक है
सही कहा
इस पर कोई बहस नहीं है
ब्लागिंग में कुछ तो
छेड़छाड़ चलती ही है
सो हमारी टिप्पणी में भी
हल्की-फुल्की सी थी।

असल में तो आपका स्वागत
ही था। एक बार फिर ...

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

भाई साहब, ब्लॉग की शुरुआत के पीछे मैं आपकी सदाशयता तो देख रहा हूँ। उम्मीद है की आप अपनी टीवी वाली हरकतें यहाँ नहीं दोहराएँगे। ब्लॉग अच्छा है।

Punya Prasun Bajpai said...

एक सज्जन ने अंग्रेजी में पोस्ट देखकर कमेंट किया है कि ये पीआर जैसी बात है। भइया, हम हिन्दी में सहज हैं लेकिन देश में सभी को तो हिन्दी नहीं आती। ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें और जरुरी विषयों पर बहस की गुंजाइश बनाए-इसलिए अंग्रेजी में भी पोस्ट ब्लॉग पर डाली गई है। वैसे,आने वाले दिन में हम कोशिश करेंगे कि एक-दो भाषाओं में और पोस्ट दिखायी दे।