Wednesday, August 27, 2008

आजादी के नारों से डर कौन रहा है ?

कश्मीर के इतिहास में 1953 के बाद पहला मौका आया, जब 25 अगस्त 2008 को कश्मीर में कोई अखबार नहीं निकला । घाटी में सेना की मौजूदगी का एहसास पहली बार पिछले दो दशक के दौरान मीडिया को भी हुआ । 1988 में बिगडे हालात कई बार बद-से-बदतर हुये लेकिन खबरो को रोकने का प्रयास सेना ने कभी नहीं किया। अब सवाल उठ रहे है कि क्या वाकई घाटी के हालात पहली बार इतने खस्ता हुए हैं कि आजादी का मतलब भारत से कश्मीर को अलग देखना या करना हो सकता है। जबकि आजादी का नारा घाटी में 1988 से लगातार लग रहा है । लेकिन कभी खतरा इतना नहीं गहराया कि मीडिया की मौजूदगी भी आजादी के नारे को बुलंदी दे दे । या फिर पहली बार घाटी पर नकेल कसने की स्थिति में दिल्ली है, जहां वह सेना के जरिए घाटी को आजादी का नारा लगाने का पाठ पढ़ा सकती है।

दरअसल, हालात को समझने के लिये अतीत के पन्नो को उलटना जरुरी होगा । क्योकि दो दशक के दौरान झेलम का पानी जितना बहा है, उससे ज्यादा मवाद झेलम के बहते पानी को रोकता भी रहा है । इस दौर के कुछ प्यादे मंत्री की चाल चलने लगे तो कुछ घोड़े की ढाई चाल चल कर शह-मात का खेल खेलने में माहिर हो गये । घाटी के लेकर पहली चाल 1987 के विधान सभा चुनाव के दौरान दिल्ली ने चली थी । बडगाम जिले की अमिरा-कडाल विधानसभा सीट पर मोहम्मद युसुफ शाह की जीत पक्की थी । लेकिन नेशनल कान्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला के लिये सत्ता का रास्ता साफ करने का समझौता दिल्ली में हुआ । कांग्रेस की सहमति बनी और बडगाम में पीर के नाम से पहचाने जाने वाले युसुफ शाह चुनाव हार गये । न सिर्फ चुनाव हारे बल्कि विरोध करने पर उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया । युसुफ शाह के चार पोलिंग एंजेट हामिद शेख, अशफाक मजिद,जावेद अहमद मीर और यासिन मलिक भी गिरफ्तार कर लिये गए । चारो पोलिग एजेंट 1987 में प्यादे की हैसियत रखते थे । लेकिन इस चुनाव परिणाम ने फारुख अब्दुल्ला के जरिए घाटी को दिल्ली के रास्ते चलने का जो मार्ग दिखाया, उसमें संसदीय लोकतंत्र के हाशिये पर जाना भी मौजूद था । जिससे कश्मीर में 1953 के बाद पहली बार आजादी का नारा गूंजा । कोट बिलावल की जेल से छूट कर मोहम्मद युसुफ शाह जब बडगाम में अपने गांव सोमवग पहुंचे तो हाथ में बंदूक लिये थे । और चुनाव में हार के बाद जो पहला भाषण दिया उसमें आजादी के नारे की खुली गूंज थी । युसुफ शाह ने कहा,
" हम शांतिपूर्ण तरीके से विधानसभा में जाना चाहते थे । लेकिन सरकार ने हमें इसकी इजाजत नहीं दी । चुनाव चुरा लिया गया । हमे गिरफ्तार किया गया , और हमारी आवाज दबाने के लिये हमें प्रताड़ित किया गया । हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नही है कि हम हथियार उठाये और कश्मीर के मुद्दे उभारे ।"
उसके बाद युसुफ शाह ने नारा लगाया, " हमें क्या चाहिये--आजादी । गांव वालों ने दोहराया -आजादी " बड़गाम के सरकारी हाई सेकेन्डरी स्कूल से पढाई करने के बाद डॉक्टर बनने की ख्वाईश पाले युसुफ शाह को मेडिकल कालेज में तो एडमिशन नहीं मिला लेकिन राजनीति शास्त्र पढ़ कर राजनीति करने निकले युसुफ शाह के नाम की यहां मौत हुई और आजादी की फितरत में 5 नवंबर 1990 को युसुफ शाह की जगह सैयद सलाउद्दीन का जन्म हुआ । जो सीमा पार कर मुज्जफराबाद पहुंचा और हिजबुल मुजाहिद्दीन बनाकर आंतकवादी हिंसा को अंजाम देते देते पाकिस्तान के तेरह आंतकवादी संगठन के जेहाद काउंसिल का मुखिया बन गया।

दो दशक बाद जब आजादी के नारे घाटी में गूंजते हुये दिल्ली को ललकार रहे हैं, तो सैयद सलाउद्दीन ने भी जेहादियो से कश्मीर में हिंसा के बदले सिर्फ आजादी के नारे लगाने का निर्देश दिया है ।

लेकिन आजादी के नारे को सबसे ज्यादा मुखरता 1989 में मिली । यहां भी दिल्ली की चाल कश्मीर के लिये ना सिर्फ उल्टी पडी बल्कि आजादी को बुलंदी देने में राजनीतिक चौसर के पांसे ही सहायक हो गये । इतना ही नहीं राजनीति 180 डिग्री में कैसे घुमती है, यह दो दशक में खुलकर नजर भी आ गया । 8 दिसंबर 1989 को देश के तत्कालिन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का अपहरण हुआ । रुबिया का अपहरण करने वालो उसी युसुफ शाह के पोलिंग एंजेट थे, जिनकी पहचान घाटी में प्यादे सरीखे ही थी । मेडिकल की छात्रा रुबिया का अपहरण सड़क चलते हुआ । यानी उस वक्त तक किसी कश्मीरी ने नहीं सोचा था कि कि किसी लड़की का अपहरण घाटी में कोई कर भी सकता है । अगर उस वक्त के एनएसजी यानी नेशनल सिक्युरटी गार्ड के डायरेक्टर जनरल वेद मारवाह की माने तो रुबिया के अपहरण के खिलाफ घाटी की मानसिकता थी । आम कश्मीरी इस बात को पचा नहीं पा रहा था कि रुबिया का अपहरण राजनीतिक सौदेबाजी की लिये करना चाहिये । लेकिन दिल्ली की राजनीतिक चौसर का मिजाज कुछ था । दिल्ली के अकबर रोड स्थित गृहमंत्री के घर पर पहली बैठक में उस समय के वाणिज्य मंत्री अरुण नेहरु , कैबिनेट सचिव टी एन शेषन, इंटिलिजेन्स ब्यूरो के डायरेक्टर एम के नारायणन और एनएसजी के डायरेक्टर जनरल वेद मारवाह मौजूद थे । जिसके बाद बीएमएफ के विशेष विमान से वेद मारवाह को श्रीनगर भेजा गया । 13 जिसंबर को केन्द्र के दो मंत्री इंन्द्र कुमार गुजराल और आरिफ मोहम्मद खान भी श्रीनगर पहुचे । अपहरण करने वालो की मांग पांच आंतकवादियो की रिहायी की थी । जिसमें हामिद शेख,मोहम्मद अल्ताफ बट,शेर खान, जावेद अहमद जरगर और मोहम्मद कलवल थे । अगर एनएसजी के डायरेक्टर जनरल वेद मारवाह की मानें तो अपहरण से रिहायी तक के हफ्ते भर के दौर में कभी दिल्ली की राजनीति को नहीं लगा कि मामला लंबा खिचने पर भी अपहरणकरने वालो के खिलाफ धाटी में वातावरण बन सकता है । खुफिया तौर पर कभी उसके संकेत नहीं दिये गये कि रुबिया का कहां रखा गया होगा, इसकी जानकारी जुटायी जा रही है या फिर कौन कौन से लोग अपहरण के पीछे है, कभी खुफिया व्यूरो को क्लू नहीं मिला।

महत्वपूर्ण है कि उस वक्त के आई बी के मुखिया ही अभी देश के सुरक्षा सलाहकार है । और उस वक्त समूची राजनीति इस सौदे को पटाने में धोखा ना खाने पर ही मशक्कत कर रही थी । चूंकि अपहरण करने वालो ने सौदेबाजी के कई माध्यम खोल दिये थे इसलिये मुफ्ती सईद से लेकर एम के नारायणन तक उसी माथापच्ची में जुटे थे कि अपहरणकर्ताओ और सरकार के बीच बात करने वाला कौन सा शख्स सही है । पत्रकार जफर मिराज या जाक्टर ए ए गुरु या फिर मस्लिम युनाइटेड फ्रंट के मौलवी अब्बास अंसारी या अब्दुल गनी लोन की बेटी शबनम लोन । और दिल्ली की राजनीति ने जब पुख्ता भरोसा हो गया कि बाचचीत पटरी पर है तो पांचों आंतकवादियो को छोड दिया गया । और रुबिया की रिहायी होते ही सभी अधिकारी-- मंत्री एक दूसरे को बधाई देने लगे । लेकिन रिहायी की शाम लाल चौक पर कश्मीरियो का हुजुम जिस तरह उमडा उसने दिल्ली के होश फाख्ता कर दिये क्योकि जमा लोग आंतकवादियो की रिहायी पर जश्न मना रहे थे और आजादी का नारा लगा रहे थे ।

वेद मारवाह ने अपनी किताब "अनसिविल वार" में उस माहौल का जिक्र किया है जो उन्होने कश्मीर में रुबिया और आंतकवादियो की रिहायी की रात देखा । "शाम सात बजे रिहायी हुई । मंत्री विशेष विमान से दिल्ली लौट आये । कश्मीर की सड़को लोगो का ऐसा सैलाब था कि लगा समूचा कश्मीर उतर आया । जश्न पूरे शबाब पर था । सडको पर पटाखे छोडे जा रहे थे । युवा लडकों के झुंड गाडियों को रोक कर अपने जश्न का खुला इजहार कर रहे थे । मंत्रियो को छोचने जा रही सरकारी गांडियो को भी रोका गया । सरकारी गेस्ट हाउस में जश्न मनाया जा रहा था । वर्दी में जम्मू-कश्मीर पुलिस के कई पुलिसकर्मी भी जश्न में शामिल थे । आंतकवादियो के शहर को अपने कब्जे में ले रखा था, इससे छटांक भर भी इंकार नहीं किया जा सकता । क्योंकि सभी यह महसूस कर रहे थे कि उन्होने दिल्ली को अपने घुटनों पर झुका दिया । और इन सब के बीच आजादी के नारे देर रात तक लगते रहे । "

दरअसल, दिल्ली की राजनीति यही नही थमी । सबसे पहले खुफिया ब्युरो को अपहरण कांड में असफल साबित हुई थी उसके ज्वाइंट डायरेक्टर जो एन सक्सेना को जम्मू कश्मीर पुलिस का डायरेक्टर जनरल बना दिया गया । राज्य के पुलिसकर्मियों को कुछ समझ नही आया। उनमे आक्रोष था लेकिन दिल्ली की राजनीति उफान पर थी । कानून व्यवस्था हाथ से निकली । 20 दिसबंर 1989 को रेजिडेन्सी रोड जैसी सुरक्षित जगह पर यूनियन बैक आफ इंडिया लूट लिया गया । 21 दिसंबर को इलाहबाद बैक के सुरक्षाकर्मी की हत्या कर दी गयी । 20 से 25 दिसबंर के बीच श्रीनगर समेत छह जगहो पर पुलिस को आंतकवादियों ने निशाना बनाया । दर्जनों मारे गये। इससे ज्यादा घायल हुये । जनवरी के पहले हफ्ते में कृष्म गोपाल समेत आई बी के दो अधिकारियो की भी हत्या कर दी गयी । इस पूरे दौर पर दिल्ली गृह मंत्रालय की रिपोर्ट मानती है कि डीजीपी समेत कोई वरिश्ठ अधिकारी श्रीनगर में हालात पर काबू पाने के लिये नहीं था। सभी जम्मू में थे । राजनीति यहां भी नही थमी । फारुख अब्दुल्ला ने जिन अधिकारियो की मांग की, उसे दिल्ली ने भेजना सही नहीं समझा । यहा तक की जनवरी में दिल्ली ने मान लिया की फारुख कुछ नही कर सकते । राज्यपाल जगमोहन को बनाया गया । और 18 जनवरी1990 को फारुख ने इस्तीफा दे दिया । घाटी में फिर आजादी के नारे लगने लगे । लेकिन इसके बाद जगमोहन और श्रीनगर जब आमने सामने आये तो आजादी का नारा इतना हिंसक हो चुका था कि समूची घाटी इसकी चपेट में आ गयी । कश्मीर में दंगो के बीच कत्लेआम और कश्मीरी पंडितो के सबकुछ छोड कर भागने की स्थिति को दिल्ली ने भी देखा । लेकिन कश्मीर की हिंसा को और आजादी के नारे की गूंज दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में खो गयी ।

1991-1996 तक कांग्रेस के पीवी नरसिंह राव की सरकार में कश्मीर में आजादी का नारा बुलंद होता गया । सेना की गोलिया चलती रही मरते कश्मीरियों की तादाद पचास हजार तक पार कर गयी । दुनिया के किसी प्रांत से ज्यादा सेना की मौजूदगी के बावजूद सीमापार का आंतक आजादी के नारे में उभान भरता गया । लेकिन ना आजादी के नारे पर नकेल कसने की पहल दिल्ली ने की ना ही इस दौर में जम्मू में पंडितो के बहते आंसू रोकने की ।

पहले अधिकारियो का उलट-फेर । फिर राज्यपाल का खेल । और अब चुनावी गणित साधने की कोशिश के बीच आजादी का नारा अगर एकबार फिर उफान पर है और दिल्ली की राजनीति पहली बार आजादी की गभीरता को समझ रही है तो मीडिया पर नकेल कसने के बजाय उसे अपनी नीयत साफ करनी होगी । कश्मीर देश का अभिन्न अंग है और अन्य राज्यों की तरह ही इसे भी सुविधा-असुविधा भोगनी होगी, यह कहने से दिल्ली अब भी घबरा रही है । कहीं इस घबराहट में नेहरु गलत थे और श्यामाप्रसाद मुखर्जी सही थे का विवाद जन्म देकर आजादी का नारा कहीं ज्यादा हिसंक बनाने की नयी राजनीतिक तैयारी तो नहीं की जा रही है? सवाल है कश्मीर को लेकर हमेशा इतिहास के आसरे समाधान खोजने की खोशिश हो रही है जबकि घाटी में नयी पीढी जो आजादी का नारा लगा रही है, वह शेख अब्दुल्ला को नही उमर अब्दुल्ला को पहचानती है । नेहरु की जगह उनके सामने राहुल गांधी है । लेकिन इसी दौर में समाज बांटने की राजनीति का खेल जो समूचे देश में खेला जा रहा है वह भी जम्मू-कश्मीर देख रहा है । इसलिये पहली बार आजादी का सवाल सुधार से आगे निकल कर विकल्प का सवाल खडा कर रहा जिससे दिल्ली का घबराना वाजिब है ।

20 comments:

Pak said...

You see this as a failure of the Indian democratic system and the government.

I see this as a victory of separatists, religious extremists, and pakistan's efforts.

You're introspecting cause you've got your sights fixed near home.

I am seeing the broader view cause I can see the external factors that are present.

Don't blame home for everything, sometimes things go rotten when left to themselves.

pak hindustani

अनुराग said...

शायद आपको भी अंदाजा नही होगा की जिस वक़्त आप अपनी पोस्ट प्रकाशित करेगे जम्मू में ४ छोटे बच्चे ओर ३ औरते ओर एक आदमी आतंकवादियों के कब्जे में होगे ?वे छोटे बच्चे इस वक़्त किस मनोस्थिति से गुजर रहे होगे अंदाजा लगना मुश्किल है ....आपके मुताबिक १९८७ का वो चुनाव इस पुरी प्रष्टभूमि के पीछे है....मानिये की युसुफ शाह उस वक़्त चुनाव जीत जाते तो क्या ये हालात नही होते ?दरअसल अगर हर आदमी अपने साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ बन्दूक लेकर इस तरह आज़ादी की मांग करने लगे तो अब तक हिन्दुस्तान कई टुकडो में बता होता ...दरअसल सवाल नीयत में खोट का है ?अभी भी जो हालात वहां बिगडे है ...जब शुरूआती दौर में थे तब सरकार अपनी गद्दी बचाने की कवायद में थी.....दरअसल किसी राजनैतिक पार्टी में न वो नैतिक साहस है जो उस वक़्त सरपर पटेल जैसे लोगो के पास था ओर न निर्णय लेने की हिम्मत ...वहां के अर्ध्सनिक बालो का मनोबल ये राजनैतिक पार्टिया ओर तोड़ देती है ?अजीब बात है की इस देश की संसद पर हमले करने वाले को फांसी देने में सरकार हिचकिचाती है ?क्या किसी ने अमेरिका कानून के पन्नो को कभी पलटा है ?९/११ के बाद वे ओर कड़े हुए है ?यहाँ आंतक-विरोधी कानून बनने में सब एकमत नही हो पाते ?क्यों ? कुछ दिन पहले एक पुलिस प्रमुख बात कर रहे थे की एक चैनल पर की किस तरह जब वो किसी आंतकवादी से मिलते लिंक पर काम करते चलते है तो एक जगह आकर राजनैतिक पार्टियों का दबाव पड़ता है की फलां आदमी को मत परेशां करो ...फल जगह मत घुसो ?वे लिंक मिस हो जाता है ..वो चैन टूट जाती है ..जाहिर है लोग शोर मचाने लगते है .की हमें परेशान किया जा रहा है .....लेकिन ये तो हर धर्म ओर हर अपराधी के साथ होता है ?क्यों हम राजनैतिक रूप से साहसी नही हो सकते ?क्यों हमारे देश में हर बात को धर्म से जोड़ दिया जाता है ?क्यों हमारा मीडिया उन परिवारों ....सेना के उन शहीदों के परिवारों पर कवर स्टोरी नही करता .जो इस तरह के राजनैतिक खेलो के शिकार हुए है ?अभी कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में पूर्व मुख्यमंत्री इस सवाल का कभी सीधा जवाब नही दे पायी की क्या आप कश्मीर को बहरत का हिस्सा मानती है ?कभी किसी कश्मीरी ने ये नही कहा की उसकी इस कश्मीरियत में कश्मीरी पंडित भी शामिल है ....हमें अब कोरे लफ्फाजी से बाहर आना होगा ओर कुछ सच कबूलने हो
आख़िर में एक सवाल की मान लो इन्हे कश्मीर दे दिया .....फ़िर ?

फ़िरदौस ख़ान said...

आपका आलेख सोचने पर मजबूर करता है कि कश्मीर के आज जो हालात हैं आख़िर उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है...? आज के दौर में आप जैसे बेबाक पत्रकारों की बेहद ज़रूरत है, जो मामले को किसी 'विशेष संगठन' या 'पार्टी' के चश्मे से नहीं देखते और सच को क़ुबूल करने और लिखने की हिम्मत भी रखते हैं ...बेहतरीन आलेख के लिए बधाई...

Sanjeet Tripathi said...

बंधुवर, क्या आपको नही लगता कि हम, हमारा मीडिया या एक भारतीय मानसिकता किसी "समस्या" का हल ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण करने में ही सारा जोर लगा देते हैं कि आखिर गलती किसकी थी।

नतीजा, समस्या जस की तस रहती है बल्कि उसमें और भी कई पेंच, विवाद सामने आने लगते है।

ग़ुस्ताख़ said...

पुण्य जी एक पत्रकार के तौर पर आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं, लेकिन कश्मीर के मामले में इस आलेख के केंद्र में जो बात निकल कर सामने आई है उससे मैं सहमत नही हो पा रहा हूं। कश्मीर के मुंददे हमेशा घाटी तय क्यों कर रहा है? क्या जम्मू के लोगों का कोई अधिकार है? या फिर वे हिंदू होने का दंड भुगत रहे हैं। नहीं इसे सांप्रदायिक प्रतिक्रिया नहीं मानें, सारा भारत जिस, चावल को २५ रुपये किलो खरीद रहा है वह घाटी में ७ रुपये किलो क्यों हैं? और ये लोग किसी भी समस्या का मजहबीकरण क्यों कर देते हैं? क्या इस विषय पर आप कोई लेख लिखेंगे?
सादर

pravin said...

nation-state ki ye vidanbana hoti hai ... hamesha se|

naina said...

प्रसून जी आपके और लालू जी के बीच में अब कैसे सम्बन्ध है ?आजकल क्या जी में हैं ?सहारा समय का क्या हुआ ?

dhiru singh said...

kashmeer ke haalat ka nanga sach aap ke dwara padne ko mila.par 1987 se nahi 1947 se iska jiker jarrori hai .nehru ka abdulla prem ho ya abdulla ka super banna iskee bajah 370 he hai.hum kahne se darte hai kyonki yah kahne par samprdaiyk ho jainge.b.j.p. bhi sarkaar banane ke liye ise bhool jaati hai.china tibat par kabja karke wahan par apne logo ko basa kar tibattiyon no minorty main laa dati hai,aur hamari sarkaar kashmeer se bhartiyo ka he playan kara datee hai.kashmeer bhartiyion ka hai.iske liya jo bhi bhasha kashmeer ke log samjte hai usse samjaiy.abhi jammu jaga hai bharat ko bhi jagna hoga.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सत्ता की दलाली ने देश का कबाड़ा कर दिया। ये नेता सबसे बड़े देशद्रोही हैं लेकिन मजबूरी ये है कि इनके बिना लोकतंत्र की गाड़ी चलेगी कैसे?


कश्मीरी अलगाव वादी खुदमुख्तारी कि बात करते है, वो भी पाकिस्तान के साथ रहकर जहाँ केवल तानाशाही फल-फूल रही है। इन मूर्खों को कौन समझाए? हमारे गृहमन्त्री और प्रधानमन्त्री तो कायरता से मैडम का मुँह ताकते रहते हैं।

मैडम को इस देश की अस्मिता से कुछ लेना-देना नहीं है। उनका खून हिन्दुस्तान के लिए क्यों खौलने लगा, जो सच्ची हिन्दूस्तानी है ही नहीं...?

धीरज चौरसिया said...

बेशर्म और असक्षम राजनेता और उनके साथ असहाय और विचारहीन देशवासी.....बस और कुछ नही.

aamir said...

sir ji.. j&k par aap ka article kaafi achha hai.. aapne wahan k badalte hue rajnitic halaat ko bahut baariki aur khoobsorti se bayan kiya hai.. sab theek hai.. lakin aapne ne ye nahi bataya ki aakhir j&k ki samasya ka samadhaan kya ho sakta hai?? use desh se alag kar dena chahiye ya jo chal raha hai use waise hi chalne dena chahiye.. kyonki delhi se kuch bhi ummeed karana bekaar hai.. agar delhi chahta to iss samasya ka samadhaan kab k ho chuka hota.. shayad yahi wajah hai ki ek baar MAQBOOL BATT ki phansi phir se AFZAL GURU naam ka phanda ban kar delhi k gale me latki hui hai...

vipin said...

प्रसूनजी,
जम्मू-कश्मीर से जुड़ी इन बारिकियों को हमारे बीच रखने के लिये धन्यवाद..अतीत में झांकने पर सिर्फ युसूफ शाह के सलाउद्दीन बनने का फसाना नहीं है..दरअसल आजादी के बाद जिस तरह से जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बना..वो परिस्थितियां साठ साल के बाद भी खास नहीं बदली..हैं..सियासत देश को दिशा और लोकतंत्र तरीके से चलाने का जरिया होती है..लेकिन कश्मीर में सियासत सिर्फ करोड़ों रूपये के फ्री लोन को डकारने..बाहरवालों को यहां नहीं आने देने और विशेष अधिकारियों की चादर ओढे रहने के लिये होती रही है..चाहे वो कांग्रेस हो बीजेपी ,फारूफ अब्दुल्ला और उनके होनहार बेटे हों ,या मुफ्ती साहब और उनकी साहबजादी..सबका एक ही मकसद रहा है..अपना घर बचा रहा हैं..उसमें फूल खिलते रहें..काजू और सेव खाते रहें..बगलवाले घर में आग लगी है तो लगती रहे...अगर बात जमीन की जंग या अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जाये तो..पहली बार ऐसा हुआ है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों अपनी कामयाबी नहीं.बल्कि अलगावादियों की हार को अपने नाम करने की कोशिश कर रही हैं..यासिन मलिक और सईद शाह गिलानी जैसे लोग पिछले पांच सालों में पचास लोगों की भीड़ नहीं जुटा पा रहे थे..इनकी सियासी दुकान बंद होने की कगार पर थी..दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी बहुत अच्छा काम कर रही थी..दो दशक तक राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले साफ छवि वाले धर्मनिरपेक्ष नीयत वाले गुलाम नबी आजाद के हाथ में सूबे की कमान थी..मुफ्ती साहब ने भी भले ही दो चार बार आजादी या एटोनोमी जैसे शब्द बोलों वो बतौर सीएम उनका काम भी ठीक रहा था..लेकिन जब सब कुछ ठीक चल रहा था..कश्मीर की कस्ती को उसके खवइयों ने गहरे नहीं ठहरे हुए पानी में डुबो दिया..अलगाववादी लोगों को बैठ बैठाय भीड़ दे दी..आजादी का लोलीपॉप दे दिया.जिस बाबा ब्रर्फानी की गुफा की रखवाली मुसलमान करते हैं..उनके कंधों पर बूढे हिदू साथियों को दर्शन करवाते हैं..उन्हें जमीन के मुददे पर सियासत के पाखंडियों ने भड़का दिया..जम्मू और कश्मीर के बीच मोहब्बत की सड़क पर जाम लगवा दिया...अरे भाई अमन-चैन और धर्मनिरपेक्ष राज्य को हमारे करीब आने दो..हमें उनके करीब जाने दो..दिमाग ना लगाओ..दिल से मामला सुलझ जाएगा.दिल से बात करो.दिल तक बात पहुंचेगी
विपिन देव त्यागी

swapnila said...

Loktantra ka arth ye nahi ki manmani ki jay....yadi shakti ki jati hai to ye jayaj hai....kuch halat hote hai jab aajadi ko bhi janajir pahnai jati hai ...usme aascharya jaisa kuch nahi hai basarte ki jis makasad ke liye lagam lagaai ja rahi hai wo apni jagah ho jay....kahte hai n....Dubiye magar itna ki usase bahar aaya ja sake...Media apni had nahi jaanti...ya yoo kahe des ki fikra use hai nahi...sirf itana kahana ki chinta hai aur pralap aalpna....kaha tak uchit hai? Government itani bhi murkh nahi hai.... bivasta hi hai ki is tarah se media ko niyantrit kiaa ja raha hai...aur media ko bhi samjhna chaiye. kam se kam is mudde par to competition chor des ka soche....

swapnila said...

Prasun Ji! Muskil hai ...bahut muskil....sawal to kiaa hi ...mumkin hai ki samadhan bhi dhudha jay? Loktarntra se aap wakif hai aur kya kaha jay.....?

anil yadav said...

muslim leeg join karne par hardik badhai....aur turant parwakta bhi ban gaye....kamal hai....

pankaj srivastava said...

प्रसून जी, इन प्रतिक्रियाओं से समझ में आ ही गया होगा कि आजादी के नारों से कौन डर रहा है। दरअसल समस्या ये है कि इस बौने समय में ज्यादातर लोग दोहरे चरित्र वाले हैं। वे खुद पर जरा भी अंकुश नहीं चाहते, लेकिन दूसरे आजादी का ख्याल भी मन में लाएं,ये बर्दाश्त नहीं होता।
मैं नहीं कहता कि कश्मीर को भारत संघ से अलग होना कोई हल है, लेकिन अगर सचमुच किसी क्षेत्र विशेष के सभी लोग आजादी चाहते हों, तो फौज कब तक रोक पाएगी। जिन्हें कश्मीर से उठते आजादी के नारों से तकलीफ होती है, उन्हें कश्मीरियों की तकलीफ से खुद को जोड़ना होगा। ये सोचना होगा कि हिंदी पट्टी के सुरक्षित खोहों में बैठकर हमें कश्मीर या उत्तर पूर्व का ख्याल तभी क्यों आता है जब वहां बंदूकें गरजती हैं। आम दिनों में वहां की जनता का क्या हाल है, क्या हम जानना चाहते हैं। आपने बस एक सच सामने रखा और लोग भड़क गए, पर भाई, भारत की वर्तमान सीमाएं अंग्रेजों की खींची हुई हैं। इतिहास में कोई शासकवंश नहीं हुआ जिसने एक साथ इतने बड़े भूभाग पर शासन किया हो...कुछ दिन तलवार के जोर पर झंडा फहरा दिया हो, तो और बात है। इसलिए आजादी के बाद मिले भूखंड में नई राष्ट्रीय चेतना भरना सबसे बड़ी चुनौती थी। ये तभी हो सकता था जब उन मूल्यों का आदर होता जो आजादी के आंदोलन के दौरान विकसित हुए थे, मसलन सच्ची धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय वगैरह, लेकिन इन सपनों के साथ छल हुआ जिसका नतीजा सामने है। अगर केंद्र में बैठे लोग किसी प्रांत को उपनिवेश मानेंगे, तो आजादी के नारे उठेंगे ही। और हां....तमाम घोषणाओं के बावजूद इतिहास का अंत होता दिखता नहीं, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....

पंकज श्रीवास्तव

anil yadav said...

पीपी भाई.
देर से ही सही शुभकामनाएं।
आना-जाना लगा रहेगा.

कुमार आलोक said...

यूसुफ तारागामी सीपीएम के जम्मू एंड काशिमर में पार्टी के सदर है । दिल्ली के गोपालन भवन आये तो ऐसा लगा कोइ वीवीआपी आ गया ..कडी सिक्यूरीटी के तामझाम के बीच जब वो अंदर दाखिल हुए तो मालूम हुआ ये तारागामी है ...साथ में उनके जो प्रवक्ता थे उनसे मैने पूछा कि आखिर इस नये बबाल के पिछे कौन से तथ्य काम कर रहे है ...हालांकि आज कांग्रेस और सीपीएम के ताल्लुकात अच्छे नही है.. फिर भी उसने कहा कि कांग्रेस की सरकार वहां बहुत बढिया काम कर रही थी ...विकास के कार्यों में भी गुलाम नबी आजाद की सरकार अच्छा काम कर रही थी ..लेकिन कांग्रेस की वही पुरानी आदत बर्र के छत पर हाथ लगाने की ..और वही किया गया और बैठे बिठाये अलगाववादियों को फिर वही पुराना मुद्दा थमा दिया गया ।
आप ने सही फरमाया है कि नेहरु की कश्मिर नीति सही थी या श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ...जम्मू में कांग्रेस ने बैठे बिठाये एक बडा स्पेस गिफ्ट में दे दिया है जहां उसका बजूद तक नही था ...तो चलिये जम्मू को अलग राज्य बनाइये और काश्मिर वैसे भी आपके नियंत्रण से बाहर है ।

vimarsh said...

प्रसून जी कश्मीर का दर्द सभी को मालूम है पर कोई समाधान नही करना चाहता. आख़िर कब तक उन्हें जलालत झेलनी पड़ेगी? मैंने बलराज मधोक जी से इस मुदे पर बात की तो उनका जवाब था की राज्य का पुनर्गठन करना ही होगा. कर्ण सिंह कहते हैं की वोहरा को हटाओ और श्रायण बोर्ड को आस्थाई ज़मीं दे दी जाए.बीजेपी और कांग्रेस खामोशी से सब कुछ देख रही है. जब कोई सकारात्मक पहल न हो तो शयद इसे खामोशी से देखना ही कहेंगे. जम्मू और कश्मीर के स्थान्ये राजनितिक दल अपनी ढपली अपनी राग अलाप रहे हैं. ऐसे में आम जनता आग में झुलसने को मजबूर हैं. कौन दोसी है इस पुरे कोहराम के पीछे. वक्त इस बात की तफतीस करने की नही है. किसका क्या रोल होना चाहिए. जरुरत है इस बात को समझने की.पुलिस, मीडिया, सेना, राजनेता, आमदमी सभी अपनी जिम्मेदारी समझे तो बात एक मिनट में बन जाए लेकिन शयद यह जन्नत में ही सम्भव है. इस जन्नत में नही तो ऊपर के जन्नत में तो जरुर समझ आ जायेगी लेकिन तब तक सब समाप्त हो जाएगा.

Mrs Jennifer said...

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