Sunday, August 31, 2008

कश्मीर को सांप्रदायिकता की आग में मत झोंको

बंधु, मामला कश्मीर का हो और आप इस या उस पार खड़े न हो, तो आपकी पहचान क्या है ? आजादी के बाद इकसठ साल में बतौर देश के नागरिक यह तमगा सीने पर कोई भी ठोंक सकता है। क्योंकि जैसे ही आप कश्मीर के मुश्किलात के साथ खडे होंगे आपको मुस्लिम लीग का ठहरा दिया जायेगा या आंतकवादियों का हिमायती या अलगाववादियों की कतार में खड़ा कर दिया जायेगा । और अगर आप कश्मीरियों का विरोध करेंगे, कश्मीरियों की आजादी के शब्द को पाकिस्तान से जोड़ेंगे तो देशभक्ति का राग आपके अंदर बजने लगेगा। जम्मू के लोग अपने आंसुओं में आपकी संवेदनाओं को देखेंगे।

अब सवाल है कि उन लोगो का क्या होगा जो सिर्फ कश्मीर को लेकर भारत सरकार के नजरिए को समझना चाहते है। ऐसा भी नहीं है कि देश के किसी राजनीतिक दल को केन्द्र में सत्ता का स्वाद चखने का मौका न मिला हो। संयोग से सभी राजनीतिक दलो ने गठबंधन के आसरे उन्हीं दो दशको में केन्द्र की सत्ता देखी है, जिस दौर मे कश्मीर में आजादी का राग तेज हुआ । यह राग जिन राजनीतिक दलो को पंसद है उन्होंने केन्द्र की सत्ता में रहते हुये कश्मीरियों के मुद्दे को सुन कर सुलझाया क्यो नहीं । आजादी शब्द में जिन राजनीतिक दलो को देशद्रोह की बू आती है तो ऐसे राजनीतिक दलो ने केन्द्र की सत्ता में रहते हुये इसका ऑपरेशन क्यों नहीं कर दिया जिसकी वकालत अब की जा रही है।

आप कहेगें राजनीतिक दलो ने तो बंटाधार किया ही है,इसका समाधान है क्या । मुझे लगता है यह समझना होगा कि जब राज्य मीडिया पर रोक लगाने की स्थिति में आ जाये और विरोध के स्वर दबा कर खुद जोर से बोलकर उसे सच बताने की जुर्रत करने लगे तब देश में लोकतंत्र हाशिये पर ढकेला जाने लगा है, यह तो मानना ही होगा । मुझे तो लगता है कि कश्मीर पर कुछ कहने से पहले देश के नागरिको को कश्मीर जाना भी चाहिए। यहां आप यह सोच कर नाराज न होइए कि पंडितो की हालत देखने के लिये जम्मू जाने की बात क्यों नहीं की जा रही है। यकीनन पंडितों की हालत बद् से बदतर है । खासकर अगर उनके राहत शिविरों में कोई भी चला जाये तो न्यूनतम जरुरतों से कैसे हर वक्त उन लोगो को दो- चार होना पड़ता है जिनके ठाठ 1987 से पहले धाटी में रहते हुये थे, देखकर अपनी आंखे शर्म से झुक जायेगी।

लेकिन घाटी में जब हर क्षण आप सेना की बंदूक के निशाने पर हों और शाम ढलते ही सडक पर वर्दी में कोई भी आपको बोले "जनाब रुक जाईये और आपकी जान पर बन आये।" उस पर आप मुस्लिम हो तो आपके कपड़ों के अंदर जिस्म टटोलकर सेना सुकून पाये तो आप क्या कहेगे। अगर गाडी का नंबर दिल्ली या किसी दूसरे राज्य का है तब तो ठीक और अगर कश्मीर का है तो हर शाम ढलते ही आप सफर करके देख लीजिए। आप कश्मीर में आजादी के नारे को छोडिये..यह बताइये कि देश में कही भी अगर ऐसे हालात हैं तो आजादी होनी चाहिये इसकी मांग कोई करेगा या नहीं।

आप कह सकते है, यह व्याख्या तो सीमापार से की जाती है । लेकिन मेरा मानना है कि कश्मीर भारत का अंखड हिस्सा है इससे इंकार जब कोई नहीं कर रहा तो सीमा पार के उकसावे में हम क्यों फंस जाते हैं । उसकी भाषा तो छोडिये वहां का राजनीतिक तानाशाही मिजाज, सामाजिक टकराव, आर्थिक दिवालियापन, क्या इससे कश्मीरी वाकिफ नहीं है ।

मुझे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में भी जाने का मौका मिला है । मेरे साथ कश्मीर के रिपोर्टर अशरफ भी थे। यकीन किजिये जब उन्हे यह पता चला कि अशरफ कश्मीर से हैं तो पीओके के अधिकतर परिवार वाले यही जानना चाहते थे कि अशरफ ने शादी की है या नहीं । या फिर किसी तरह उनकी लड़की से निकाह करके पीओके से लडकी हिन्दुस्तान ले जाये ताकि लडकी की जिन्दगी बन जाये । पीओके के कश्मीरियों का बस चले तो वह एलओसी पार कर इसपार आ जाये । कश्मीर जिस तरह जन्नत है, वही पीओके में जंगल-पहाड़ नंगे हो चुके है । पेड़-दर-पेड़ काटने की रफ्तार कितनी तेज है, इसका अंदाजा पीओके से इस्लामाबाद आते ट्रकों की आवाजाही से समझा जा सकता है, जिसमें हर तीसरे ट्रक पर शहतीर यानी कटे हुये पेड़ होते है । पीओके में रहने वालो का मानना है कि पाकिस्तान को तो डर लगता है कि कभी पोओके भी उनके हाथ से ना निकल जाये इसलिये पीओके की समूची खनिज संपदा को ही पाकिस्तान खंगाल रहा है । पीओके में कोई उघोग नही है। काम के नाम पर पेड़ काटना और खादान से माल निकालना भर काम है। यानी अपनी ही जमीन पर गड्डा करके जीने को पीओके के कश्मीरी मजबूर है। ऐसा नही है कि आजादी का नारा लगाने वाले कश्मीरी इस हकीकत को नहीं जानते । या फिर अलगाववादी नहीं जानते। सभी जानते-समझते है । मुशर्रफ के दौर में याद कीजिये जब भारत पाकिस्तान की शांति वार्त्ता के वक्त पहली बार अलगाववादी पाकिस्तान गये थे । कश्मीर के अलगाववादियो को पीओके की संसद में तकरीर का भी मौका मिला था । जो यासिन मलिक 1989 में बंदूक लेकर कश्मीर की आजादी का नारा लगाते हुये मुज्जफराबाद गये थे, उसी यासिन मलिक ने पीओके की संसद के भीतर आजादी के नाम पर पाकिस्तान पर धोखा देने का आरोप भी लगाया और फैज के उस गीत..हम देखेगे..जब ताज उछाले जायेगे...को भी सुना दिया ।

सवाल यह नहीं है कि आजादी का नारा लग रहा तो राजनीति क्या करेगी और हम आप सीधे यह सवाल करने लगे कि फिर समाधान क्या है । इस मिजाज को समझिये की यह देश सांप्रदायिक नहीं है । चाहे राजनीति कितना भी सांप्रदायिकता का पाठ कश्मीर और जम्मू के आसरे पढाये देश हिन्दू- मुसलमान के आसरे नहीं बंट सकता है । हां, समूचे समाज को अगर देश चलाने वाले असुरक्षित करें और धर्म के आसरे सुरक्षा की बात करने लगेंगे तब धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की परिभाषा भी कश्मीर और जम्मू के जरिए लिखने की कोशिश भी होगी । हमारे सामने हर मुद्दे को सुरक्षा के खतरे से जोड़ कर देखने का जो आईना बनाया जा रहा है, उसे तोड़ना हमीं-आपको है । मान लिजिये देश को सांप्रदायिकता की आग में झोकने की कोशिश आजादी के वक्त भी हुई थी, लेकिन गांधी की हत्या ने जतला दिया कि देश सांप्रदायिक हो ही नहीं सकता । गांधी को किसी मुसलमान ने नहीं, हिन्दू ने मारा था । इसकी व्याख्या हिन्दू के जरिए नहीं गांधी के जरिए कीजिए रास्ता दिखने लगेगा।

16 comments:

COMMON MAN said...

bajpai ji, bhart ke gulam hone ke piichhe aise hi log jimmedar the jo sirf apne baare me sochte rahe, jinke andar aatmsamman naam ki koi cheej nahi thi jo doordarshi nahi the aur jo sambhavt aap ki hi tarah ke log rahe honge. aap mujhe bata den ki kis european desh me vahan ke sabhi logon ke saath ek jaisa vyavhaar nahi kiya jaata aur kis desh men ek kaanoon ke jagah dharm ke hisab se alag alag kaanoon lagoo hain, ye desh isai dharm ko mante hain, inme se koi bhi dharm-nirpeksh nahin hai lekin poori tarah se dharm-nirpekshta ka paalan yahi desh karte hain. agar aap bhi kashmir se bhagaye gaye hote to aapko pata chalta.

राजीव रंजन प्रसाद said...

प्रसून जी..


कश्मीर समस्या के साम्प्रदायिक पहलू को एक ही (हरे) चश्मे से नहीं देखा जा सकता। कश्मीर की मुश्किलात के साथ तो हर भारतीय खडा होने को तैयार है लेकिन हकीकत तो एसी नहीं..आपने अपने शब्दों में वही चाशनी भरने की कोशिश की है जिससे झूठ इतना मीठा लगता है कि उसे सच मान ही लिया जाता है। अरुंधती जैसे लोगों को एसे ही शब्द बल देते हैं जो अपने चेहरे में बुद्धीजीवी होने का मुलम्मा लगाये कुछ भी सच साबित करने का दमखम रखते हैं। कलम तो कलम है...यह मिजाज हम जानते हैं कि यह देश साम्प्रदायिक नहीं है इस शब्द के साथ छद्म नहीं किया जाना चाहिये।

दिनेशराय द्विवेदी said...

कश्मीर हो या बाकी भारत। जनता बंटेगी तो गुलामी तो रहेगी या आएगी। बाँट की यह राजनीति इतनी गहरी पैठा दी गई है कि सच्ची बात भी लोगों की समझ नहीं आ रही है। मगर इस का अर्थ यह भी नहीं कि सच्ची बात समझने वाले नहीं हैं। लगता है कि कुल्हाड़ी से पैर काटे बगैर लोग समझेंगे नहीं।

कुमार आलोक said...

पीओके कश्मिर के बारे में ज्यादा नही जानता था ..बस यही जानता था कि सीमा पार से घुसपैठिये हिंदुस्तान में आकर तबाही मचाते है । मुझे अब अहसास हुआ कि धारा ३७० कितना जरुरी है ...अगर ऐसा नही होता तो पूंजी के लुटेरे कश्मिर को नरक बना देते ...पहाड जंगल और झील की जगह माल और कंक्रीट के जंगल उग आते ..और धरती का स्वर्ग सोमालिया सरीखा हो जाता ।

अनुनाद सिंह said...

प्रशून जी,

सबसे पहले कुमार आलोक के (कु)तर्क को लेते हैं। आपके हिसाब से तो पूरे देश को धारा ३७० की जरूरत है।

रही बात आपके लेख की तो इसमें केवल शब्द हैं, अर्थ कहीं है ही नहीं। बस आपने गोलगोल घुमाने का काम किया है। हाँ, इस लेख को पढ़कर आपको कोई मुस्लिम लीगी न कहे, इसका इन्तजाम आपने लेख के आरम्भ में ही कर लिया है।

जिस काश्मीर से एक समुदाय के सारे लोगों को खदेड़ दिया गया हो, वह साम्प्रदायिक नहीं है। धन्य है आपकी अन्तर्दृष्टि और तर्क करने की अनोखी प्रतिभा!!

किसी समय जेरूसलम जाने वाले इसाई तीर्थयात्रियों को परेशान करने को लेकर सैकड़ों वर्षों का 'क्रूसेड' (मजहबी लड़ाई) हुई थी। अमरनाथ का केस उससे भिन्न कैसे है?

mrityunjay kumar rai said...

prasun jee namaskar, aapke comments practical nahi hai.kashmir me jaari ladai kewal dharam ki hai varna 800 kanal jameen(land) dene me kisi ko koi dikkat nahi honi chahiye

anil yadav said...

शाम ढलते ही सडक पर वर्दी में कोई भी आपको बोले "जनाब रुक जाईये और आपकी जान पर बन आये।" उस पर आप मुस्लिम हो तो आपके कपड़ों के अंदर जिस्म टटोलकर सेना सुकून पाये तो आप क्या कहेगे। ............



कश्मीर के इस हालात के लिए भी कश्मीरी ही जिम्मेदार है....जो पैसा देश के गरीबों की शिक्षा और स्वास्थय पर खर्च होना चाहिए वो पैसा कश्मीरियों की अय्याशी पर खर्च हो रहा है....जब घाटी से पंडितो को भगाया गया....तो किसी चचा मियाँ ने इसका विरोध किया....हिन्दुस्तान के गरीब जनता का पेट काटकर मिलने वाले पैसे पर जीने वाले ये परजीवी किसी तरह की भी सहानभूती के हकदार नही है....ये बाँसुरी की धुन नही बंदुक की गजल ही सुनते है....आतंकवादियों को अपने दामाद की तरह घर में पनाह देते है....और जहाँ राष्ट्र हित की बात हो वहाँ मीडिया पर पाबंदी भी कोई बड़ी बात नही ....मीडिया क्या बताना चाहता है यही कि जो आतंकी या आतंकी का समर्थक कश्मीरी मारा गया है उसके मानव धिकार का उल्लंघन हुआ है....औऱ जब एक गरीब फौजी मरता है तो उसका क्या ..वो अकेला नही मरता उसके साथ गाँव मे रहना वाला उसका परिवार भी मरता है जो सिर्फ उसके द्वारा भेजे गये पैसे पर जीता है....
प्रसून जी आज कल देश की सरकार को कोसना औऱ हर समस्या का जिम्मेदार हिन्दुओं को बताना फैशन हो गया है जो हिन्दुओं को जितना ज्यादा गरियाये वो उतना बड़ा धर्मनिरपेक्ष पत्रकार....हम हर शहर में इनके हज हाउस के लिए जमीन दे औऱ देश के हिन्दु आयकर दाताओं के पैसे से वहाँ हज हाउस बनवायें और हर साल हज यात्रा पर करोड़ों रूपये की सब्सिडी देकर इन्हे विदा करें और ये हमारे देश में ही हमारे आराध्य देव के लिए जमीन देने के लिए मना करें ....और हमें गिड़गिड़ाने पड़े इससे बड़ा और क्या सबूत चाहिए कि ये दुनिया के सबसे आजाद नागरिक है जो देश के बहुसंख्यकों पर भारी है....हिन्दुस्तान में ही ऐसा हो सकता है कि राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बना दी जाए....पूरी दुनिया में ये सबसे ज्यादा आजादी की जिन्दगी भारत में ही जी रहे है औऱ जो चीज आसानी से मिल जाती है उसकी कीमत हमेशा कम समझी जाती है....वरना ये इजराइल से अपनी अल अक्का मस्जिद आजाद करके दिखलायें....ये पूरी दुनिया में कहीं शांति से रह ही नही सकते ....दुनिया के लगभग सभी मुस्लिम मुल्क गृह युद्ध से जूझ रहे हैं..वहाँ इन्हे क्या तकलीफ है वहाँ तो ये अपने धर्म भाइयों के साथ ही रह रहे हैं....वहाँ तो कोई हिन्दु काफिर नही है....

संजय बेंगाणी said...

भारतीयों के पसीने की कमाई मात्र 50 लाख लोगो पर लुटाई जा रही है, क्योंकि उन्हे भयादोहन करना आता है.


आपके लेख पर यही कहना है की इस दुनिया में भगवान के बाद अगर किसी में बुद्धि है तो पत्रकारों में है. और थोड़ी बहुत कुमार आलोक को मिली है. शेष भारत तो सोमालिया है.

Shailesh tiwary said...

बाजपेयी जी जम्मू काश्मीर की आज जो स्थिति बनी है उसके लिए जम्मू कश्मीर के मुस्लमान हैं, वे नहीं चाहते कि कश्मीर में अमन की बहाली है ... अगर कश्मीर में अमन हो जाएगा तो उनके जो आतंकी व्यसाय है वो ध्वस्त हो जाएगें..महबूबा मुफ्ती जैसी महिला अपने आपको भारतीय नेता कहती है..और गीत गाती है फिद्दायिनी शब्दों में वो कश्मीर को भारत के द्वारा गुलाम मानती हैं...वो कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराये जाने पर किसी भी तरह का विरोध नहीं जताती ..लेकिन वहीं दूसरी ओर अमरनाथ श्राईन बोर्ड मामले पर आतंकियों की तरह आग उगलती हैं ..मैं आपसे सिर्फ एक ही शब्दों में पुछना चाहता हुँ..आपने अपने ब्लाग में मुसलमानों की पैरवी की है..क्या आप बताने की कोशिश करेंगे कि भारत में मैं मानता हु कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते भारत को अंग्रेजो से आजाद कराने में मुसलमानों का काफी बडा योगदान रहा है लेकिन ये सभी बातो के बाद आखिर हर आतंकवादी मुसलमान क्यों होता हैं...अगर हर आतंकवादी मुसलमान होते हैं तो फिर कश्मीर में मुसलमानों की तलाशी ली जाती है तो इसमें हर्ज क्या है..?..प्रसून जी आप देश के बड़े पत्रकार हैं आपने कश्मीर पार जाकर आतंकवादियों के इंटरभ्यू भी लिये हैं मैं पुछना चाहता हु कि आखिर क्यों सिमी जैसे आतंकी संगठनों की पैरवी देश के जानेमाने नेता मुलायंम और पासवानजैसे लोग चन्द मुस्लिम वोटो के लालच में सिमी जैसे आतंकी संगठनो की पैरवी शुरू कर देते हैं ऐसे नेताओं की जगह दिल्ली की गद्दी नहीं ब्लकि देशद्रोह के जुर्म में अंडमान होना चाहिए और अगर कश्मीर में अमन बहाली करनी हो तो धारा 370 को तोड पूरे देशवासियों को कश्मीर में निवास करने व्यसाय करने और जीवन जीने की आजादी सौपनी चाहिए ...और महबूबा मुफ्ती जैसी देशद्रोही महिला को हजारीबाग की जेल में रखनी चाहिए तभी देश में अमन रह पायेगा ..महबूबा मुफ्ती के ब्यान से ही कश्मीर की आवाम में आतंकी आग सुलगती है....हां यह गलत बात जरूर है कि देश में उडिसा के कंधमाल जैसे जगहों पर इसाई समुदाय के सिद्धे सादे लोगो की प्रताडना दी जाती है..बहुत दुख के साथ कहना पड रहा है कि भारत आज संकट के दौर में गुजर रहा है एक ओर कश्मीर में अमरनाथ श्राईन बोर्ड की आग दूसरी ओर उडिसा में समप्रदायिक आग बिहार में बाढ़ की भयावह स्थिति महाराष्ट्र में सूखे की मार देश के सभी महानगरों में आतंक का डर ऐसे में जरूरत है आप जैसे प्रबुद्ध पत्रकारों और सेना के वीर जवानों की जो देश की इस विसम परिस्थिति में देश को इस संकट से बचाए....

pravin said...

apne to hamari ankhe khol di maharaj????????????? kabhi kabhi ulat ke bhi sochie!!!!!!!!!!

pravin said...

apne to hamari ankhe khol di maharaj????????????? kabhi kabhi ulat ke bhi sochie!!!!!!!!!!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अनिल यादव और शैलेष तिवारी से पूरी तरह सहमत। अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं। लगता है कि प्रसून जी बैलेन्स बनाने के चक्कर में चक्कर खा गये हैं। दरअसल यह मंच पोलिटिकली करेक्ट होने के बजाय इन्ट्यूटिव्‍ली करेक्ट होना बेहतर मानता है।

नरेश गोस्वामी said...

दोस्तों, कश्मीर पर एक बार निरपेक्ष होकर सोचें . इस समस्या को भारतीय राज्य या सरकारी नज़रिए के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक की तरह देखें. पिछले बीस वर्षों में भारत सरकार वहाँ के आतंकवाद से लड़ने में अरबों रूपये और हजारों जवान गँवा चुकी है. इतनी कवायद के बाद भी आप कश्मीर को अपना नही बना पाए. आप अगले बीस साल और इसी तरह लड़ते रहे तो भी कोई हल नही निकलने वाला. कश्मीरियों की अस्मिता को जब तक औपचारिक रूप से मान्यता नही दी जायगी तब तक आप कुछ भी कर लें, कुछ भी हल नही होने वाला.
आख़िर यह कौन सी मानसिकता है कि जो भी इस देश के केंद्रीय हिस्से से बाहर है वह हमें दुश्मन और राष्ट्रद्रोही ही दीखता है. तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध होने लगे तो दिल्ली को वह राष्ट्रद्रोह लगने लगता है. उत्तर-पूर्व के सात राज्य तो हमारे लिए आज तक महज एक भौगोलिक नाम ही हैं. वहाँ १९५८ से सेना को असीमित अधिकार दिए गएँ हैं. वह जब चाहे किसी की तलाशी ले सकती है. किसी को शक की बिना पर गिरफ्तार कर सकती है और बिना किसी सुनवाई के नजरबन्द रख सकती है.
आख़िर कैसा देश चाहिए आपको? आप देश की अखंडता और सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की आज़ादी छीनते जायें और पीड़ित पक्ष कोई विरोध करने लगे तो उसे राष्ट्रद्रोही करार कर दें. इस राष्ट्र की मूल संकल्पना में उप-संस्कृतियों के लिए कोई जगह क्यों नहीं हैं?
प्रसून के विरोध में जिन मित्रों ने लिखा हैं उन्हें यह जानकर आपत्ति नही होनी चाहिए कि दरअसल वे सनातनी उच्च वर्णीय और बहुसंख्यकता वादी भाषा बोल रहे हैं. कश्मीर को दिए गए जिन असीमित और अपरिमित अधिकारों का रोना रोया जाता है उनकी सच्चाई पर भी नज़र डाल लें. भाजपा और संघ जिस धारा ३७० को लेकर इतना बवाल मचाते हैं वह १९६७ में ही काफ़ी हद तक निष्प्रभावी कर दी गई थी. गौर करें कि इस साल से जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल दिल्ली से तय होने लगा था. राजनितिक रूप से सजग हर व्यक्ति यह बात जानता है कि उसके बाद से कश्मीर कि राजनीति दिल्ली से निर्धारित हुई है. वहाँ दिल्ली की किसी भी सरकार ने स्थानीय लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कायदे से नही पनपने दिया. स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को विश्वास में लेकर विकास की दीर्घकालीन रणनीति बनायी जाती तो वहाँ एक ऐसा सबल वर्ग जरूर पैदा होता जो बन्दूक के बजाय संवाद को तरजीह देता. लेकिन केंद्रीय सत्ता कश्मीर के मुंह में हमेशा राष्ट्रवाद ठूसने पर तुली रही.
नरेश गोस्वामी

बिहार कोसी बाढ said...

kosi baadh par bhi to likhiye prasoonji

ho sake to is blog par najar daliyega

biharbaadh.blogspot.com

vipinkizindagi said...

अच्छी पोस्ट

AK said...

TALIYAN.....TALIYAN....AGLI BAR KONE ME EK AUR PHOTO CHIPKA DIJIYEGA SONIA GANDHI SE AWARD LETE HUYE YA PHIR PAKISTAN SE NISANE PAK LETE HUYE