Friday, August 22, 2008

जवाब तो हम खोजेंगे...

बंधुवर,

लोकतंत्र की बेबसी में संसदीय राजनीति को बेबस होना चाहिये था, लेकिन चर्चा में आम आदमी की बेबसी ही उभर रही है । संसदीय राजनीति कहीं ज्यादा ताकतवर-तानाशाह नजर आ रही है । मुझे लगता है, पहले हमें उन स्थितियों को समझना चाहिए जो हमारी हैं, और हमारी नहीं हैं । लोकतंत्र हमारा था। लेकिन, संसदीय राजनीति की तानाशाही हमारी नहीं थी। हम लोकतंत्र पर बात करना नहीं चाहते है...हम राजनेताओ की तानाशाही के आगे बेबस होकर चर्चा करते हुये हांफने लगते हैं । राज्य हमारा है..लोकहित के मद्देनजर राज्य की मौजूदगी थी। लेकिन, हम राज्य पर उंगली उठाने से घबराते है या यह बिगडते राज्य के चेहरे को संवारने के लिये किसी पहल से कतराते हैं। माओवादियों की हिंसा तो हमारी नहीं है, न ही माओवादियों को लेकर कोइ लोकहित का सवाल कभी राज्य के जरिए हमने जोड़ा है । फिर भी हम राज्य की तानाशाही पर सवाल उठाते हैं तो बात माओवादियों की होने लगती है ।

याद कीजिये जिस वक्त आजादी के जश्न में देश के नेता संसद समेत समूची दिल्ली में रोशनी किये हुये थे, उस वक्त महात्मा गांधी कोलकत्ता की एक इमारत में अंधेरा कर खामोशी के साथ बैठे हुये थे। बंगाल के राज्यपाल ने तब गांधी जी के पास जाकर उनके उस घर में रोशनी करने की बात कही थी। लेकिन गांधी उस वक्त की आजादी को दिल से स्वीकार पाने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन नेहरु ने भी उस समय गांधी के आजादी के बॉयकट को राज्यविरोधी करने की हिम्मत नहीं दिखायी। गांधी भी वामपंथियो की तर्ज पर चीन या माओ की भाषा उस समय नहीं कहने लगे। गांधी देश की स्थितियो को देशवासियो के नजरिये से समझ रहे थे और समझाना भी चाह रहे थे ।

जो सवाल संजीत या पार्थ प्रतिम उठा रहे है, उस लीक पर आपको कोहरा ही मिलेगा । पहले यह समझिये की अगर राज्य अपनी जिम्मेदारी संसदीय राजनीति के तहत नहीं उठा रहा है तो हम उंगली राज्य पर उठायेगे या राज्य पर उंगली उठाने वालो के गलत तौर तरीको पर । माओवादी क्या करते है ..क्या कहते हैं..यह काम सरकार का है । अगर सरकार कुछ नही कर रही है तो क्या हम माओवादियो को सरकार मान सकते है । जबाब है बिलकुल नहीं । हां...कुछ लोग होगे जो सरकार के कामकाज और नेताओं की राजनीति से आजिज आकर माओवादियों को विकल्प के तौर पर देखते हों। लेकिन लोकतंत्र का मतलब तो यह है ही कि हर किसी को किसी वैचारिक स्थिति से जुडने का अधिकार है । नेपाल में सिर्फ चार साल पहले कोई सोच भी सकता था कि दुनिया का एकमात्र हिन्दुराष्ट्र नेपाल में माओवादियो की सरकार बन जायेगी । जबाब है बिलकुल नहीं । खासकर माओवादियों की हिंसा को लेकर तो कोई भी मान्यता नहीं दे सकता । लेकिन हम राज्य को लेकर सवाल इसलिये कर रहे हैं क्योकि देश में माओवादियो की हिंसा में तो पिछले चार दशको में तीस से चालीस हजार लोग मारे गये है ।

लेकिन देश के लोकतांत्रिक संसदीय चुनावी राजनीति के छह दशक के इतिहास में राजनीतिक रंजिश की हिंसा में तीन से चार लाख लोग मारे जा चुके है । क्या लोकतंत्र की राजनीति हत्या की इजाजत देती है । जबाब है बिलकुल नहीं । तो माओवादियो और संसदीय राजनीति में किसी आम आदमी के लिये अंतर क्या है । 18 दिन पहले हैदराबाद से एक हेलीकाप्टर क्रैश होकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ के जंगलो में गिर गया । जो हेलिकाप्टर में सवार थे, उनके घरवाले पिछले 18 दिनों से सरकार से बकायदा रहम की भीख मांग रहे है कि अधिकारी जंगलो में जा कर खोजे कि हेलीकाप्टर गिरा कहां है, कोई जीवित बचा है कि नही । लेकिन राज्य सरकारें खामोश है और पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी कह रहे है जंगलो में जा नहीं सकते क्योकि वहां माओवादियों की चलती है । अब आप कल्पना कर सकते हैं , सरकार या प्रशासन कल आपके किसी भी जायज संविधानमत कार्य को भी यह कहकर नहीं करे कि माओवादी विरोध कर रहे हैं , तो इसका मतलब क्या है । मुझे तो ऐसी कोई धटना याद नहीं, जिसमे किसी माओवादी को पुलिस ने पकड़ा हो और जनता का हुजुम उमड़ आया हो कि उसे सजा ना दी जाये । लेकिन देश के दर्जनों सांसद और सैकडो नेताओ की हकीकत है कि उन पर अदालत ने बकायदा सजा दे भी दी हो तब भी नेताओ के समर्थको का हुजुम नारा लगाता रहा..जब तक सूरज-चांद रहेगा..नेता तेरा नाम रहेगा । पिछले दिनो बिहार के सांसद सूरजभान को सजा सुनाये जाने पर खुली सड़को पर उनके समर्थक यह नारा लगा रहे थे।

मेरा सवाल है कही संसदीय राजनीति अपनी आपराधिक और भष्ट्र नीतियो के सामने उससे बडी लकीर खींच कर सुधार की एक सोच लगातार बनाये तो नही रखे हुये है । यानी चित-पट दोनो का खेल वही खेल रही है । यानी बदलाव न हो, इसलिये सुधार का चितंन समाज में रेंगता रहे और हम आप जैसे कथित बुद्दिजीवी रिफॉर्म को ही अंतिम हथियार मान कर समझौते का रुख अपनाये रहे । विकल्प पर खामोश हो जाये । संकट यही से शुरु होता है । क्या हम विकल्प के प्लेटफॉर्म पर चर्चा कर सकते हैं और पृथ्वी को किसी दूसरे ग्रह से देख सकते है। अगर नहीं तो आप बेबसी में आक्रोष करते रहिये । रास्ता तो हम खोजेगें...

15 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी एवं विचारोत्तेजक लेखनी है आपकी..
पुण्य जी, बधाई स्वीकारें..

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

bahut achche vichar prastut karne ke liye dhanyawad.sateek lekh.

Anil Pusadkar said...

rasta to khojna hi padega.humare samne bhi naye raste ke alewa koi vikalp nahi hai,jaise wartaman vyawastha ka koi vikalp nazar nahi aata.shradhey Jay Prakash jee ke alaawa kabhi koi umeed bandhti nazar nahi aayi.halanki hal ke dino me vikalp khojne ki koshish tej hui hai,magar sheshan khairnaar aur bahut se naam hai,bhi unhi raston me kahi gum ho gayi jo sansad ki or jaata hai.aur fir prajatantra me yehi to ek rasta hai aur is raste par gunde-mawaliyon ki bhid hai.jaisa aapne hi kaha jab-tak suraj-chand rahega suraj bhan rahega,uska naam rahega,to fir uski bagal se aage kaise nikal payenge.maf karna main niraash nahi hun.main bhi raste ki talaash me hu aur aksar ye sawaal mujhe pareshan kar dete hain.sahi kaha aapne jawaab bhi hume khojn hai aur raste bhi hume hi talaash karne honge.badhai aapko babak rai ki.meri kuch baaton se hi sahi sahmat hon bhi thik aur na ho to bhi,kyonki sab sahmat ho kisi baat par yahi nahi hota hai is desh me,chahe mamla mehangaai ka ho bhukmari kaya fir berozgaari ka,har party ki aankh alag uska chama alag,uski dafli alag,uska raag alag.

मयंक सक्सेना said...

Prasun Jee yah sab sahi hai par iske saath zaroori yah hai ki ab thoda aur khul ke baat kari jaye aur sab charcha mein shamil ho aur ek doosre ke vicharo ka virodh karne kee jagah uspar vichar kiya jaye....vaikalpik platform to khojna hee padega

Deepak M. said...

namaskar sir, jawab to ham hi khojenge leking kis kis sawal ke.
jahan dekhen wahan ek naya sawal uth khada hota hai. leking mujhe poora yakeen hai jawab hamare hi paas hai aur hamen hi dhoondhana padega.

राजीव रंजन प्रसाद said...

पुण्य प्रसून जी,


आपके इस आलेख से मुझे आपके प्रति यह विश्वास और पुख्ता हुआ है कि सार्थक पत्रकारिता अभी समाप्त नहीं हुई यद्यपि यह शिकायत भी है कि ब्ळोग पर इस विषय पर आपने जिस बेबाकी से लिखा है वह संचारमाध्यम पर नहीं आता।

बस्तर में नक्सलियों नें कई बार बिजली सप्लाई बंद कर दी, कोई खबर नहीं बनी। माओवादियों नें आदिमों को अपने घरों से बेघर कर दिया नेगेटिव रिपोर्टिंग की इंतिहा देखी हमने टीवी चैनलों पर..हेलीकॉपटर प्रकरण मीडिया के लिये खबर ही नहीं चूकि यह खबर संभव है बिकेगी नहीं?

फिर भी यह आशावादिता कि "जवाब तो हम खोजेंगे"? आक्रोषित आपके प्रति भी हैं उतने ही कि हाथ में कलम थाम कर केबल बिकने वाली खबरों के लिये आप भी स्वाधीन नहीं। हमारा आक्रोश आपकी उर्जा भी तो हो?

Sanjeet Tripathi said...

सहमत हूं।
खोजना तो वाकई हमें ही है और खोजेंगे ही देर जरुर लगेगी।

पर चूंकि आप राष्ट्रीय मीडिया से है इसलिए एक छत्तीसगढ़िया होने के नाते मैं आपसे वही शिकायत फिर से दर्ज करवाना चाहूंगा कि क्यों बस्तर में इतने दिन की ब्लैक-आऊट या नरसंहार और अन्य खबरें नही आती नेशनल चैनल्स में, जबकि बड़े कहलाने वाले शहरों मे चार घंटे भी बिजली न रहे, एक हत्या हो जाए तो घंटो समाचार पेल दिए जाते हैं।

vipin said...

लोकतंत्र की बेबसी और नेताओं के बारे में आपका ब्लॉग बहुत सार्थक है..लेकिन जिन बाहुबलियों नेताओं के हाथ में सत्ता की चाबी की बात आप कर रहे हैं..उन्हें जनता इस लिये समर्थन कर रही है..क्योंकि पढ़े-लिखे सफेद कपड़े पहने बहुत से ऐसे अच्छे नेताओं की बिरादरी है..जिन्हें लोगों ने अपना वोट दिया..उनमें से ज्यादातर.. जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे...जीतने के बाद वो विधायक और सांसद बन गये... अपने आपको भगवान समझने लगे..उन्हें छोडिये..उनके पीए...और घरवालों से मिलने का समय इलाके के वोटरों को नहीं मिल पाता..संसदीय व्यवस्था में सुधार की बात लिखने और पढ़ने में तो अच्छी लगती है...लेकिन बहुत कम लोग हैं..जो मैदान में उतरने के लिये तैयार हैं... जो व्यवस्था को सुधारने की ईमानदार कोशिश करना चाहते हैं..दरअसल आम आदमी जिसमें मैं भी हूं...सुबह नहा-धोकर अपने ऑफिस..फैक्ट्री,दुकान या न्यूज चैनल जाना..शाम या रात को ठीक-ठाक...अपने परिवार के पास वापस आने की तमन्ना रखता है...अपनी नौकरी..अपना धंधा बचा रहे..बस यही बहुत है...बौद्धिक ,आर्थिक और चरित्र से मजबूत लोग...समस्या के समाधान के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते..तो फिर सूरजभान,सहाबुद्दीन,और मुख्तार अंसारी जैसों के हाथ में सत्ता आयेगी ही....ज्ञान-विज्ञान की बातें अच्छी लगती हैं..सब करते हैं
लेकिन हकीकत से वाकिफ होना कोई नहीं चाहता..लेकिन प्रसूनजी आपको पढ़कर लगता है..कुछ खबरनवीस हैं जिन्हें वास्तव में जमीनी हकीकत से सरोकार है...
विपिन देव त्यागी

हर्षवर्धन said...

सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है कि क्या किसी नक्सली को पकड़ने पर जनता उसके समर्थन में खड़ी होती है या नहीं। सवाल ये है कि सही -गलत राज्य तंत्र कैसे तय कर रहा है। सिर्फ अपने राजनीतिक नफा-नुकसान तक या सचमुच जनता के हित में।
और, ये सब जानते हैं कि किसी गुंडा-बदमाश के संसद-विधानसभा पहुंचने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि वहां की ज्यादा जनता उसे गुंडे के साथ है। पर, क्या राज्यतंत्र भी उन्हीं गुंडे-बदमाशों के जरिए ही जनता पर शासन नहीं कर रहा है। चलिए अच्छा है कोशिश करते हैं रास्ता खोजने की ...

parth pratim said...

Hamare sansadiya loktantra ka vartamaan swaroop hamari vivashta hai.Ham majboor hain sanpnath ya naagnath me se kisi ek ko chunne ke liye. iske do vikalp hain. ek "Chunao Sudhar" jo pahle ki apekchha kafi pragti par hai aur dusra Loktantra ke sabhi stambhon ko apne apne kshetron me swatantra hokar karya karne ki. jo vartamaan me sirf Nyaypalika kar rahi hai. Vidhaika, Karyapalika aur Media(patrakarita) ke apsi santh-ganth
ka hi ye parinam mujhe lagta hai.aur hum bhi(aam admi) kuchh kam nahin hain

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' said...

लोकतंत्र की बेबसी पिछले दो महीने से जम्मू और कश्मीर के लोग देख रहे हैं. सब आजिज आ चुके हैं, पर फसाद चालू है. अब बात यात्रियों के लिए जमीन की न रहकर जम्मू की उपेक्षा तक आ गई है.और अब महबूबा मुफ्ती का बयान कि सरकार को जम्मू कश्मीर या श्राइन बोर्ड में से एक को चुनना होगा... रास्ता तो हम ही निकालेंगे,पर लोकतंत्र के दरोगा रास्ता निकलने तो दें...
http://deveshkhabri.blogspot.com
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

mashaal said...

MAYOVADI ho ya naxalvaadi jaise sabhi samsyaye rajneeti ke karan hai yah aap bhi jante hai is par kaafi kuch kahte bhi hai,parantu mujhe aisa lagta hai ki yadi aap jaise log rajneet me aajaye to yuva bhi is baare me sochenge ......isliye aap jaise logo ko politics me aana chaiye jo muddo,samasyayo ko jante....tabhi javab milega...

parth pratim said...

Mashaal ji, in logon ko to Rajneeti me mat ghusaiye. Varna jo bhi bacha-khucha hai wo bhi saaf ho jayega. kuchh log pahle se hi wahan hain, jo kisi na kisi poletical party vishesh ke hokar rah gaye hain.

vipinkizindagi said...

बेहतरीन लिखा है आपने

gopal said...

kahin 'wednesday' rajya ke nakam hone ka sahi ke sabse nazdeek pahuchta hua hal to nahi... kyonki aaj kisi bhi rajya ya rashtra ke star per har koi kuch is tarah hi pratikriya wyakt karne ki soch raha hai...
sawal yahan ye bhi nahi ki hero kaon ho, sawal ye hai ki vyavastha ko sahi ya ghalat ka ahasas kaise karaya jaye. kyonki jab har star par saudebaji ho rahi hai to fir rajya ki ya fir vyaktigat koi bhi ladai niswartha kaise ho sakti hai.... yahan do baten ek saat shuru ho gayi... bas yahi duvidha hai aaj hamari...ladai ko ek seedh me kai nahin rakh pata shayad isi liye lakshya se bhatkane ke dar se koi ladne ki taiyari nahi kar pata aur ye frustation uske uper hamesha kisi na kisi roop me havi ho jata hai....aur tabhi nikalta hai beech ka rasta...jahan tak sawal maharashtra jaisi samasya ka hai to isme rajya aur RAJ dono hi ek doosre ko blackmail kar rahe hain...shayad inke samne khud ko zinda rakhne ka yahi akhree rasta hai...